जनाक्रोश, कार्रवाई और समाधान
अभिज्ञान प्रकाश
| Dec 24, 2012, 23:26PM IST

यह बात हमारे सत्ताधीशों या सियासी हलकों में बैठे लोगों को अच्छी तरह समझ में आ गई होगी कि जनता के गुस्से या आक्रोश को बाहर निकलने के लिए हर बार किसी समाजसेवी, राजनेता या आंदोलन की जरूरत नहीं है। यह गुस्सा दुष्कर्म जैसे घिनौने अपराध के खिलाफ खुद-ब-खुद निकलकर बाहर आ सकता है। यदि सरकारें अब भी नहीं जागीं तो ऐसा आगे भी हो सकता है।
प्रधानमंत्री बयान दे चुके हैं, सोनिया गांधी भी विरोध करने वालों से मिल चुकी हैं। सभी शांति की अपील कर रहे हैं, जो कि सही है। लेकिन अब उन्हें कुछ मसलों पर ठोस कार्रवाई करके दिखाना होगा। मैंने अपने ‘न्यूज प्वाइंट’ और ‘मुकाबला’ जैसे टीवी शो के जरिए फास्ट ट्रैक अदालतों की तस्वीर सामने रखते हुए बताया कि यह बात एक नारे की तरह सामने आ रही है कि हमें फास्ट ट्रैक कोर्ट में मामले चलाने चाहिए। अब जरा हकीकत पर गौर फरमाएं।
हमारे देश में 1562 फास्ट ट्रैक अदालतें हैं, जिन्हें चलाने के लिए केंद्र से मिलने वाली वित्तीय मदद 2011 में बंद हो गई। अब इन्हें चलाना राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है। अभी तक इस देश में ऐसा कोई कानून नहीं है, जिसके हिसाब से दुष्कर्म जैसे घिनौने आपराधिक मामले स्वत: फास्ट ट्रैक अदालत में चले जाएं।
कोई भी मामला वहां के हाईकोर्ट के निर्देश के बाद ही फास्ट ट्रैक कोर्ट में जा सकता है और इसमें राज्य सरकार के सुझाव की अहम भूमिका होती है। राजस्थान के अलवर फास्ट ट्रैक कोर्ट का उदाहरण दिया जा रहा है कि कितनी जल्दी वहां पर फैसला आ गया और सजा सुना दी गई। लेकिन ऐसे भी तमाम उदाहरण हैं, जहां फास्ट ट्रैक कोर्ट में भी फैसले आने में सालों का समय लग गया।
यानी एक बार फिर यह बहस इस बात पर आकर रुकती है कि हमारे आपराधिक न्याय तंत्र में बेहतरी के लिए किस तरह के बदलाव की जरूरत है। देश देखना चाहता है कि चिंता जाहिर करने वाला राजनीतिक वर्ग इसे कितनी गंभीरता से लेता है।
अब पुलिस की बात करते हैं। लोगों को सबसे ज्यादा गुस्सा पुलिस और पुलिसिंग पर है। यह गुस्सा पूरी तरह जायज है। ज्यादातर लोगों का यही कहना है कि पुलिस अभी भी इस तरह के मामलों में पर्याप्त संवेदनशील नहीं है। अभी भी आम लोगों के लिए किसी थाने में एफआईआर लिखवाना आसान नहीं है। तमाम विशेषज्ञ पुलिस में सुधारों की जरूरत पर बल देते हैं। लेकिन ये सुधार करेगा कौन? ये भी तो उन्हें ही करने हैं, जो इस वक्त महज चिंता जता रहे हैं।
हमारी युवा पीढ़ी उनसे पूछना चाहती है कि वे इस मसले पर आगे क्या करेंगे। देश की सर्वोच्च अदालत ने कई मामलों में बहुत अच्छे और ऐतिहासिक फैसले दिए हैं, जिनमें से एक उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह की याचिका पर पुलिस में सुधारों को लेकर दिया गया फैसला है। उस फैसले में यहां तक कहा गया कि नियुक्तियां कब और कैसे की जाएं तथा जवाबदेही किसकी हो। यह देश के सुप्रीम कोर्ट की राय है। इस राय पर आज तक किसी ने क्यों नहीं बात की?
