उत्तर कोरिया सवा दो करोड़ लोगों का छोटा-सा गरीब देश है, लेकिन उसके नेता किम जोंग-इल का निधन अंतरराष्ट्रीय राजनीति की बड़ी घटना माना जा रहा है। दुनिया के ज्यादातर लोगों ने इस नेता का नाम भी नहीं सुना होगा, लेकिन दुनिया का कोई बड़ा राष्ट्र ऐसा नहीं है, जिसके नेता ने जोंग-इल को श्रद्धांजलि न दी हो। इसका कारण क्या है?
यहां श्रद्धांजलि का अर्थ श्रद्धा बिल्कुल नहीं है। उत्तर कोरिया के नेता के प्रति सच्ची शोक-संवेदना या श्रद्धा तो दुनिया के सिर्फ दो ही राष्ट्र प्रकट कर सकते हैं। एक तो पाकिस्तान और दूसरा चीन! उत्तर कोरिया ने पाकिस्तान को प्रक्षेप्रास्त्र-तकनीक प्रदान की, जिसका फायदा उठाकर उसने गौरी-मिसाइल बनाया और पाकिस्तान ने उसे यूरेनियम संवर्धन और कुछ दूसरे गुर सिखाए, जिसके आधार पर उसने परमाणु बम बनाए। चीन ने पाकिस्तान और उत्तर कोरिया-इन दो बगलबच्चों को गोद ले रखा है। सामरिक गोद! पाकिस्तान को भारत के विरुद्ध और उत्तर कोरिया को दक्षिण कोरिया के विरुद्ध खड़ा करके वह अपनी विदेश नीति के मूल लक्ष्यों को सिद्ध कर रहा है। दक्षिण कोरिया अमेरिका का बगलबच्चा है।
दुनिया के अन्य राष्ट्रों के लिए किम जोंग-इल का निधन गहरी उत्सुकता और चिंता का विषय है। इसके तीन कारण हैं। पहला तो यह कि उत्तर कोरिया परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र है। उसने परमाणु अप्रसार संधि पर पहले हस्ताक्षर किए थे, लेकिन बाद में उसने उस संधि को रद्द कर दिया यानी उसने अपने आपको दुनिया की अन्य सर्वमान्य पांच महाशक्तियों को पंगत में बिठा दिया। यह एक तरह की दादागीरी और जबरन घुसपैठ की कोशिश की थी। यों तो परमाणु बम भारत और पाकिस्तान ने भी बनाए लेकिन इन देशों और इजरायल ने परमाणु अप्रसार संधि पर कभी दस्तखत नहीं किए थे। उत्तर कोरिया ने दस्तखत करके उसे रद्द किया, इस घटना ने उसे सारे विश्व में कुख्यात कर दिया। लोगों को आश्चर्य हुआ कि एक छोटा-सा देश, जिसमें लगभग 20 लाख लोग भुखमरी से मर गए, वह इतना दुस्साहस कैसे कर सका? यह चीन का कारनामा है, यह सबको पता चल गया। अब दुनिया को यह चिंता लगी हुई है कि किम इल-जोंग के जाने के बाद उत्तर कोरिया कहीं उन परमाणु बमों को किसी देश पर फेंक न दे? खासतौर से दक्षिण कोरिया और जापान पर! इन दोनों पड़ोसी देशों से उसका विवाद निरंतर चलता रहता है।
उत्तर कोरिया की इस परमाणु उच्छृंखलता को देखते हुए ही पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बुश ने इस देश को भी इराक और ईरान के साथ ‘त्रिराक्षस’ कहा था। बुश के पहले क्ंिलटन ने कोशिश की थी उत्तर कोरिया को थोड़ा मर्यादित किया जाए लेकिन बुश ने बाकायदा झगड़ा ही मोल ले लिया था। इधर छह राष्ट्रों ने मिलकर किम जोंग-इल को तैयार किया था कि वे अपना परमाणु कार्यक्रम बंद करें और उसके बदले में उन्हें अपूर्व आर्थिक सहायता दी जाए। अब उनके निधन से यह पहल अधर में लटक सकती है, क्योंकि कोरिया में शोक-काल लंबा चलता है। किम जोंग-इल ने अपने पिता किम इल-सुंग के निधन (1994) के बाद तीन साल तक सारे कामकाज ठप कर दिए थे। जोंग-इल के निधन पर चिंता का पहला कारण यही है।
