कोई कहीं भी, कैसे भी लड़े लड़ते रहना चाहिए
कल्पेश याग्निक | Aug 04, 2012, 03:16AM IST
समर्थक हैरान हैं। दो विरोधी विचार। पहला बचाव में। दूसरा गुस्से में। बचाव अन्ना का। गुस्सा टीम पर। बचाव तकरें से। राजनीति एकमात्र रास्ता। गुस्सा तथ्यों से। कांग्रेस बन जाएंगे। या कि भाजपा। क्या अंतर बचेगा? सरकार जैसे दिखेंगे। लक्ष्य छोड़कर भटकते।
सत्ताधीश खुश हैं। उनकी बात चली। कह दिया था। वैसा ही हुआ। लोकपाल मुद्दा खत्म। भ्रष्टाचार फिर शुरू। यानी बहस लौटेगी। और लौटेंगे विवाद। चलेंगे चुनाव तक। जिनमें वे माहिर। जिनमें अन्ना कमजोर। काफी समय है। लंबे दो साल। राजनीति का क्या? हर पल अलग। और वोटर बेचारे! हमेशा ठगे जाते। भ्रष्टाचार का क्या? आज मुद्दा है। कल नहीं होगा। नहीं होने
देंगे। कुछ कर देंगे। ‘संपूर्ण क्रांति’ देखी। आपातकाल लगा दिया। अत्याचार किए;
देखे। चुनाव करवाए; हारे। विपक्षी एकता देखी। लड़खड़ाते गिरते देखा। सरकार का क्या? कल गई थी। आज फिर है। विपक्ष का क्या? अन्ना का क्या? देश ऊंघना चाहिए। लोग सोने चाहिए।
लोग सचेत हैं। भारी बहस है। सही, गलत पर। जेपी का उदाहरण। वीपी से तुलना। गांधी क्यों कहा? कुछ को पछतावा। लेकिन लोग हैं। उन्हें जल्दी नहीं। लोग ताकत हैं। लेकिन सिर्फ ताकत। वे तंत्र नहीं। कानून बनवा सकते। बना नहीं सकते। इसीलिए मौका देते। हर तरह से। सड़क पर लड़िए। सीमा पर लड़िए। शांति से लड़िए। उग्र होकर लड़िए। सीधे-सीधे लड़िए। रणनीति बनाकर लड़िए। रामलीला में आइए। जंतर मंतर कीजिए। राजनीति में लड़िए। या संसद में। बस, भ्रष्टाचार मिटाइए। टीम वही लड़े। या नई बने। भाषा परिपक्व हो। या चुभती हुई। लोग समझते हैं। सब पता है। समझदारों का क्या? घोटाले किसने किए? कानून कैसे टूटे? भरोसा किसने तोड़ा? लोग जानते हैं।
इसीलिए, स्पष्ट है। अनशन इज़ डेड। लॉन्ग लिव द वॉर। भ्रष्टाचार विरोधी युद्ध।
जारी ही रहेगा। लोग जारी रखेंगे।
(आंदोलन के पहले चरण की समाप्ति पर ‘9 अप्रैल-2011’ के अंक में भास्कर ने लिखे थे- दो शब्द। आज इस परिणति पर हैं- तीन शब्द )






