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वैश्वीकरण की चरमराती व्यवस्था

केविन रैफर्टी | Jan 06, 2013, 23:54PM IST
 
 

वैश्वीकरण यानी ऐसी अखंड दुनिया तैयार करना, जहां पर आर्थिक स्वतंत्रता और सबके लिए ज्यादा अवसरों की खातिर राष्ट्रीय सीमाएं गौण हो जाएं। इंटरनेट इस मामले में बड़ा समताकारी है, जिसके जरिए कोई भी व्यक्ति अपनी राय अखबार के संपादकों, प्रकाशकों या अन्य मीडिया के गहन फिल्टरों से गुजारे बगैर दुनिया में कहीं भी पहुंचा जा सकता है।
 
सुधींद्र कुलकर्णी ने हाल ही में अपनी किताब ‘म्यूजिक ऑफ द स्पिनिंग व्हील : महात्मा गांधीज मैनिफेस्टो फॉर द इंटरनेट एज’ में यहां तक कहा कि इंटरनेट महात्मा गांधी के सपने को साकार करने और ‘इंटरनेट सत्याग्रहियों’ को बढ़ावा देने में मदद कर सकता है।
 
पिछले 30 वर्षो में वैश्वीकरण व इंटरनेट ने एक-दूसरे को मजबूती प्रदान करते हुए जबरदस्त कामयाबियां हासिल कीं। इसने दुनिया को एक साथ जोड़ते हुए त्वरित संचार व्यवस्था कायम की। इसकी वजह से कारोबार और नौकरियों के नए-नए अवसरों का भी सृजन हुआ, जिससे दुनियाभर में करोड़ों लोगों को गरीबी से ऊपर उठने में मदद मिली। मगर आज अंतरराष्ट्रीय नेतृत्व की नाकामी, अमेरिका में राजनीतिक पंगुता की स्थिति और वैश्वीकरण व इंटरनेट की अवधारणाओं में मौजूद खतरनाक खामियों और विरोधाभासों के चलते इनसे मिलने वाले फायदे खतरे में पड़ गए हैं।
 
वर्ष 2012 के नए अंग्रेजी शब्दों के दावेदारों में एक शब्द था, ‘ऑम्निशैम्बल्स’, जिसका आशय है कि सब कुछ गड़बड़ है। वैश्विक राजनीतिक अर्थव्यवस्था के लिहाज से यह बात सर्वथा सत्य है। जहां तक दुनिया के अमेरिकी नेतृत्व का सवाल है तो यह मृतप्राय है। पर्यावरण संरक्षण से लेकर अटकी पड़ी विश्व व्यापार वार्ताओं तक कई ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर वॉशिंगटन अपेक्षित नेतृत्व नहीं दिखा सका। उदारता की जिस भावना ने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद यूरोप व वैश्विक अर्थव्यवस्था को तुरंत गति पकड़ने में मदद की और आधुनिक अर्थव्यवस्था की नींव रखी, वह आज गायब हो गई है।
 
मगर इसका क्या विलाप करें? साम्राज्य आते हैं और एक समय बाद खत्म भी हो जाते हैं। मगर यह अमेरिकी पराभव जिस समय हो रहा है, वह जरूर दुर्भाग्यपूर्ण है। अमेरिका नॉमिनल ग्लोबल जीडीपी में लगभग 25 प्रतिशत और क्रय शक्ति समता के मामले में 20 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ आज भी दुनिया की सबसे बड़ी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था व व्यापारिक शक्ति है। इसका मतलब यह है कि अगर अमेरिका को जुकाम होता है तो बाकी दुनिया को भी छींकें आने लगेंगी।
 
हालांकि चीन निमोनिया की गिरफ्त में नहीं आएगा, लेकिन इसकी विकास दर जरूर घटेगी और व्यापार का पैटर्न बदल जाएगा। भारत आर्थिक रूप से ज्यादा असुरक्षित नहीं है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय व्यापार इसकी अर्थव्यवस्था का एक छोटा हिस्सा है। मगर पुरानी आर्थिक शक्तियां तो अमेरिका से भी ज्यादा मुसीबत में हैं। यूरोपीय संघ राजनीति के अलावा आर्थिक मामलों में भी गंभीर संरचनात्मक खामियों से ग्रस्त है। दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था जापान के भी पिछले दो दशक से बुरे हाल हैं।   
 