चिंता का दूसरा कारण यह है कि जोंग-इल का उत्तराधिकारी उनका तीसरा बेटा किम जोंग-उन है। वह अभी सिर्फ 28 साल का है। उसे पिछले साल ही ‘महान उत्तराधिकारी’ घोषित किया गया था। उसके दोनों बड़े भाई वीतराग और ऐय्याश है, इसलिए जोंग-उन को तख्ता-पलट का डर नहीं है। इसके अलावा उसकी बुवा और उसके फूफा पूरी तरह से उसके साथ हैं। वे दोनों काफी अनुभवी और प्रभावशाली हैं। तीसरा बेटा होने के बावजूद पिता की अंत्येष्टि भी जोंग-उन ही करेंगे। फौज और नौकरशाही उनके साथ है। इस छोटे-से राष्ट्र की फौज में 11 लाख सैनिक हैं। यह दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी फौज है।
दुनिया की महाशक्तियां इसी चिंता में हैं कि यह अनुभवहीन नौजवान उत्तराधिकारी कहीं इस विशाल फौज और परमाणु बमों का बेजा इस्तेमाल न कर दे। जोंग-उन ने पिछले तीन-चार साल में सार्वजनिक तौर पर न तो कुछ ऐसे काम किए हैं न ही ऐसे बयान दिए हैं, जिनसे यह अंदाज लगाया जा सके कि अब सत्तारूढ़ होने पर वे क्या करेंगे? वे एक बंद किताब की तरह हैं लेकिन इस नौजवान की शिक्षा-दीक्षा और लालन-पालन कुछ अलग तरह से हुआ है। इसके दादा रूसी कम्युनिज्म की उपज थे और इसके पिता पर शीतयुद्ध और चीन का साया था लेकिन यह स्विट्जरलैंड में पढ़ा है, जर्मन और फ्रेंच जानता है तथा ऐसे माहौल में पला-बढ़ा है, जो बहुत ऐश्वर्यपूर्ण रहा है। आवश्यक नहीं कि यह अपने दादा और पिता का अंधानुकरण करे। यह भी संभव है कि उसकी आधुनिकता उसे अपने दादा की ‘जूचे’ विचारधारा और रूसी-चीनी साम्यवाद की सड़ी-गली गिरफ्त से बाहर निकाल ले जाए। अपने देश की सतत गरीबी और भुखमरी दूर करने के लिए वह चीन, जापान और अमेरिका जैसे देशों के साथ, हो सकता है कि, सम-सामीप्य की नीति बनाए। पश्चिमी देश अपनी आर्थिक परेशानियों के बावजूद ऐसी किसी भी संभावना का स्वागत करेंगे। इसीलिए जोंग-इल के निधन पर शक्तिशाली राष्ट्रों ने शोक-संवेदनाएं भिजवाई हैं।
अमेरिका और भारत जैसे देशों के लिए जोंग-इल का आकस्मिक निधन इसलिए भी चिंता का विषय है कि उनके निधन के बाद उत्तर कोरिया कहीं चीन का एक प्रांत ही न बन जाए। अपने पिता के निधन के कई वर्षों पहले से जोंग-इल उत्तर कोरियाई जनता के कंठहार बन गए थे, लेकिन जोंग-उन की अस्पष्ट लोकप्रियता का फायदा उठाकर कहीं उत्तर कोरिया को चीन अपना हथियार न बना ले, यह डर सभी प्रमुख देशों को है। चीन और उत्तर कोरिया के बीच सीमा-जैसी कोई चीज नहीं है। कोई भी संकट होने पर हजारों-लाखों कोरियाई चीन में चले जाते हैं। उत्तर कोरिया की अर्थव्यवस्था (और राज्य व्यवस्था भी) प्रकारांतर से चीन ही चलाता है। भारत का दक्षिण कोरिया के साथ गहरा आर्थिक और सामरिक सहकार है। अमेरिका का तो है ही। ऐसे में इन दोनों देशों का उत्तर कोरिया के भविष्य के प्रति चिंतित होना स्वाभाविक ही है। राष्ट्रपति ओबामा ने जोंग-इल के निधन की खबर सुनते ही दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली म्यूंग वाक से फोन पर बात की। डर यह भी है कि उत्तर कोरिया में सत्ता-परिवर्तन के माहौल में कहीं दक्षिण कोरिया कोई उत्तेजनापूर्ण कार्रवाई न कर दे। अभी जर्मनी की तरह दोनों कोरिया के एकीकरण का सपना तो दूर की कौड़ी है।