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बांग्लादेश का आत्म-संघर्ष

Bhaskar News | Feb 20, 2013, 01:15AM IST
बांग्लादेश  एक अद्भुत अनुभव से गुजर रहा है। पाकिस्तान से आजादी के 41 साल बाद यह आज की पीढ़ी का आजादी की आत्मा से साक्षात्कार है। पांच फरवरी से ढाका के शाहबाग चौराहे पर रोज दसियों हजार लोगों का कारवां जुटता है।
 
ये लोग चाहते हैं कि 1971 के स्वाधीनता संग्राम से जिन लोगों ने गद्दारी की और पाकिस्तानी सेना के साथ मिलकर हजारों लोगों की हत्या और लाखों महिलाओं से दुराचार में सहभागी बने, उन्हें मौत की सजा दी जाए। जनभावना के दबाव में आखिरकार शेख हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग सरकार को युद्ध अपराध कानून में संशोधन का विधेयक संसद से पास कराना पड़ा है।
 
इससे सरकार जमात-ए-इस्लामी के नेता अब्दुल कादिर मुल्ला के मामले में अपील करने में सक्षम हो जाएगी। मुल्ला को युद्ध अपराध ट्रिब्यूनल ने 1971 के स्वाधीनता संग्राम के दौरान मानवता के खिलाफ अपराध में शामिल होने का दोषी तो पाया, लेकिन सजा के तौर पर उम्रकैद ही सुनाई, जिससे जनविरोध भड़क उठा। नए संशोधन के तहत अब संगठनों को भी दंडित किया जा सकेगा। इससे जमात-ए-इस्लामी के प्रतिबंधित होने की संभावना बन गई है।
 
यह उल्लेखनीय है कि जमात के गुंडों द्वारा प्रदर्शनकारियों पर हमले तथा प्रदर्शन आयोजित करने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले ब्लॉगर अहमद रजीब हैदर की हत्या के बावजूद शाहबाग चौराहे पर लोगों का कारवां नहीं थमा। जनभावना इतनी तीव्र है कि विपक्षी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी(बीएनपी) भी जमात का साथ नहीं दे पाई है, जबकि अतीत में इन दोनों के बीच चुनावी गठबंधन रहा है। युद्ध अपराध ट्रिब्यूनल के कठघरे में जमात के कुल नौ और बीएनपी के दो नेता हैं।
 
उनके बारे में आने वाले फैसलों का देश की भावी सूरत पर भारी असर पड़ेगा। 1975 में अगर बांग्लादेश के राष्ट्रपिता शेख मुजीबुर रहमान की हत्या नहीं होती, तो युद्ध अपराध के आरोपियों के साथ तभी न्याय हो गया होता। मगर सैनिक शासन के लंबे काल में फौजी तानाशाहों ने मजहबी कट्टरपंथी ताकतों से गठजोड़ कर लिया। हालात बदले, जब 2008 के आखिर में शेख हसीना तीन चौथाई बहुमत के साथ सत्ता में आईं। इसके साथ ही ऐतिहासिक न्याय का चक्र घूमा। वह अब अपनी मंजिल पर पहुंच रहा है।
  
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