यह सब देखकर लगता है कि भूमंडलीकरण प्रणाली चरमराने लगी है और इस पर तुरंत ध्यान देने की जरूरत है। नोबेल पुरस्कार विजेता जोए स्टिगलिट्ज ने वैश्विक आदर्शो को कमजोर करने वाली कुछ बड़ी खामियों की ओर इशारा किया है। उनका कहना है कि वैश्वीकरण के खेल के नियम अन्यायपूर्ण हैं और इनसे अमीर व ताकतवर देशों तथा कंपनियों को फायदा मिलता है। इसके अलावा विकास के प्रति तीव्र ललक के चलते अन्य मूल्य कमजोर पड़ जाते हैं। गरीब देश असुरक्षित हैं और आधुनिक बाजार अक्सर असमानता को बढ़ाने वाले होते हैं, जिनसे गरीबों का नुकसान होता है।
 
हालिया अतीत दर्शाता है कि स्टिगलिट्ज के तर्क ज्यादातर सही हैं। सरकारें समाधान का एक जरूरी हिस्सा हैं, लेकिन वे भूमंडलीकरण और इस नजरिए के लिहाज से समस्या का अनिवार्य हिस्सा भी बन सकती हैं कि इंटरनेट सबको फैलने के व्यापक अवसर मुहैया कराता है। थ्योरियां चाहे कुछ भी कहें, मगर दुनिया एक छोटा गांव बनने से काफी दूर है। 
 
‘अरब वसंत’ ने इंटरनेट के जरिए नए विचारों के व्यापक और उग्र तरीके से प्रसार की क्षमताओं को दर्शाया, जिससे सरकारें भी इसको लेकर सतर्क हो गई हैं। ईरान और चीन जैसे देशों ने अपने यहां इंटरनेट के इस्तेमाल के संदर्भ में कई नियम व शर्ते लाद दी हैं। हाल ही में दुबई में हुई अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ की बैठक में सरकारों ने दिखाया कि इंटरनेट को नियंत्रित करने की जंग अभी भी जारी है। लेकिन सख्त नियम लादने वाली सरकारें उस रचनात्मकता व कल्पनाशीलता का भी दम घोंट देंगी, जो इंटरनेट आर्थिक कायाकल्प की दिशा में ला सकता है। एक और खतरा तब आता है, जब सरकारें व कारोबारी हित साधने वाले ताकतवर लोग मिलकर काम करते हुए आर्थिक विकास के फायदों को अपने हिसाब से सजाते हैं।
 
इंटरनेट खुद भी कुछ ऐसी खामियों से ग्रस्त है, जिन्हें स्टिगलिट्ज पूंजीवाद के विकास के रूप में देखते हैं। इसका प्रमुख दोष है प्रवेश को नियंत्रित करने वाले कुछेक ताकतवर खिलाड़ियों द्वारा बाजार पर कब्जा करना। यहां तक ​​कि फेसबुक, जिसे दुनियाभर में लोगों को एक-दूसरे के साथ जुड़ने के नवीन तरीके के रूप में सराहा जाता है, भी उस मुक्त चरागाह से बहुत दूर है, जिसकी वर्ल्ड वाइड वेब के आविष्कारक सर टिम बर्नर्स-ली ने परिकल्पना की थी। इसके बनिस्बत यह ज्यादातर एक घिरा हुआ उद्यान है, जिसमें प्रवेश कंपनी के मालिक द्वारा नियंत्रित है, जिसके समक्ष प्रवेशकर्ताओं को अपने सीक्रेट्स सरेंडर करने पड़ते हैं। फेसबुक भी अपने सदस्यों या कहें कि बंदियों से ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने को लेकर प्रतिबद्ध है। 
 
वैश्वीकरण व इंटरनेट की आजादियों के संदर्भ में  अभी कई संघर्ष देखने बाकी हैं।
 
 
केविन रैफर्टी 
 
विश्वबैंक के पूर्व मैनेजिंग एडिटर व प्लेनवर्डस मीडिया के एडिटर इन चीफ

 

 

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