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अन्नदान में बना रहे सम्मान

हर्ष मंदर | Aug 27, 2012, 00:43AM IST
 
 


शहरों में रहने वाले बेघर व प्रवासी लोगों के लिए पौष्टिक व सस्ता भोजन प्राप्त करना जीवन की एक बड़ी जरूरत होती है। लेकिन ऐसे ज्यादातर लोगों के पास इतना भी ठौर नहीं होता, जहां ये बैठकर अपने लिए खाना पका सकें। इसके बजाय ये कचरा बीनने, रिक्शा चलाने, दिहाड़ी मजदूरी, छोटा-मोटा सामान बेचने या भिक्षावृत्ति जैसे कामों के जरिए कमाई गई राशि का एक तिहाई से आधा हिस्सा रोज सड़क किनारे बने भोजनालयों या ठेलों से खाना खरीदने में खर्च करते हैं, जो ज्यादा पोषक और स्वच्छ भी नहीं होता।

 

 

हमारे यहां तमिलनाडु को छोड़कर कोई भी सरकार वयस्कों को मुफ्त या रियायती दरों पर भोजन उपलब्ध कराने का व्यापक कार्यक्रम नहीं चलाती। ऐसा भोजन अभावग्रस्त व प्रवासी कामकाजी आबादी को सेहतमंद बनाएगा और वे अपने लिए कुछ पैसे भी बचा सकेंगे। राज्य सरकारें इस तरह के कार्यक्रमों के लिए लोक-संसाधनों का निवेश इसलिए भी नहीं करतीं क्योंकि उन्हें लगता है कि अनेक धार्मिक या चैरिटी संस्थाएं तो वैसे भी अभावग्रस्त लोगों की खाद्य संबंधी इस जरूरत को पूरा करती रहती हैं।

 

 

बहरहाल, वस्तुस्थिति जानने के लिए हमने दिल्ली की ऐसी कुछ धार्मिक संस्थाओं का जायजा लिया, जहां पर बेसहारा लोगों को मुफ्त भोजन मुहैया कराया जाता है। हमने पाया कि महज ४ फीसदी बेघर लोग खाने के लिए इन पर पूरी तरह निर्भर हैं। ये मुख्यत: निराश्रित, विकलांग और बूढ़े पुरुष व महिलाएं, अनाथ छोटे-छोटे बच्चे होते हैं, जिनके पास गुजर-बसर के लिए भीख मांगने के अलावा कोई चारा नहीं होता। काम करने लायक बेघर लोगों को भी कई बार जब कोई काम-धंधा नहीं मिल पाता तो वे भी चैरिटी का भोजन लेने के लिए मजबूर हो जाते हैं।

 

 

हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई समेत समस्त धर्मो में भूखों को खाना खिलाना बहुत पुण्य का काम माना गया है। लेकिन हमने पाया कि इक्कीसवीं सदी की चमचमाती दिल्ली में यह परंपरा भी क्षीण हो रही है। दिल्ली में हमें ऐसा एक भी चर्च नहीं मिला, जहां बेसहारों को भोजन देने की व्यवस्था हो। दूसरे धार्मिक प्रतिष्ठानों में जरूर ऐसे कुछ इंतजाम नजर आए, लेकिन ये भी सीमित मात्रा में थे। इनमें से कुछ ही धार्मिक प्रतिष्ठान ऐसे थे, जो बेसहारा लोगों की असल जरूरत यानी सम्मान के साथ पौष्टिक भोजन की पूर्ति करते हैं।

 

 

हम जानना चाहते थे आखिर क्यों इतनी कम संख्या में बेसहारा लोग दान या चैरिटी के भोजन पर निर्भर हैं और वे अपने अत्यल्प संसाधनों के बावजूद खरीदकर खाना या भूखे पेट रहना क्यों पसंद करते हैं। उन्होंने इसकी वजह बताते हुए कहा कि ऐसी जगहों पर एक तो उन्हें छिटपुट रूप से खाना मिलता है और वह बहुत अच्छा भी नहीं होता। इसके अलावा उन्हें धार्मिक जगहों पर चैरिटी के भोजन के लिए इसकी उपलब्धता, टाइमिंग, मेनु इत्यादि पर निर्भर रहना पड़ता है, जो उनकी जरूरतों के बजाय ज्यादातर दानदाताओं की इच्छा से निर्धारित होता है। उन्हें कई बार इसके लिए देर तक इंतजार भी करना पड़ता है, जिससे वे अपने काम पर भी समय पर नहीं पहुंच पाते और उनकी उस दिन की मजदूरी कट जाती है या दिनभर काम ही नहीं मिलता। कई मंदिरों में गरीबों के लिए भोजन बंटता है, लेकिन यह अमूमन तैलीय, मीठा होता है और कुछ खास दिनों में ही वितरित होता है।

