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बुझी नहीं आंदोलन की आग

टोनी जोसेफ | Jul 30, 2012, 00:24AM IST
 
 

सोचिए किसी दिन आप काम से वापस लौटते हैं और अपने अपार्टमेंट को आग की लपटों से घिरा पाते हैं। आपके आस-पड़ोस वाले आग बुझाने की भरसक कोशिश कर रहे हैं। कोई बाल्टी से पानी उड़ेल रहा है, कोई हॉजपाइप के सहारे आग पर पानी फेंक रहा है तो कोई लोगों को सुरक्षित जगह पर पहुंचाने में लगा है। ऐसे में आप क्या करेंगे? उनके साथ आग बुझाने की कोशिशों में जुट जाएंगे या फिर हाथ पर हाथ धरे उनके नाकाफी साबित होते प्रयासों पर टीका-टिप्पणी करने लगेंगे? या अपने किसी मोटे-थुलथुल पड़ोसी के फिसलकर गिरने पर हंसने लगेंगे?


मुझे यकीन है कि हममें से किसी को भी इसका जवाब देने के लिए एक पल भी सोचना नहीं पड़ेगा। तो फिर इंडिया अगेंस्ट करप्शन (आईएसी) के जंतर-मंतर पर हो रहे हालिया विरोध प्रदर्शन में कम भीड़ जुटने की वजह से इस पूरे आंदोलन को ‘नाकाम’ ठहराते हुए तरह-तरह की उल्लासपूर्ण टिप्पणियां क्यों की जा रही हैं? क्या यह सरकार में उच्च स्तरों पर पसरा व्यापक भ्रष्टाचार ही नहीं है, जो हमारी व्यवस्था को इमारत में लगी आग की तरह ध्वस्त कर रहा है? क्या हम महज तमाशबीन दर्शक हैं या फिर ऐसे भागीदार हैं, जिनका सबकुछ दांव पर लगा है? आखिर हम आंदोलन को फिर से अपने पैरों पर खड़ा करने के उपाय तलाशने के बजाय चुपचाप बैठकर टीम अन्ना के प्रदर्शन का आकलन करते हुए ही संतुष्ट कैसे रह सकते हैं?


दरअसल इस आंदोलन का मुश्किलों में फंसना हैरत की बात नहीं है, बल्कि हैरानी की बात यह है कि यह आंदोलन कहां से चला था और कहां पहुंच गया। दुनिया के सबसे निर्लज्ज राजनेताओं के समूह को एक ऐसा कानून पारित करने के लिए मजबूर करना, जो उनके लिए जनता के खजाने को लूटना काफी मुश्किल बना देगा, एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य है। अगर ये नेतागण ऐसा कानून बनाने की दिशा में कम से कम आधी दूर भी चले हैं, तो यह इस आंदोलन के 43 वर्षीय नायक अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों के हुनर का कमाल है। वर्ष 2010 के कॉमनवेल्थ खेलों में हुए घोटाले के बाद जिस कदर लगातार घोटाले सामने आए, उससे जनता व्यथित थी और भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग लड़ने के लिए ऐसे किसी मार्गदर्शक की तलाश में थी, जिसका सार्वजनिक जीवन में बेदाग रिकॉर्ड हो और जो इस उद्देश्य के प्रति पूर्ण समर्पित हो। आक्रोश की उस पहली लहर में केजरीवाल और अन्ना हजारे (जिन्हें केजरीवाल आंदोलन के प्रतीक चेहरे के तौर पर लेकर आए) के लिए लोगों को यह अहसास कराना मुमकिन था कि हजारों की संख्या में सड़कों पर बाहर निकलते हुए वे वास्तव में राजनीतिक व्यवस्था में प्रभावी बदलाव के वाहक बन सकते हैं।


लेकिन अब लोगों में वैसी भावना नहीं रही। वे अब जानते हैं कि राजनेताओं ने इस आंदोलन को उपेक्षित करने का तरीका खोज लिया है। सिविल सोसायटी नामक इस नए अड़ियल संगठन के बारे में शुरुआती दौर के भय और जिज्ञासा के बाद राजनीतिक दलों ने इसके बारे में सोचना बंद कर दिया और वे इस नतीजे पर पहुंचे कि चूंकि उनमें से हर कोई कम या ज्यादा मात्रा में भ्रष्ट है, लिहाजा किसी को डरने की जरूरत नहीं है। जब हमाम में सभी नंगे हैं, तो कोई किसी से क्यों शर्मिदा हो? यदि इस बार ज्यादा लोग जंतर-मंतर नहीं पहुंचे, तो इसलिए नहीं कि उनका गुस्सा खत्म हो गया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्हें अब यह भरोसा नहीं है कि उनके प्रयासों से कोई फर्क पड़ेगा। इसी कारण इस आंदोलन को कोई विश्वसनीय वैकल्पिक कार्ययोजना पेश कर लोगों में दोबारा यह उम्मीद जगानी होगी कि उनके प्रयासों से बदलाव आ सकता है।


