जायज आंदोलन में गलत मोड़
Bhaskar News
| Dec 25, 2012, 00:07AM IST
दुष्कर्म विरोधी स्वत:स्फूर्त आंदोलन में असामाजिक एवं राजनीतिक मकसद वाले तत्वों का घुस आना चिंताजनक है। दिल्ली में तेईस वर्षीय एक युवती से सामूहिक दुष्कर्म की जघन्य घटना के बाद सड़कों पर आम लोगों- खासकर नौजवानों के उमड़े गुस्से से सकारात्मक परिणाम हासिल हुए हैं।
सरकार कुछ ठोस प्रशासनिक एवं विधि संबंधी कदम उठाने पर मजबूर हुई। इसी बीच आंदोलन में घुसपैठ करने वाले तत्वों द्वारा हिंसा पर उतर आने से दिल्ली में इंडिया गेट के पास पुलिस को सख्त कार्रवाई करने का मौका मिला, जिसमें अनेक जायज प्रदर्शनकारी भी जख्मी हुए।
यह घटनाक्रम देश के राजनीतिक नेतृत्व की बड़ी विफलता है, जो एक वाजिब मुद्दे पर उभरे ईमानदार जनाक्रोश को सही दिशा नहीं दे सका। परिणाम है कि दुष्कर्म के मुद्दे पर छिड़ी बहस परिपक्वता की तरफ नहीं बढ़ सकी है। चर्चा मुख्य रूप से दुष्कर्मियों को फांसी देने की मांग में सीमित हो गई है।
यह समस्या का सरलीकरण है। इससे सरकार, प्रशासन, पुलिस एवं न्याय व्यवस्था की जवाबदेही तय होने की कोई सूरत नहीं निकलती। क्या फांसी की सजा के प्रावधान से दुष्कर्म की घटनाएं रुक जाएंगी? अनेक अध्ययनों का निष्कर्ष है कि समस्या सख्त कानून का अभाव नहीं, बल्कि कानून को लागू करने वाली एजेंसियों की निष्क्रियता, अभियोग पक्ष की अयोग्यता और पूरे समाज में बैठी पितृ-सत्तात्मक सोच है। जरूरत यह है इस बहस को व्यापकता दी जाए।
वरना एक मामले में अगर शीघ्र न्याय हो जाता है, तब भी उससे महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो सकेगी। बहरहाल दिल्ली की घटना के विरोध में देशभर में भड़के गुस्से से यह जरूर झलका है कि अब भारत के लोग सब कुछ चुपचाप सहते रहने को तैयार नहीं हैं। बुराइयों के खिलाफ लोगों का जाग्रत होना भविष्य के प्रति आश्वस्त करने वाली घटना है। अब यह जागरूक तबकों का फर्ज है कि वे देश के सभी हिस्सों में महिलाओं पर हो रहे सभी तरह के अत्याचार एवं उनकी पृष्ठभूमि को चर्चा में ले आएं। हम इसे नजरअंदाज नहीं कर सकते कि महिलाओं का उत्पीड़न प्रशासनिक विफलता का परिणाम अवश्य है, लेकिन इसके सामाजिक कारण भी हैं। अत: स्त्रियों की स्वतंत्रता के लिए सभी संबंधित मोर्चो पर सक्रिय होने की आवश्यकता है।






