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दृढ़ता का दूसरा नाम द्रविड़

 
Source: राजदीप सरदेसाई   |   Last Updated 00:29(18/11/11)
 
 
 
 
पिछले आठ माह से भारतीय क्रिकेट प्रशंसक सांसें थामकर उस क्षण की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जब उनके अन्यतम क्रिकेट आदर्श सचिन तेंडुलकर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में अपना सौवां शतक पूरा करेंगे। लेकिन इस दौरान एक व्यक्ति चुपचाप वह सब करता रहा, जो कि वह पिछले अनेक वर्षो से एक अद्भुत दक्षता के साथ करता आ रहा था। ‘मेड फॉर टीवी’ अनशनों और नयनाभिराम तमाशों के इस दौर में राहुल द्रविड़ ने दृढ़ता और निष्ठा के चिर प्रासंगिक मूल्यों में हमारे भरोसे को पुष्ट किया है।

बेंगलुरू के इस 38 वर्षीय खिलाड़ी ने अपने अप्रतिम कॅरियर की सांझ में यह दिखा दिया है कि सच्ची उत्कृष्टता को आत्मप्रचार के लिए किसी मेगाफोन की जरूरत नहीं होती, उसे केवल अपने कौशल के प्रति अडिग रूप से प्रतिबद्ध रहना होता है। चुपचाप अपना काम करने वाले उन बहुसंख्य लोगों के लिए भी द्रविड़ एक प्रेरणा सिद्ध हुए हैं, जो अपने नायकों को शोमैन के स्थान पर परफॉर्मर के रूप में देखना चाहते हैं।

प्रचार की चकाचौंध में होकर भी उससे दूरी बनाए रखना आसान नहीं हो सकता, लेकिन इसके बावजूद द्रविड़ ने जीवन के उतार-चढ़ावों का सामना धीरज और संभवत: अपने समकालीनों की तुलना में अधिक मर्यादा के साथ किया है। वर्ष 1996 का लॉर्डस टेस्ट याद करें, जो कि राहुल द्रविड़ का पदार्पण मैच था। उसी मैच से सौरव गांगुली ने भी अपने टेस्ट कॅरियर की शुरुआत की थी। लेकिन भारतीय क्रिकेट के पुनरुत्थान के ये दो सहभागी जीवन और खेल के प्रति अपने रवैये में एक-दूसरे से बेहद विपरीत सिद्ध हुए।

गांगुली ‘प्रिंस ऑफ कोलकाता’ थे, मानो शासन करना ही उनकी नियति हो। लेकिन इसके विपरीत द्रविड़ ने आजीवन अपने लिए एक लगभग नीरस उपाधि ‘द वॉल’ का निर्वाह किया। गांगुली जज्बाती व जोशीले थे। लॉर्डस में जब उन्होंने अपनी कमीज उतारकर लहराई तो वह आधुनिक भारतीय क्रिकेट का एक महत्वपूर्ण क्षण था। लेकिन हम कल्पना भी नहीं कर सकते कि द्रविड़ कभी इस तरह सार्वजनिक रूप से अपने शरीर सौष्ठव का प्रदर्शन करेंगे।

जब गांगुली को टीम से बाहर कर दिया तो पूरा कोलकाता सड़क पर उतर आया था। लेकिन यदि द्रविड़ को टीम से निकाल बाहर कर दिया जाए तो लगता नहीं कि बेंगलुरू के एमजी रोड के ट्रैफिक में तनिक भी खलल पड़ेगा। शायद, गांगुली के उत्साह ने ही उन्हें एक बेहतर कप्तान बनाया, लेकिन अब यह साफ हो गया है कि द्रविड़ की दृढ़ता कहीं अधिक दीर्घजीवी थी।

द्रविड़ के समकालीनों में केवल सचिन तेंडुलकर रनों और शतकों के मामले में उनसे आगे खड़े हैं। शायद तेंडुलकर युग में खेलने का यही अर्थ था कि द्रविड़ जैसे बल्लेबाज को कभी उतनी सराहना नहीं मिल पाएगी, जिसके वे योग्य थे। ब्रैडमैन के दौर में भी कई महान बल्लेबाज सामने आए थे, लेकिन सर डॉन का आभामंडल ही कुछ ऐसा था कि इतिहास ने उन्हें भुला दिया। तेंडुलकर के आभामंडल का भी कुछ ऐसा ही असर है। फिर भी यदि तेंडुलकर क्रिकेट के कलाकार हैं तो द्रविड़ क्रिकेट के कारीगर हैं। अपने कौशल को निरंतर निखारते हुए आज वे उस मुकाम पर आ गए हैं कि उन्हें मुंबई के जीनियस बल्लेबाज के समकक्ष रखा जा सकता है।

