तिलक आखिर नहीं झुके
भास्कर
| Sep 25, 2012, 05:52AM IST
घर लौटने के बाद वह निरंतर भगवान से पति के स्वास्थ्य और सुरक्षा की याचना करती रहतीं। इसी तरह एक वर्ष बीत गया। तिलक का स्वास्थ्य गिरने लगा। उनके मित्र ने उनसे कहा- ‘तुम्हें छह साल की सजा हुई है और एक साल में ही तुम्हारी हालत गिरने लगी है। यदि तुम सरकार की शर्ते मान लो तो मैं तुम्हें जेल से छुड़ा सकता हूं।’ तिलक स्वाभिमान से बोले- ‘नवयुवक हमारे त्याग से ही प्रेरणा ग्रहण करते हैं। यदि मैं अंग्रेज सरकार की शर्ते मान लूं तो उन नवयुवकों को कौन प्रेरणा देगा! मुझे अपनी कुर्बानी देने दो।’ तिलक की महानता देख मित्र की आंखें भर आईं। सार यह है कि उच्च लक्ष्य हासिल करने के लिए त्याग अपेक्षित है।








