भ्रष्टाचार रोकने को तरजीह
Bhaskar news
| Jan 04, 2013, 01:18AM IST
सुप्रीम कोर्ट ने फिर भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम को बल प्रदान किया है। भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच करने के लिए कारगर संस्थाएं स्थापित हों, यह इस अभियान का एक अभिन्न एवं महत्वपूर्ण अंग है।
अन्ना आंदोलन के दौरान केंद्र में मजबूत लोकपाल और राज्यों में प्रभावी लोकायुक्त की नियुक्ति की मांग जोरदार ढंग से उठी। उस मांग को सिविल सोसायटी और आमजन के बीच भारी समर्थन मिला। दुर्भाग्यपूर्ण है कि राजनीतिक दलों ने इस जनभावना का सम्मान नहीं किया।
नतीजा यह है कि लोकपाल विधेयक अब तक संसद में लटका हुआ है, जबकि विभिन्न राज्य सरकारें लोकायुक्त की नियुक्ति में या तो टाल-मटोल करती रही हैं या उन्होंने इस नाम पर एक लचर संस्था की स्थापना कर दी है। गुजरात उन राज्यों में था, जहां लोकायुक्त की नियुक्ति लंबे समय से टलती रही। तब राज्यपाल ने हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से मशविरा कर खुद इस पद पर अवकाशप्राप्त न्यायाधीश आरए मेहता की नियुक्ति कर दी।
राज्य सरकार ने इसे राज्यपाल की अनावश्यक सक्रियता का मुद्दा बना दिया। लेकिन हाई कोर्ट में फैसला राज्य सरकार के खिलाफ गया। अब सुप्रीम कोर्ट ने भी इस नियुक्ति को वैध ठहरा दिया है। लेकिन गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार के इस तर्क को उचित ठहराया है कि राज्यपाल को मंत्रिमंडल की सलाह के मुताबिक ही काम करना चाहिए।
इसके बावजूद भ्रष्टाचार विरोधी संस्था निर्बाध चले, इस बात को कोर्ट ने अधिक तरजीह दी है। अत: बेहतर होगा कि इस फैसले को किसी की हार या जीत के रूप में न देखा जाए, बल्कि इससे राजनीतिक वर्ग को सीख लेनी चाहिए कि भ्रष्टाचार विरोधी तंत्र तैयार करने के प्रश्न को अगर-मगर में उलझाना वांछित नहीं है। न्यायपालिका ऐसी कोशिशों को मंजूरी नहीं देगी।
अगर राजनीतिक दल सिर्फ चुनावी सफलता-विफलता के गतिशास्त्र से ऊपर उठकर सोच सकें तो वे पाएंगे कि जागरूक जनमत अब लगातार राजकाज को घिसे-पिटे र्ढे से चलाने की प्रवृत्तियों को चुनौती दे रहा है। वह इसमें गुणात्मक बदलाव चाहता है। सीएजी और चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाएं और सबसे ऊपर न्यायपालिका के अपनी भूमिका के प्रति अधिक जिम्मेदार रुख अपना लेने से बदलाव की इस जनभावना को बल मिला है।