भाजपा नेता सुषमा स्वराज संसद का विशेष सत्र बुलाने की बात कर रही हैं, जो महत्वपूर्ण है। लेकिन पुलिस सुधारों को लेकर संसद में एक बड़ी बहस हो और कोई निर्णय सामने आए, इस पर एक एजेंडा क्यों तैयार नहीं हो पा रहा है?
सरकार और विपक्ष, दोनों ही पुलिस में सुधार के मुद्दे पर जोर-शोर से क्यों नहीं बोलते? मैं सर्वोच्च अदालत की एक और बात का जिक्र करना चाहूंगा। दुष्कर्म जैसे संगीन मामले पर तो बहस चल ही रही है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने छेड़छाड़ जैसे मामलों में भी कहा है कि इसे रोका नहीं गया तो यह समाज के लिए नासूर बन सकता है। इसके लिए लोकल पुलिसिंग पर जोर दिया गया है। जहां-जहां जरूरत हो, वहां-वहां पर सादे कपड़ों में ही सही, पुलिस की बेहतर तैनाती हो।
आम आदमी के मन में एक बड़ी धारणा, जो मौजूदा आक्रोश में भी निकलकर आ रही है, यह है कि पुलिस सिर्फ बड़े या वीआईपी लोगों के लिए है, हमारे लिए नहीं। इस धारणा को बदलने के लिए सरकारें क्या कर रही हैं? अगर जरूरत हो तो इस बात पर बहस हो कि क्या दो तरह के पुलिसबल की जरूरत है- एक आम आदमी के लिए और एक वीआईपी लोगों के लिए।
इसके अलावा वीआईपी सिक्युरिटी कितनों के लिए कितनी जरूरी है, उसका सही आकलन हो, जो देश के सामने रखा जाए। समाज में दिखावे के लिए वर्दी की घेराबंदी के इस सिलसिले को तोड़ना होगा। यह लोगों की हिफाजत करने के लिए बनी पुलिस, वीआईपी के लिए समाज में अपना जलवा दिखाने के लिए नहीं है। अपनी आमदनी का एक तिहाई हिस्सा कर के रूप में सरकार को देने वाला आम आदमी यह जानना चाहता है कि अगर सीसीटीवी कैमरे सही जगह पर नहीं लगे हैं और अगर लगे भी हैं तो वो सही तरह से काम नहीं कर रहे हैं, तो इसमें उसका क्या दोष। मिसाल के तौर पर दिल्ली की ही घटना में एक सीसीटीवी कैमरे में मिले फुटेज की मदद से उस बस को ढूंढ़ा जा सका, जिसमें ये घिनौना अपराध हुआ था। इस व्यवस्था को और सुदृढ़ करना होगा।
बहरहाल, ऐसे अपराधियों को क्या सजा हो, इस पर बहस शुरू हो गई है। लोगों का गुस्सा कड़ी से कड़ी सजा की मांग करता है। लेकिन यह देखना भी जरूरी है कि सजा कितने समय के भीतर हो। तभी उचित समाधान मिलेगा। हम जानते हैं कि कोई केस लंबा खिंचने की वजह से किस तरह गवाह बदल जाते हैं, जिससे केस कमजोर हो जाता है और आखिरकार अपराधी बच निकलते हैं। यह बहुत गंभीर प्रश्न है, जो जनता पूछ रही है। मेरे हिसाब से यह मौका है हमारे सियासतदान या सत्ता में बैठे लोगों के लिए कि वो इस गुस्से को समझें और ऐसे बदलाव लाएं, जिन्हें जनता प्रत्यक्ष देख सके। तभी लोगों के मन में विभिन्न मुद्दों पर उनके खिलाफ बनी धारणा बदल पाएगी।
अभिज्ञान प्रकाश
टीवी एंकर एवं वरिष्ठ पत्रकार






