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विपक्ष को सब गलत ही क्यों लगता है?

dainikbhaskar.com | Sep 27, 2012, 11:41AM IST
श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने विपक्ष में बैठने के लिए मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था। अटलबिहारी वाजपेयी को नेहरूजी भविष्य का नेता बताते थे, तो अटलजी ने इंदिरा को दुर्गास्वरूपा कहा था। हालांकि बाद में इस पर विरोधाभास भी खड़ा हुआ। पक्ष-विपक्ष के नेता सिर्फ तारीफ नहीं, विरोध भी करते थे। लेकिन तर्क और तथ्य के साथ। लेकिन अब विरोध केवल इसलिए किया जाता है कि वो विपक्ष में हैं। और उन्हें ये करना ही है।
एफडीआईत्न भाजपा ने ऐलान किया कि वह सत्ता में आई तो रिटेल में एफडीआई को रद्द कर देगी। कांग्रेस कह रही है कि एफडीआई से देश को फायदा होगा। सच कौन बोल रहा है? क्योंकि भाजपा खुद 2002 में रिटेल में एफडीआई लाना चाहती थी। इसके लिए कई तर्क भी रखे थे। वहीं मनमोहनसिंह जो आज इसकी तारीफ कर रहे हैं, उन्होंने तब राज्यसभा में कहा था कि हमें ऐसा विकास नहीं चाहिए जो रोजगार ही छीन ले। इन तथ्यों को खुद ममता बनर्जी ने दो दिन पहले फेसबुक पर अपलोड किए। लेकिन ऐसा पहली बार नहीं हुआ।

एटमी करारत्न वाजपेयी सरकार ने एटमी परीक्षण किया। कई देशों ने प्रतिबंध लगाए। तब कांग्रेस ने कहा देश को नुकसान हुआ। लेकिन यूपीए की सरकार बनी तो मनमोहन सिंह ने अमेरिका से एटमी करार के लिए सरकार को ही दांव पर लगा दिया। तब विपक्ष में बैठी भाजपा कह रही थी कि इससे देश को नुकसान होगा।

जनलोकपालत्न ४२ साल से संसद में अटका हुआ है। १क् बार तो विधेयक पेश हो चुका है। कांग्रेस की सरकार प्रस्ताव लेकर आती तो विपक्ष विरोध करता। लेकिन जब राजग सरकार प्रस्ताव लेकर आई तो कांग्रेस ने विरोध किया। और जब अन्ना के आंदोलन का दबाव बना तो यूपीए और राजग दोनों विपक्ष बन गए। बिल सिलेक्ट कमेटी के जिम्मे चला गया।

हालांकि संविधान ने विपक्ष की भूमिका गिनाई है। मसलन सरकार में बैठे दल की मनमर्जी पर अंकुश लगाना। शासन की खामियों की लोगों तक ले जाना। वैकल्पिक राजनीति की जमीन तैयार करना। लेकिन होता इसके उलट है।
  
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