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आइंस्टीन की मानवीयता

Bhaskar News | Oct 12, 2012, 00:08AM IST
 
 

कहा  जाता है कि 1945 में न्यू मेक्सिको में हुए परमाणु बम के विस्फोट से पहाड़ ढहने लगे, नदियां सूख गईं और पेड़-पौधे मुरझा गए। 
 
आइंस्टीन ने जब परमाणु शक्ति का यह विनाशकारी नजारा देखा, तो कहा - ‘हमारी आधुनिक पीढ़ी ने सारी दुनिया के लिए शक्ति का अजस्र द्वार खोल दिया है। शायद मानव-सभ्यता के इतिहास में यह सबसे क्रांतिकारी उपलब्धि है।’ मगर साथ ही उन्होंने अमेरिका के सेनाध्यक्ष को, जिसने हिरोशिमा में बम विस्फोट की योजना उनके सामने रखी थी, सख्त लहजे में समझाया। आखिर अमेरिका ने हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम का प्रयोग कर ही दिया। 
 
जब अमेरिकी इस जीत पर जश्न मना रहे थे, तब आइंस्टीन का मन घोर पीड़ा से भरा हुआ था। उन्हें लगा कि उनकी खोज यदि मंगलकारी होती, तो कितना अच्छा होता। अपनी खोज उन्हें बेमानी लगने लगी। अपनी ग्लानि को कम करने के लिए आइंस्टीन ने इस खोज के रचनात्मक उपयोगों पर लेख लिखना शुरू किए।
 
यही नहीं परमाणु-अस्त्रों पर रोक लगाने के लिए वे विश्वभर के नेताओं से मिले। यूएनओ की स्थापना के लिए प्रयास किया। अपनी मृत्यु के दो दिन पूर्व रसेल के शांति प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करते हुए उन्होंने लिखा - ‘केवल मानवता को याद करो और बाकी सब व्यर्थ है, भूल जाओ। यदि तुम लोग ऐसा करोगे, तो धरती पर नया स्वर्ग उतर आएगा। अन्यथा विश्व का नाश निश्चित है।’
 
एक विवेकशील रचनाकार को अपने सृजन का रचनात्मक उपयोग ही सुकून देता है और विनाशकारी उपयोग दुखी करता है। सार यह है कि जब भी कोई आविष्कार या खोज हो, उसका उपयोग मानवता के हित में ही किया जाना चाहिए।
 
 
 

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