वास्तव में कुछ क्षेत्रों में तो द्रविड़ का महत्व तेंडुलकर से भी अधिक है। उदाहरण के तौर पर यदि हम जिम्बाब्वे और बांग्लादेश को छोड़ दें तो विदेशी मैदानों पर द्रविड़ का टेस्ट औसत सचिन से भी बेहतर है। विदेशी धरती पर भारत की जीत में भी द्रविड़ का योगदान अधिक रहा है। उल्लेखनीय है कि द्रविड़ के 36 में से 32 शतक ऐसे हैं, जिनके कारण या तो भारत ने मैच जीता या वह मैच बचाने में कामयाब रहा। यह तथ्य द्रविड़ को एक वास्तविक मैच विजेता के रूप में स्थापित करता है। उनके लगभग १३ हजार टेस्ट रनों के साथ ही यदि वनडे के १क् हजार से अधिक रनों और 200 से अधिक टेस्ट कैचों को भी जोड़ें तो हम पाएंगे कि क्रिकेट इतिहास के सर्वकालिक महानतम खिलाड़ियों की पांत में राहुल द्रविड़ का स्थान सुरक्षित है।

लेकिन रनों से भी ज्यादा जो चीज मायने रखती है, वह है व्यक्तित्व की दृढ़ता। इतने लंबे कॅरियर के बावजूद द्रविड़ का नाम केवल एक विवाद से जुड़ा : जब उन्होंने एक कार्यवाहक कप्तान के रूप में मुल्तान में भारतीय पारी की घोषणा तब कर दी थी, जब तेंडुलकर 194 पर बल्लेबाजी कर रहे थे। वह घोषणा द्रविड़ के उस खेल-दर्शन के अनुरूप ही थी, जो टीम के हित को व्यक्तिगत उपलब्धियों से ऊपर रखती है। अपनी इसी दृष्टि के कारण द्रविड़ ने बिना कोई शिकायत किए विकेट कीपर की भूमिका भी निभाई थी, क्योंकि वह टीम के हित में था।

मौजूदा वर्ष द्रविड़ के व्यक्तित्व की दृढ़ता का प्रतिमान सिद्ध हुआ है। उन्हें वनडे टीम से बाहर कर दिया गया था और विश्व कप खेलने के योग्य भी नहीं समझा गया था। काबिल युवा बल्लेबाजों की फौज के सामने द्रविड़ को शायद एक ‘एंटिक आइटम’ माना जा रहा था। हमें बार-बार बताया जा रहा था कि यह टी-20 का दौर है और इसमें भारी बल्लों से छक्के उड़ाने वाले बल्लेबाज ही अपना अस्तित्व कायम रख सकते हैं। द्रविड़ का पसंदीदा क्रिकेटिंग स्ट्रोक है मजबूत फॉरवर्ड डिफेंस, लेकिन कइयों का मानना था कि यह स्ट्रोक केवल कोचिंग मैनुअल के लिए ही ठीक है। लेकिन जब इंग्लैंड के विरुद्ध टेस्ट सीरीज में युवा तुर्क ताश के पत्तों की तरह बिखर रहे थे, तब द्रविड़ के इस फॉरवर्ड डिफेंस ने ही हमारा थोड़ा-बहुत सम्मान बचाया था।

संभव है कि हर चुनौती का सामना करने के बाद द्रविड़ रिटायरमेंट के बारे में विचार करें। बल्लेबाजी की ढेरों उपलब्धियां हासिल करने के बाद शायद अब वे अपने परिवार के साथ समय बिताना चाहेंगे। लेकिन इसकी कम ही संभावना है कि उनके रिटायरमेंट की घोषणा बहुत नाटकीय होगी। नाटकीयता से राहुल द्रविड़ का ज्यादा नाता नहीं है। शायद वे चुपचाप सूर्यास्त की खोह में चले जाएंगे और अपने पीछे अपनी उपलब्धियों की स्मृतियां छोड़ जाएंगे। पेज थ्री मिनी सेलिब्रिटीज के इस दौर में द्रविड़ ही सही मायनों में पेज वन स्टार हैं। - लेखक सीएनएन 18 नेटवर्क के एडिटर-इन-चीफ हैं।
 
 
 
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