वे हैं शौर्य, त्याग, संवेदना की जीवंत कविताएं
कल्पेश याग्निक
| Jan 01, 2013, 00:55AM IST

कलेजा मुंह को आ गया जब डॉक्टर ने बताया कि विशालिनी कभी बोल नहीं पाएगी। बच्ची ऐसी मासूम कि मृगछौना। हिरणी-सी आंखें तो कुछ कहतीं, किन्तु होठ लरज कर रह जाते। तिस पर यह कि कोई बीमारी नहीं है। बस कुछ साइकोलॉजी।
मां रेडियो में है। पिता बिजली का काम करते हैं। फिर एक डॉक्टर मिले। मां से कहा- बस बातें करते जाइए। बोलते जाइए। किन्तु क्या बोलूं? प्रश्न पूछते जाइए। प्रश्न-उत्तर-प्रश्न। मां तो मां ठहरी। बस प्रश्न पूछने लगी। उत्तर तो आना ही न था। फिर भी पूछती ही रही। कुछ ऊब गई तो फिर दक्षिण के जितने ग्रंथ थे, उनसे श्लोक सुनाने लगी। और नौ माह बाद, अचानक चमत्कार ही हुआ। बच्ची बोल पड़ी। और फिर तो मां और उसकी बेटी। विशालिनी पलयमकोट्टाई के अपने स्कूल जाने लगी। पढ़ती जाती। पढ़ती जाती। बढ़ती जाती। और ईश्वर की देन सामने आ गई। वह कुशाग्र बुद्धि रखती है, पता चल गया।
विलक्षण है, यह भी सामने आ गया। अभी 11 की ही हुई है- किन्तु मैंगलोर के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में दिग्गजों को दंग कर दिया। इन्फरमेशन टेक्नोलॉजी में हर जटिल प्रश्न का उत्तर है उसके पास। 8वीं में है वह - पर दक्षिण के चारों राज्यों के इंजीनियरिंग कॉलेज उसे दाखिला देने को तैयार हैं। वहीं रहकर कमाल कर रही है वह। देश- दुनिया के बड़े-बड़े लोग, कंपनियां आ रही हैं उससे हल मांगने।
जो अन्य न कर पाए, वह मां ने कर दिखाया। क्योंकि उसके पिता, रिश्तेदारों और शिक्षकों को विशालिनी के ‘वंडर किड’ होने का पता तो तभी चला, जब अपने सुख-चैन त्याग, मां ने प्रश्नों-श्लोकों की बांबी में स्वयं की तपस्या को बांध लिया।
यही तो अंतर है। पुरुष बच्चों को श्रेष्ठ जीवन, सुख-सुविधाएं तो देते ही हैं। किन्तु समय नहीं दे सकते। धर्य तो बिल्कुल भी नहीं और हारी-बीमारी में संघर्ष का तो प्रश्न ही नहीं। विवशताएं भी हैं। किन्तु त्याग करने के लिए नारी सा जीवट चाहिए। सेवा करना पुरुष के वश में नहीं। कब समझेंगे हम सुख देने और सेवा करने के विराट अंतर को?
