अष्टावक्र ने सुधारी जनक की गलती
भास्कर न्यूज | Dec 28, 2012, 00:04AM IST
राजा जनक राजा होने के बावजूद राजपाट में आसक्ति नहीं रखते थे। लोभ-मोह से वे कोसों दूर रहते थे। विनम्रता उनके स्वभाव में थी। इस कारण वे सदैव अपने दोषों को देखकर उन्हें दूर करने की कोशिश करते थे। आत्मशोधन व आत्मालोचन उनकी प्रकृति में था।
एक बार वे नदी के किनारे एकांत में बैठकर 'सोsहम' का जाप कर रहे थे। बड़े ऊंचे स्वरों में उनका जाप चल रहा था। तभी उधर से अष्टावक्र निकले, जो परम ज्ञानी थे। राजा जनक को ऊंचे स्वर में 'सोsहम' का जाप करते देखकर वे रुके और एक हाथ में छड़ी लेकर थोड़ी दूर खड़े हो गए। फिर तेज आवाज में निरंतर बोलने लगे- 'मेरे हाथ में पानी का कटोरा है, छड़ी है।' राजा जनक के कानों में उनकी आवाज पहुंची, किंतु उन्होंने जाप नहीं छोड़ा। अष्टावक्र भी लगातार यही बात जोर-जोर से दोहराते रहे। आखिर जनक ने जाप रोककर उनसे पूछा- 'यह तुम क्या कह रहे हो?' अष्टावक्र ने कहा- 'मेरे हाथ में पानी का कटोरा है, छड़ी है।'
जनक बोले- 'वह तो दिखाई दे रहा है। इसे बोलने की क्या जरूरत है?' तब अष्टावक्र ने जनक को समझाया- "फिर तुम क्यों 'सोsहम' ऊंची आवाज में बोल रहे हो?" तुम ही ब्रह्म हो, यह क्या तुम्हें नहीं दिख रहा है? मंत्र को रटने से कुछ नहीं होता। उसे अंतर की चेतना के साथ जोड़ने पर ही उसका फल मिलता है। जनक ने अपनी गलती के लिए क्षमा मांगी। सार यह है कि भाव के साथ मन का तादात्म्य होने पर ही तत्संबंधी दिव्य अनुभूति होती है, अन्यथा कोरे शब्दों से तो यह असंभव है।






