श्रीराम की कृपा यदि है तो जीवन जैसा भी है सुंदर है
Source: पं. विजयशंकर मेहता | Last Updated 00:29(07/02/12)
यह सवाल सबके मन में उठता है कि भगवान से जब हम रिश्ता रखें तो उनसे कुछ मांग की जाए या नहीं। कुछ भक्त कहते हैं कि जब भगवान भक्तों के मन की बात जानते ही हैं तो फिर मांगने से क्या मतलब। लेकिन कुछ का कहना है कि यह हमारा अधिकार है। वो परमपिता हैं, हम उनकी संतान हैं। दरअसल परमात्मा को देखने की हमारी दृष्टि शुद्ध नहीं होने के कारण हम परमात्मा को वैसा देखते हैं, जैसा हम देखना चाहते हैं।
हमारी धारणा हावी हो जाती है और परमात्मा के मूल स्वरूप पर एक परदा पड़ जाता है। हम छोटे हैं और वह विराट। इसलिए यह बहस भक्तों में चलती रहती है कि भगवान से मांगा जाए या नहीं। भगवान से मांगा भी जाए तो ऐसा मांगा जाए कि मांग भी लगे और न भी लगे। इस मामले में हनुमानजी का दृष्टिकोण बिल्कुल साफ है।
सुंदरकांड में जब वे अपनी बातों से मां सीता को संतुष्ट कर रहे होते हैं, उस समय इस बात को लेकर बहुत प्रसन्न हो जाते हैं कि भगवान उन पर कृपा करेंगे। अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुं बहुत रघुनायक छोहू।। करहुं कृपा प्रभु सुनि काना। निर्भय प्रेम मगन हनुमाना।। हे पुत्र! तुम अजर बुढ़ापे से रहित, अमर और गुणों के खजाने होओ। श्रीरघुनाथजी तुम पर कृपा करें। ‘प्रभु कृपा करें’ ऐसा कानों से सुनते ही हनुमानजी पूर्ण प्रेम में मग्न हो गए। हनुमानजी ने भक्तों को एक शब्द दिया है ‘कृपा’। यदि परमात्मा से मांगना ही है तो कृपा मांगना। इस कृपा में सबकुछ शामिल है, हमारी याचना और देने का उसका अधिकार। उसकी कृपा यदि जीवन में है तो जीवन जैसा भी है, उसी की देन है। सुंदर जीने की यही परिभाषा है।