असांजे की आत्मकथा और असमंजस
Source: एम.जे. अकबर | Last Updated 00:57(23/10/11)
जब विकीलीक्स के जनक, जूलियन असांजे किसी संभावित मित्र को संक्रामक शत्रु बनाते हैं, तो वे ऐसा हमेशा एक ‘ऊंचे ध्येय’ के नाम पर करते हैं। एक ऐसे युग में, जहां सूचनाएं अग्रपंक्ति का हथियार बन चुकी हैं, इस तरह के स्वछंद विद्रोही जरूरी भी हैं।
आप युद्ध के मैदान में हर बार सत्ता-शक्ति जीत सकते हैं, जब योद्धा यह घोष सुनें कि उनके चाटुकारों ने उनके मनमाफिक चुटकुलानुमा किस्सों को दर्ज करना और इसे इतिहास कहना शुरू कर दिया है। लेकिन सत्ता-शक्ति को बनाए रखना कहीं ज्यादा जटिल कला है।
जैसा कि असांजे ने लिखा है, स्तालिन इंटरनेट को पसंद करते, जो किसी तानाशाह के पुरालेखों के लिए आदर्श गोदाम बन सकता है। सूचनाओं के धूर्ततापूर्ण प्रयोग के लिए आपको या तो उन्हें विकृत करना होता है या गोपनीय रखना पड़ता है। पुराने सोवियत संघ की सबसे बड़ी लाइब्रेरी केजीबी की थी।
लोकतंत्र, शिशु और राजा के मध्य संघर्ष है। एक बार जब राजा की नग्नता जाहिर हो जाती है, तो वह टिका नहीं रह सकता। तानाशाहियों में सुखांत दुर्लभ ही होते हैं। बच्च यातना कक्ष में भेज दिया जाता है, जहां यह बात मनवाने के लिए उसके दांत उखाड़ लिए जाते हैं या वृषण पर बिजली के झटके दिए जाते हैं कि हुस्नी मुबारक या मुअम्मर गद्दाफी ने न सिर्फ कपड़े पहने थे, बल्कि चटकीले तमगों से सजी यूनिफॉर्म पहने हुए थे। इस कपोल कथा को चुनौती देने वाले अरब शिशु ने इसकी भयंकर कीमत चुकाई। यह अटल ही था कि जब अरब वसंत और शरद क्रांति उभरी, रोष की पीढ़ियां लीबिया की सड़कों पर खून की मांग करेंगी।
असांजे के विरोधियों ने एक उच्च ध्येय की ढाल तलाश ली है- युद्धकाल में राज्य की रक्षा- खुद अपनी। इस मुकाबले का मुद्दा नैतिक है, आंदोलनकारियों की व्यक्तिगत नैतिकता के प्रति अपकार के बगैर। सरकारें वही जाहिर करने में मस्त हैं, जो उनकी छवि उभारता है। ज्यादातर वे वही छुपाती हैं, जो दर्द देता है। यह जरूरी नहीं कि असांजे ने जो किया, उसकी सराहना करने के लिए हमें असांजे की सराहना करनी होगी।
वक्त है एक छोटी-सी स्वीकारोक्ति का। मैंने बड़ी अक्लमंदी से शीर्षकबद्ध की गई किताब ‘जूलियन असांजे : द अनअथॉराइज्ड ऑटोबायोग्राफी’ नहीं पढ़ी है, जिसे कैननगेट ने असांजे की इच्छा के खिलाफ छापा है। मैंने सिर्फ इसकी समीक्षाएं पढ़ी हैं। लेकिन अगर समीक्षाएं किसी बड़े खानसामे द्वारा पेश किए गए परीक्षण मेनु की तरह हैं, तो गंध ही यह इशारा करने के लिए बहुत है कि इतना ही काफी है। मैं पूरा भोजन नहीं चाहता। प्रचार और चाटुकारिता ने असांजे को फुला दिया है। वे खुद ही अपना उच्च ध्येय बन गए हैं। वे अब ऐसे बच्चे नहीं रहे, जो महाशक्ति की पोल खोलता है और घर चला जाता है। वे अपनी बाकी की जिंदगी उस जगह पर बिताना चाहते हैं, जहां प्रतिमा स्थापित होती है।
यह किताब पिछले साल दिसंबर में उनके और प्रकाशक के बीच सहकार के रूप में शुरू हुई, जिसकी पुष्टि उन्होंने एक तगड़ी फीस की बुनियाद पर की थी।
जून में, जब असांजे द्वारा दिए गए साक्षात्कारों के आधार पर तैयार किताब का पहला ड्राफ्ट आया, तो वे इस सौदे से पीछे हट गए। इसे न्यायसंगत ठहराने की प्रक्रिया में असांजे दावा करते हैं कि पूरी आत्मकथा वेश्याकर्म है।
यह आडंबरपूर्ण वचन की तरह है, जिसे एक छवि निखारने वाले दर्पण के सामने रखने के लिए चमकाया गया है। चार शब्द जोड़ दीजिए और वे तुच्छता का विज्ञापन हो जाएंगे। तमाम कल्पना-कथाएं सामूहिक दुराचार हैं। सारे विश्लेषण हस्तमैथुन हैं। समूचा इतिहास अप्राकृतिक यौनकर्म है। आप इस तरह की बकवास के साथ पंद्रह पलों की प्रसिद्धि की तलाश कर रहे प्रकाशकों के शाश्वत आनंद तक जा सकते हैं। असांजे अब आत्मकथा और प्रचार की प्रेस विज्ञप्ति में अंतर नहीं देख सकते।
उनका बचाव करने वाले लोग निश्चित तौर पर यह तर्क देंगे कि यदि आपके पास पेंटागन को चुनौती देने का साहस है, तो आपको अस्मिता के डांवाडोल एहसास की दरकार होती है। असांजे एक प्रसिद्ध नायक हैं, लेकिन मुझे नहीं मालूम कि क्या वे अमेरिकी सैनिक ब्रैडली मेनिंग से ज्यादा बड़े नायक हैं, वास्तव में जिसने दस्तावेज चुराए और उन्हें असांजे तक पहुंचाया। और अभी वह पत्रिकाओं के मुखपृष्ठों पर होने की बजाय अनजान कालकोठरी में बैठा है।
इस किताब में एक मार्मिक प्रसंग है। 1996 में असांजे पर कनाडाई दूरसंचार प्रणाली नॉर्टेल में सेंधमारी करने के लिए ऑस्ट्रेलिया में मुकदमा चला था। जब वे कठघरे में पहुंचने के लिए खड़े हुए, तो उन्होंने अपने एक सहकर्मी का चेहरा देखा, जो उनके खिलाफ सरकारी गवाह बन चुका था। असांजे कहते हैं, ‘वह ऐसा भाव था कि मैं जान ही लेता : विश्वासघात का दिखाई पड़ना, चेहरे को इस तरह बनाया जाना, मानो सत्य में असाधारण रुचि हो।’
मैं नहीं जानता कि अगर जीवनभर के लिए जेल में बंद वह अमेरिकी सैनिक इस क्षण में असांजे का चेहरा देखता है, तो क्या वह ऐसे ही भाव पहचान पाएगा।
- लेखक द संडे गार्जियन के संपादक और इंडिया टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं।