समाज में फ्रस्ट्रेट लोगों की संख्या बढ़ी : अरुणा ब्रूटा
अरुणा ब्रूटा | Dec 18, 2012, 14:30PM IST
मशहूर मनोचिकित्सक अरुणा ब्रूटा कहती हैं कि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली एक बार फिर शर्मसार हो गई है। साढ़े नौ बजे रात में एक लड़की, जो अपने पुरुष मित्र के साथ एक बस में सवार हुई, उसके साथ बलात्कार वह भी गैंग रेप हो जाता है। उसके पुरुष मित्र की बेरहमी से पिटाई की जाती है। लड़की के साथ गैंग रेप और पुरुष मित्र की पिटाई के बाद उन्हें चलती बस से फेंक दिया जाता है। लड़की के साथ इतनी ज्यादती हुई कि चिकित्सकों के मुताबिक उसकी हालत नाजुक है। इस हादसे के कई पहलू हैं, जिस पर समाज को वाकई में चिंतन करने की जरूरत है। पहली बात तो यह है कि नई दिल्ली, जो कि राष्ट्रीय राजधानी का क्षेत्र है, वहां कानून और व्यवस्था की हालत इतनी खस्ताहाल क्यों है। क्यों अपराधियों के हौसले इतने बढ़े हुए हैं कि उन्हें किसी बात का डर नहीं सताता।
देश के तमाम बड़े प्रभावशाली लोग जिस शहर में रहते हैं, वह महिलाओं के लिए इतना असुरक्षित क्यों हो गया है। रात के साढ़े नौ बजे और वह भी एक पुरुष साथी के साथ चलना क्यों दूभर होता जा रहा है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि नई दिल्ली महिलाओं के लिहाज से बेहद असुरक्षित शहर हो गया है। इसका जवाब केंद्र सरकार, राज्य सरकार और दिल्ली पुलिस को तलाशना चाहिए। अगर देश की राजधानी में कानून व्यवस्था का कोई डर नहीं होगा तो दूरदराज के इलाकों का अंदाजा अपने आप लगाया जा सकता है। तो पुलिस और शासन व्यवस्था को ध्यान देने की जरूरत है, नहीं तो एक दिन आम लोगों का भरोसा इस व्यवस्था से उठ सकता है।
इस मामले का एक दूसरा पहलू है, जो सामाजिक और आर्थिक मूल्यों से जुड़ा है। हमें बार-बार यह तस्वीर दिखाई जाती है कि भारत आर्थिक तरक्की की राह में तेजी से बढ़ रहा है। नई दिल्ली में मल्टीनेशनल कंपनियों की चमकदार इमारतें रातोरात खड़ी हो रही हैं। फाइव स्टार होटलों की संख्या बढ़ती जा रही है। मल्टीनेशनल कंपनियों में मोटी-मोटी तनख्वाह पाने वाले युवाओं की संख्या तेजी से बढ़ रही है। आकाश चूमती इमारतों में लोग अपना आशियाना बनाने लगे हैं। सड़कों पर करोड़ों रुपए वाली गाडिय़ां दौड़ती दिखती हैं। यह चमकदार दिल्ली या मुंबई की तस्वीर हो सकती है। लेकिन इसी चमकदार शहर की एक दूसरी तस्वीर भी है, जो आम लोगों को नहीं दिखाया जाता है। इस तस्वीर में वह तबका है, जो दिन भर की मजदूरी के बाद भी मुश्किल से शहर में रहने लायक सुविधाएं जुटा पाता है। उसे आधारभूत सुविधाएं नहीं मिलती हैं। पढ़ाई-लिखाई करने के बाद भी उसे काम
नहीं मिलता। नौकरी नहीं मिलती। सीमित आमदनी के बीच लगातार महंगाई से वह तालमेल नहीं बिठा पाता है। ऐसा तबका हमेशा फ्रस्ट्रेशन में रह रहा है। समाज में आर्थिक असमानता हाल के सालों में जिस तरह से बढ़ी है, उसके चलते ही समाज में फ्रस्ट्रेट लोगों की संख्या बढ़ी है। ऐसे तबके का रवैया आक्रामक और हिंसक होता है। वह मौका मिलते ही किसी तरह का भी अपराध कर डालता है। उसे सामाजिक मान्यताओं और कानून-व्यवस्था की परवाह नहीं होती। ऐसे युवा अपने गुस्से पर काबू नहीं रख पाते। उन्हें गुस्से के
दौरान होने वाले अपराधों की गंभीरता का एहसास भी नहीं होता है।
