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निंदा रस को ही मिले दसवें रस का दर्जा

अनुज खरे | Jul 09, 2012, 00:17AM IST
 
 

बुराई या निंदा करने को कला के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए। करने वाले का कलाकार-सा सम्मान होना चाहिए। जिस कला का प्रदर्शन प्रतिदिन करोड़ों लोगों द्वारा किया जा रहा है, उसके प्रति उपेक्षा का रवैया क्यों? कला संरक्षण का दावा करने वाली सरकारों की ओर से उदासीनता की वजह क्या? बुराई करने में लगने वाला धर्य, साधना, शब्दशक्ति, तर्क, अभ्यास किसी अन्य कला से कमतर है क्या?
इतनी पुरातन कला के प्रति नफरत का ऐसा भाव क्योंकर?
वक्त के सामने यह यक्ष प्रश्न है!

किसी की बुराई करते मनुष्य का चेहरा देखिए, मानवता अपने सर्वोच्च स्तर पर दिखाई देगी। इस कला के प्रदर्शन के लिए बहुत ताम-झाम नहीं चाहिए। बस एक अदद मुंह होना चाहिए। मुंह बिजी हो तो इशारे वगैरह से भी काम चलाया जा सकता है। बस, मन में लगन होनी चाहिए। सीने में अगन होनी चाहिए। कई साधक तो इतने अयासी होते हैं कि कुंडलिनी जाग्रत करने तक की अवस्था में पहुंच जाते हैं। इस तरह के अयासियों को कोई अदद दिख भर जाए, पांच मिनट तक उसका अध्ययन कर कला का प्रदर्शन प्रारंभ कर सकते हैं।

‘देखो, कैसे खड़ा है?’
‘भाईजी, ये छिछोरे दूर से ही दिख जाते हैं।’
‘देखो-देखो, उसकी आंखें पक्का छिछोरा नहीं दिखाई देता आपको?’
‘भैरानापन तो देखिए साहब, कैसे प्लेटें भरकर भकर-भकर खा रहा है।’
‘क्यों भई ये वोई नहीं है, जिसे पब्लिक चप्पलें मार रही थी। छेड़ रहा था किसी लड़की को..?’
‘भाई साब, इसे देखिए, ये आपको लुच्चा ज्यादा लगता है या टुच्चा?’

कुल जमा साढ़े पांच मिनट पहले ही तो देखा है। इसे कहते हैं लगन। अभ्यास! तेज नजरें! विश्लेषण की अद्भुत क्षमता! उपयुक्त शब्दावली! वॉइस मॉड्यूलेशन! पूरा बारीक सिलेबस ही है इस निंदा कला का।
इस दौरान साधक का चेहरा देखिए आप, उसकी प्रखरता देखिए। सब अवर्णनीय ही मिलेगा। आत्मसंतोष से दिपदिपाता चेहरा। ऐसे बह्म ज्ञानी चेहरे देखकर ऋषि-मुनि तक चरणों में लोट-लोट जाएं। आवाज में अद्भुत ऊर्जा! चेहरे की अद्भुत भाव-भंगिमाएं! सात रस, आठ प्रकार के स्वांग से भरपूर! अभिनेता देख लें तो घर के पास वाले सरकारी नल से पानी भरकर लाने लगें। ऊपर से सहजता! सधे शब्दों का चयन! सब पारलौकिक!
कई किताबें, सैकड़ों अध्याय निकल आएं। हां यदि दिक्कत इस बात की है कि कला को सिखाएगा कौन तो जान लीजिए आपको नजर दौड़ाने भर की देर है, सभी दिशाओं से विशेषज्ञों का हुजूम उमड़ने लगेगा।
इस कला का उद्देश्य बड़ा सीधा-सादा-सा होता है। टारगेट के व्यक्तित्व को दलदल में डुबोकर मारना। उसकी संपूर्ण छवि दलन कर देना।
प्रदर्शन के दौरान इतनी तल्लीनता कि चाहे घर में आग लग जाए, चाय ठंडी हो जाए या कोई पर्स ही मार दे, पर मजाल है कि ऊर्जा में तनिक भी कमी आ जाए। निंदा करने वाले पुराने लोग मिट्टीपकड़ होते हैं। कई बार यूं ही समाज कल्याण के लिए भी वह ये सब कर गुजरते हैं।

मैं फिर मूल बात पर पहुंचता हूं। क्यों नहीं हम इसे कला का दर्जा देते? वैश्विक स्तर पर प्रदर्शन का प्रबंध करते? लोग अपने दम पर भला कब तक इसे संरक्षित कर पाएंगे? सरकार इसमें प्रदर्शन के लिए राष्ट्रीय या राज्यस्तरीय प्रतियोगिता का आयोजन कराने लगे तो बढ़िया। जीतने वाले को अपने क्षेत्र की जनता की नुमाइंदगी करने का मौका भी दे। चुनावी खर्चा बचेगा, क्योंकि आजकल जो चुनावों में और उसके बाद होता है, उसे करने के लिए कोई कलाकार मिलेगा तो सोचिए स्तर कितना बढ़ेगा। सोचिए..सोचिए। अब भाई साब आप इस दिशा में सोचने की जहमत भी नहीं उठा सकते क्या?
 
 
 

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