मेरे ख्याल से इस आंदोलन को अपनी वैकल्पिक योजना के तहत तीन प्रमुख बातों पर विचार करना चाहिए। पहला, वे लोकपाल विधेयक को अपना मुख्य मकसद तो बनाए रखें, लेकिन अपने इस विचार को त्याग दें कि इसे महीनों में कानूनी रूप दिया जा सकता है। इससे सिर्फ निराशा हाथ लगेगी। त्वरित जीत पाने का पल बीत चुका है। दूसरा, 2014 के आम चुनावों की ओर धीरे-धीरे मगर पुख्ता तरीके से आगे बढ़ें। तब तक इस आंदोलन को वॉलेंटियर्स व धन के मामले में इतना ताकतवर हो जाना चाहिए कि वह देशभर के अहम निर्वाचन क्षेत्रों के नतीजों पर असर डाल सके। तीसरा, एक पारदर्शी एजेंडा लेकर आएं और जो उम्मीदवार 2014 के चुनावों के दौरान इस आंदोलन का समर्थन पाना चाहे, उसके लिए इसपर दस्तखत करना और इसे मानना अनिवार्य हो।


कुछ लोगों का यह भी कहना है कि इंडिया अगेंस्ट करप्शन (आईएसी) आंदोलन को एक राजनीतिक पार्टी का रूप ले लेना चाहिए, लेकिन मेरे ख्याल से उसके लिए ऐसा करना घातक साबित होगा। कोई आंदोलन किसी एक मसले पर फोकस कर सकता है, लेकिन पार्टी नहीं। पार्टी को अपने प्रमुख मतदाता-वर्ग की पहचान करनी होगी और आर्थिक सुधारों से लेकर कश्मीर और आरक्षण जैसे तमाम मसलों पर अपना रुख तय करना होगा। आईएसी में इन मसलों पर इतनी अलग-अलग राय रखने वाले लोग हैं कि ऐसे में पार्टी गठित करने का कोई भी प्रयास इसे विघटन की ओर ले जाएगा।


पुनश्च : केजरीवाल अपने साक्षात्कारों में एक ऐसे दृढ़-निश्चयी युवा की तरह लगते हैं, जिसके साथ कुछ गलत हुआ है और जो हिसाब चुकता किए बगैर चैन से नहीं बैठेगा। दृढ़-संकल्प की यह झलक कोई दिखावा नहीं है। ‘द कारवां’ मैग्जीन में मेहबूब जिलानी के लेख के मुताबिक वर्ष 1985 में स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद अरविंद केजरीवाल आईआईटी में दाखिला लेना चाहते थे, लेकिन उनके इलेक्ट्रिकल इंजीनियर पिता गोबिंद राम ने यह सोचकर कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी की प्रवेश परीक्षा के लिए उनका आवेदन करवा दिया कि यदि आईआईटी में चयन न हो तो यह दूसरा विकल्प तो रहे। लेकिन केजरीवाल ने कुरुक्षेत्र की प्रवेश परीक्षा देने के बारे में सोचा तक नहीं, क्योंकि उन्होंने ठान लिया था कि वह ‘सिर्फ आईआईटी में जाएंगे’। आखिरकार उन्होंने एक आईआईटी संस्थान से ही 1989 में मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की। लिहाजा जो लोग जंतर-मंतर के फीके प्रदर्शन पर जश्न मना रहे हैं, उन्हें गोबिंद राम द्वारा केजरीवाल के बारे में कही गई यह बात याद रखनी चाहिए, ‘यदि वह किसी चीज के पीछे पड़ जाएं, तो उसे पाकर ही दम लेंगे।’


लेखक बिजनेसवर्ल्ड के पूर्व संपादक और मीडिया सर्विस फर्म के चेयरमैन हैं।
 
 
 

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