इस तरह के युवाओं में एक तबका वह भी है, जो महिलाओं से खुद को असुरक्षित महसूस करने लगा है। दरअसल आज के दौर की एक वास्तविकता यह भी है कि अब लड़कियां कहीं ज्यादा बड़ी संख्या में घर-परिवार से बाहर निकलकर कामकाजी दुनिया में अपनी जगह बना रही हैं। चाहे वह दसवीं का स्कूली परीक्षा परिणाम हो या फिर बारहवीं का रिजल्ट, सब जगह लड़कियां लड़कों के मुकाबले बेहतर कर रही हैं। कामकाजी दुनिया हो या कॉरपोरेट दुनिया, वहां भी महिलाएं अपनी जगह मुस्तैदी से मजबूत कर रही हैं। तो पहले से फ्रस्ट्रेट युवाओं में युवतियों को लेकर एक अलग तरह के जलन का भाव भी बढ़ रहा है। लिहाजा वह मौका मिलते ही लड़कियों को कमतर साबित करने की कोशिश करता है। उसके अवचेतन मन में महिलाओं के प्रति घृणा का भाव लगातार मजबूत होता रहता है और कई बार यह बलात्कार जैसे घिनौने अपराध तक पहुंच जाता है।
जहां तक बलात्कार की बात है, तो यह केवल महिलाओं और युवतियों के साथ होने वाला हिंसक अपराध नहीं है बल्कि यह समाज में तेजी से पनप रही मनोविकार की संस्कृति है। ज्यादातर मामलों में देखा गया है कि बलात्कार करने वाला मनोरोगी होता है। हमारे आसपड़ोस में ऐसे मनोरोगियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। मनोचिकित्सा के व्यवहार में यह
भी देखा गया है कि ऐसे लोग 'चोर चोर मौसेरे भाई' की तरह जल्दी ही आपस में एकजुट हो जाते हैं। यही वजह है कि एक लड़की के खिलाफ एक साथ पांच-छह-आठ लोग तक अपराध करने का दुस्साहस करते हैं।
वैसे इस तरह के अपराधों के लगातार बढऩे के पीछे हमारा ही समाज है क्योंकि अपराध करने वाले तो किसी बाहरी दुनिया से नहीं आते। जब कोई गंभीर मामला सामने आता है तो जोर-शोर से आवाज उठती है लेकिन उसके बाद क्या होता है। हमारा समाज पुरुष सत्तात्मक समाज है। इस समाज में महिलाओं की स्थिति हमेशा दोयम दर्जे की रही है। आप किसी भी घर को देख लीजिए, वहां महिलाओं की स्थिति बेहतर नहीं दिखती। उस पर तरह तरह की बंदिशें हैं, उसे रोजमर्रा की जिंदगी में अत्याचार का सामना करना पड़ता है।
रात को शराब के नशे में धुत आने वाला पुरुष रोज रोज अपनी पत्नी के साथ मारपीट करता है और बलात्कार करता है। बलात्कार और महिलाओं के साथ हिंसा का कोई न कोई रूप तो आम घरों में मौजूद होता है। खर्चे के लिए उसे गिनकर पैसे दिए जाते हैं, वह क्या पहनती हैं, कहां जाती हैं, क्या करती है, सब पर अंकुश रहता है। तो घर में महिलाओं के साथ इस तरह के अत्याचारों को देखने-सुनने वाला शख्स बाहर सड़क पर महिलाओं के साथ कहां से इज्जत से पेश आएगा।
ऐसे में एक बड़ा सवाल यह उठता है कि इस तरह की मनोविकृति वाले समाज के साथ हम किस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। यह हालात बदल सकता है। इसके लिए हमें अपने-अपने घरों से शुरुआत करनी होगी। हमें महिलाओं को बराबरी का दर्जा देना होगा। जब आप महिलाओं की घर में इज्जत करेंगे तभी बाहर इज्जत कर पाएंगे। जब तक घरों के अंदर बराबरी नहीं होगी, एकसमान स्तर का व्यवहार नहीं होगा, तब तक पुरुष महिलाओं से खुद को कुंठित महसूस करता रहेगा और महिलाओं को नीचा दिखाने के लिए तरह-तरह के अपराधों में लिप्त भी रहेगा। लिहाजा पुरुषों को अपने नजरिए में बदलाव की शुरुआत करनी होगी। यह शुरुआत जितनी जल्दी हो, उतना ही समाज के लिए अच्छा रहेगा।






