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असम दंगों से जुड़े पूर्वाग्रह

राजदीप सरदेसाई | Aug 10, 2012, 00:35AM IST
 
 

भावनाओं से संचालित और ध्रुवीकृत व्यवस्था में दंगों की राजनीति भी सापेक्ष तरीके से चलती है। इसीलिए गुजरात दंगों के बारे में होने वाली किसी टेलीविजन बहस में 1984 के सिख-विरोधी दंगों का पक्ष भी रखा जाता है। ऐसा न करने पर आप पर पक्षपाती होने का आरोप लग सकता है। यह लगभग वैसा ही है मानो विरोधी पक्ष यह कहे कि ‘दंगों से निपटने में हमारा रिकॉर्ड आपसे बेहतर है क्योंकि ‘हमारे दंगों’ में अपेक्षाकृत कम लोग मारे गए।’ यह देखकर लगता है मानो हिंसा जैसे भयावह कृत्य का अपराधबोध किसी ऐसे ही दूसरे कृत्य से जोड़ने से मिट जाएगा। हमें दंगे की भेंट चढ़ने वाली हरेक जिंदगी को देश पर एक दाग की तरह देखना चाहिए, लेकिन यह बात टीवी बहस के गरमागरम माहौल में गुम होकर रह जाती है।


फिलहाल गुजरात और असम के दंगों के बीच ऐसी ही तुलना हो रही है। हाल के हफ्तों में अनेक मंचों से इस तरह के सवाल उठे कि ‘आखिर मीडिया ने असम की हिंसा को उतनी ही तीव्रता से कवर क्यों नहीं किया, जैसा गुजरात को किया गया था?’ एक लिहाज से चौबीसों घंटे चलने वाले खबरिया चैनलों के दौर में यह सवाल जायज भी है, लेकिन इसमें कहीं न कहीं यह कुटिल संदेश भी छिपा है कि कोई ‘छद्म-धर्मनिरपेक्ष’ मीडिया असम को इसलिए कवर नहीं करेगा क्योंकि इससे बोडो जुड़े हैं, जबकि गुजरात को इसलिए कवर किया गया क्योंकि वहां पर मुस्लिम मारे जा रहे थे।


हकीकत कुछ और है। गुवाहाटी से कोकराझार कम से कम डेढ़ सौ किमी दूर है। किसी भी राष्ट्रीय चैनल की ओबी वैन गुवाहाटी में नहीं है। यही कारण है कि जब तक चैनलों के रिपोर्टर दंगा प्रभावित जिलों तक पहुंचे, तब तक ज्यादातर हिंसा थम चुकी थी। इसके उलट 2002 में गुजरात दंगे अहमदाबाद और वडोदरा जैसे शहरों के बीचोंबीच हुए थे और कई हिंसक वारदातें खबरिया संस्थान के कार्यालयों से महज कुछ किमी दूर हुईं। ऐसे में मीडिया के लिए इस विभीषिका तक पहुंचना और कवर करना ज्यादा आसान था। जहां तक चौरासी के दंगों के कवरेज का सवाल है, तो उस वक्त चौबीसों घंटे चलने वाले न्यूज चैनलों का दौर नहीं आया था।


हालांकि यह असम दंगों के सीमित कवरेज को लेकर कोई बहाना नहीं है, बल्कि हम तो सिर्फ यह समझाना चाहते हैं कि न सिर्फ कोकराझार, बल्कि समूचा पूर्वोत्तर ‘दूरी’ की मार झेल रहा है। हालिया हिंसक वारदातों से कुछ हफ्ते पूर्व ही वहां पर सौ से ज्यादा लोग बाढ़ के चलते मारे गए और असम का आधे से ज्यादा इलाका पानी में डूब गया। लेकिन क्या हमने इसका वैसा ही कवरेज देखा, जैसा हम किसी महानगर या उसके आसपास नन्हे बच्चे के बोरवेल में गिरने का देखते हैं? मणिपुर को राष्ट्रीय नक्शे पर उभरने के लिए किसी मेरीकॉम या फिर 100 दिनों की नाकाबंदी की जरूरत होती है, जिसके चलते इंफाल में पेट्रोल की दरें 140 रुपए प्रतिलीटर और एलपीजी सिलेंडर की कीमत 2000 रुपए तक पहुंच गईं, लेकिन इसका भी ज्यादा उल्लेख नहीं हुआ। इसके अलावा मीडिया पर यह आरोप भी लगाया जा रहा है कि उसने असम की हिंसा के संदर्भ में अपने एडिटोरियल विकल्प ‘पीड़ित’ की धार्मिक पहचान के आधार पर तय किए।