 

 

इसमें भी भोजन बांटने वाला खुद को ‘अन्नदाता’ की तरह दिखाना चाहता है और उसकी याचकों की जरूरतों को संतुष्ट करने में दिलचस्पी नहीं होती। ज्यादातर बेसहारा लोग इस चिकनाईयुक्त मीठे खाने से ऊब चुके हैं और वे इसके बजाय सादा और सुपाच्य भोजन पाना चाहते हैं। आखिर बेसहारा लोग व एकल प्रवासी दान के भोजन को क्यों ठुकराते हैं? इसका प्रमुख कारण यह है कि इससे उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुंचती है। वे हाथ में कटोरा लेकर मांगने और जो कुछ भी मिले, उसे फुटपाथ पर या किसी पेड़ के नीचे बैठकर खाने के लिए मजबूर होते हैं। कई बार उन्हें सीमित मात्रा में बांटे जा रहे भोजन को प्राप्त करने के लिए दूसरों से धक्कामुक्की भी करनी पड़ती है, जिसके चलते बुजुर्ग व कमजोर लोग गिर जाते हैं।

 

 

इस तरह की चैरिटी का सबसे सम्मानजनक रूप हमने निजामुद्दीन की दरगाह और साईं बाबा के मंदिर में पाया। यहां पर दानदाता होटलों से भोजन के कूपन (जो एक महीने तक वैध होते हैं) खरीदकर बेसहारा लोगों को बांट देते हैं, जिनका ये लोग अपनी जरूरत के हिसाब से कभी भी इस्तेमाल कर सकते हैं। कुछ इसी तरह की व्यवस्था हमें जामा मस्जिद में नजर आई, जहां आस-पास के ढाबों के बाहर बेसहारा लोग कतारबद्ध बैठे रहते हैं और जो व्यक्ति इनमें से जितने लोगों को खाना खिलाना चाहता है, वह उनका भुगतान ढाबा मालिकों को कर देता है और बदले में इन्हें खाना मिल जाता है।

 

 

वैसे पारंपरिक तौर पर सर्वाधिक पौष्टिक व पूरे सम्मान के साथ भोजन सिख गुरुद्वारों के ‘लंगरों’ में परोसा जाता है। लोग फर्श पर बिछे दरीचों पर लाइन से बैठ जाते हैं, जहां उन्हें भरपेट भोजन कराया जाता है। यह ‘लंगर’ व्यवस्था सिखों की समतावादी शिक्षाओं का सार है, जो कहती है कि राजा हो या रंक, सभी को साथ बिठाकर एक जैसी भावना के साथ एक जैसा भोजन कराया जाए। हालांकि हमने पाया कि ये समतावादी परंपराएं कई जगहों पर कमजोर पड़ गई हैं। चांदनी चौक के शीशगंज गुरुद्वारा में ‘मलिन गरीबों’ के लंगर में आने पर पाबंदी है।

 

 

कनॉट प्लेस के निकट बंगला साहेब में भी उन्हें परिसर में आने और मुख्य लंगर में खाना खाने से रोका जाता है। लेकिन वहां पर पिछवाड़े में परिसर के बाहर उनके लिए अलग से लंगर होता हैं, जहां पर उन्हें उसी तरह का खाना तो मिलता है, लेकिन उतने सम्मान के साथ नहीं। हमने इसके प्रबंधकों से इसकी वजह जाननी चाही तो उन्होंने इसे उचित ठहराते हुए कहा कि ये लोग परिसर में आकर धूम्रपान व ड्रिंक करते हैं, जिससे इसकी पवित्रता भंग होती है। दिल्ली में फूड चैरिटी की पड़ताल का यह सफर न सिर्फ राजधानी में रहने वाले निर्धनतम लोगों की गुजर-बसर, वरन देश के मध्य वर्ग के संकुचित होते मन को समझने के लिहाज से भी काफी रोचक रहा।

(लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं।)

 
 
 

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