वह घर ऐसा सजाती मानो सचमुच मां दुर्गा ही चुपके से आ रही हों। मंदिर, वस्त्र, दीपक, आरती। और भी न जाने क्या-क्या। हर त्योहार पर ऐसा ही। बच्चे खुश होते। पति को और क्या चाहिए था। किन्तु इन्हीं त्योहारों पर डर बना ही रहता। दिन में वह जितनी खुश हो सब कुछ करती, शाम तक उतना ही लड़ने लगती। छोटी सी बात पर भी गुस्सा सातवें आसमान पर। सब घबराते। क्या हो जाता है तुम्हें? पता नहीं। वह दुखी दिखती। और सब कुछ पहले जैसा। इस बार तो गजब कर गई। क्रिसमस पर ऐसी सजावट कर डाली कि भरोसा ही न हुआ। भला हम कहां क्रिसमस मनाते हैं? चलो, जैसा वह चाहे।
फिर रात को, हमेशा की तरह झगड़े के बाद, नींद आ गई। अचानक रात ढाई बजे देखा- वो रो रही थी। जग न जाए कोई, इसलिए रुक-रुक कर सिसक रही थी। दिल डूब सा गया। हुआ क्या? देखा- वो अपनी मां की हाथ से लिखी चिट्ठी लिए आंसू बहा रही थी। पीली पड़ चुकी उस चिट्ठी के नीचे लाख के कड़े थे। बड़े जतन से संभाले। बूंदी में बनते हैं। त्योहार पर ही तो मां के भयानक बीमार होने की खबर आई थी। घर से शहर के बड़े अस्पताल। और भी बड़े डॉक्टर। बेटी को देखते ही नातियों से फोन पर बात करने की मांग की थी। और फिर..। पति के मजबूत हाथ सहारा तो दे रहे थे- किन्तु उस दुख की थाह नहीं पा पाए। त्योहार पर गुस्सा इसलिए होती थी कि मां को ‘मिस’ कर रोती थी।
संवेदना। यही तो अंतर है। पुरुष संवेदनशील होते हैं। किन्तु संवेदना नारी की रगों में बहती है। पुरुष, पुरानी यादों को याद तो करते हैं, किन्तु ऐसा भी नहीं कि वो याद उनकी मौजूदा जिंदगी के साथ-साथ चले। दुखों को भीतर छुपाने में महारत हासिल है महिला को। वह रिश्तों को जीती है- चाहे अपने जीवित न रहें। और बताती भी नहीं। पुरुष जरा सा कुछ होने पर फट पड़ते हैं। वह फूटती ही इसलिए है कि बहुत कुछ न हो जाए। हम इस अंतर को कभी नहीं समझ पाएंगे।
भारी चहल-पहल के बीच ध्यान बरबस ही खिंचा। वह एक सभ्रांत, प्रभावी और तीखे नैन-नक्श की महिला थी। महिला अफसर। आर्मी की। यूनिफॉर्म में। भीड़ में अलग ही दिख रही थी। मैंने देखा, हमारे साथ वाले सभी उसे देख रहे थे। ‘ग्रेसफुल है यह ऑफिसर’, एक ने कहा। ध्यान से देखो, कैसा अहंकार है उसके चेहरे पर। तीसरे ने कहा फौजी ऑफिसर नहीं तो क्या हाउस वाइफ करेंगी घमंड? अचानक देखा जान-पहचान की आंटी उस सैन्य शख्सियत से बात कर रही थीं। वह, जैसी कि होगी ही, गंभीर ही बनी रही। रिजर्व। फिर वह चली गई। चाल में एक खास सख्ती। आंटी इधर ही आ रही थीं। हालचाल के बाद साथी पूछ बैठे- वो फौजी इतना घमंड क्यों दिखा रही थी? ..ओह, वो। पति को सलामी देकर जा रही थी। कारगिल युद्ध में शहीद हो गए। ये डॉक्टर है आर्मी में। सेल्यूट। बच्च छोटा है। गौरव से चेहरा दमक रहा है। शादी के दिन से ही तेजस्वी बन गई। घमंड नहीं, गर्व है उसे। शौर्य। हम शर्मिदा हो गए।
कब घमंड और गर्व में फर्क करना जानेंगे। पढ़े किन्तु गढ़े नहीं। पुरुष और महिला में यह सबसे बड़ा अंतर है। हमारा साहस बाहरी है। महिलाओं का भीतर। हमारी हिम्मत की हम दाद बटोर लेते हैं। उनकी जिंदगी ही हिम्मत। अपनों को खोने से हम बिखर जाते हैं। वह अपना दुख सीने में दफन कर, बच्चों में खुशियां बिखेरने के पवित्र जतन करती चली जाती है। करती चली जाती है। रहेगी। हम पुरुष, नहीं गहराई में उतर पाएंगे।
तो आइए नववर्ष में हम महिलाओं को उनके शौर्य, त्याग, संवेदना के माध्यम से समझने की नए सिरे से पहल तो करें।
यह नववर्ष ही नारी को समर्पित करें।