लेकिन यहां पर भी कुत्सित मानसिकता के लोग हमें जैसा यकीन दिलाना चाहते हैं, असम उससे कहीं ज्यादा जटिल तस्वीर पेश करता है। राहत शिविरों में मौजूद हजारों लोगों के भयाक्रांत चेहरों को देखकर साफ पता लगता है यह कोई एकतरफा दंगा नहीं था। इस विविधतापूर्ण, बहु-जातीय समाज में रहने वाले बोडो, बंगाली हिंदुओं, आदिवासियों और मुस्लिमों समेत सब हिंसा के शिकार हैं। आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि राहत शिविरों में अन्य समुदायों के लोगों के बनिस्बत कहीं ज्यादा मुसलमान शरण लिए हुए हैं। यदि बोडो समुदाय के लोगों को अपनी जमीनों से हाथ धोना पड़ा है, तो मुस्लिमों के साथ भी यही हुआ है। लेकिन लोकप्रिय तौर पर यही समझा जाता है कि वहां सिर्फ एक आक्रांता वर्ग है।


वास्तव में जो चीज तमाम दंगों को साथ जोड़ती है, वह है ‘दुश्मन’ की सतत तलाश। वर्ष 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उन्हीं के अंगरक्षकों द्वारा हत्या के बाद तमाम सिखों पर राष्ट्र-विरोधी होने का ठप्पा लग गया और तकरीबन रातोंरात एक गौरवशाली और देशभक्त समुदाय ने खुद को दूसरों के निशाने पर पाया। वर्ष 2002 में साबरमती एक्सप्रेस में कारसेवकों की हत्या से उपजी बदले की भावना के तहत गुजरात के हरेक मुसलमान को ‘आतंकी’ मान लिया गया। इनकी तुलना में असम का मामला एक बार फिर कहीं ज्यादा जटिल है। यह अब भी साफ नहीं है कि वास्तव में हिंसा भड़कने का मूल कारण क्या था, क्योंकि इस इलाके में रहने वाले बोडो व मुस्लिमों के बीच दुश्मनी का लंबा इतिहास रहा है, जो वर्ष 2003 में बोडो टेरिटोरियल कौंसिल के गठन के बाद और बढ़ी तथा हाल के महीनों में वहां पर दोनों पक्षों की ओर से सशस्त्र उग्रवादी समूहों द्वारा हमलों के कई मामले सामने आए।


लेकिन असम में भी ‘दुश्मन’ मिल गया। ‘अवैध बांग्लादेशी घुसपैठिए’ जैसा जुमला आज निचले असम में हर उस व्यक्ति के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जो एक खास धार्मिक समुदाय से जुड़ा हुआ दिखता है। यहां पर इस ऐतिहासिक तथ्य को नजरअंदाज किया जाता है कि २क्वीं सदी की शुरुआत से तत्कालीन पूर्वी बंगाल से श्रमिकों का पलायन होता रहा है। इसके बजाय यह बताने के लिए एक उग्र प्रोपेगंडा रचा जाता है कि असम में मुस्लिमों का ‘सैलाब’ उमड़ आया है।


हां, सीमा की दरारों और घुसपैठ को रोकने के लिए अपेक्षित सुरक्षा बलों और कानून की कमी ने असम को रोजी-रोटी की तलाश में सीमापार से आने वाले घुसपैठियों के आसान चरागाह बना दिया है। हां, वहां ऐसे राजनीतिक दल हैं, जो धार्मिक समुदायों को वोट बैंक की तरह देखते हैं। हां, वहां पर जमीनों और घटते संसाधनों के लिए मारकाट मची है, जो तब और बढ़ जाती है जब आबादी के पैटर्न में बदलाव होता है। लेकिन नफरत और अविश्वास की भावना भड़काने से इसका समाधान नहीं मिलेगा। दंगा पीड़ितों के घाव संवेदनाओं के मरहम से भरते हैं, न कि पूर्वाग्रहों से। यह जितना चौरासी के दिल्ली दंगों और 2002 के गुजरात दंगों के संदर्भ में सत्य है, उतना ही असम के लिए भी।

लेखक आईबीएन 18 नेटवर्क के एडिटर-इन-चीफ हैं।
 
 
 

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