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कांग्रेस और आर्थिक मुद्दों की राजनीति

अभिज्ञान प्रकाश | Dec 11, 2012, 05:49AM IST
कांग्रेस और आर्थिक मुद्दों की राजनीति
कांग्रेस लोकसभा चुनावों से पहले अपने घोषणा-पत्र में किए गए आर्थिक वादों को आक्रामक तरीके से पूरा करने में लग गई है।
 
मैं   यह कॉलम एक ऐसे समय पर लिख रहा हूं, जब गुजरात चुनाव और ब्रांड नरेंद्र मोदी इन चुनावों में कितने सफल होंगे, यह बहस अपनी चरम सीमा पर है। इस बात को मैं आर्थिक मुद्दे और कांग्रेस की एफडीआई जैसी कोशिशों से जोड़ना चाहूंगा और इसकी मेरे पास वजह है।
 
गुजरात पर अगर हम नजर डालें तो पिछले तमाम सालों में मोदी की कोशिश यही रही है कि 2002 की घटनाओं के साये को पीछे छोड़ देना और गुजरात को पूरे तौर पर विकास के मॉडल पर बेचना..यही वह लाइन है, जो मोदी को लेकर भाजपा के प्रवक्ता भी दोहराते हैं। यानी कि अगर गुजरात के बड़े विकास का दावा बिल्कुल सही है तो उसमें एक बड़ी भूमिका निवेश की है। 
 
यह निवेश देश के भीतर से भी हो सकता है और देश के बाहर से भी, तो निवेश को लेकर भाजपा इतनी परेशान और विरोधी क्यों नजर आती है? दूसरी एक और बड़ी बात कि देश की सियासत का जो माहौल बन रहा है, पिछले कुछ वर्षो में उसके हिसाब से जज्बाती मुद्दों को दरकिनार करके विकास के नाम पर जुड़े आर्थिक मुद्दे जोर-शोर से हावी हो रहे हैं।
 
 
मैंने पहले भी यह बात लिखी थी कि कांग्रेस लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए एक मार्केट हैप्पी इकोनॉमी चाहती है। उसके मैनेजर शायद यह मानते हैं कि ज्यादा रोजगार के मौके और मध्य वर्ग की खाली जेबें वापस भरने से एक खुशनुमा माहौल बनेगा और कांग्रेस को इसका फायदा मिलेगा।
 
आर्थिक फैसलों से यह रास्ता संभव है, जो कि यह सरकार ले रही है। इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि यह सोच कांग्रेस के लिए समर्थन वापस खींचने में सही साबित होगी, लेकिन फिलहाल कांग्रेस का ट्रैक यही लगता है। अगर मनरेगा ने २क्क्९ में कांग्रेस के लिए काम किया तो इस बार सब्सिडी के बदले कैश और आखिरकार खाद्य सुरक्षा के जरिये अनाज, यह कांग्रेस सोचती है कि काम कर सकता है और उस मध्य वर्ग को अपनी तरफ खींचने के लिए एफडीआई जैसे आर्थिक फैसलों का फॉमरूला है, जो बाजार को बेहतर बना सकता है। 
 
हम सब इस बात को बखूबी जानते हैं कि एफडीआई से कोई रातोंरात तो बड़ी विदेशी कंपनियों के स्टोर नहीं खुल जाएंगे और जो देसी किराने का बाजार है, वह बंद हो जाएगा। लेकिन बाजार में बढ़ोतरी की प्रतिक्रिया जरूर नजर आने लगी, इस बात के अंदेशे के साथ कि एक बार फिर विदेशी पैसा जोरदार तरीके से इस मुल्क में आएगा।
 
कांग्रेस तो अपनी चाल चल रही है, लेकिन भाजपा के लिए समस्या क्या है। भाजपा के लिए सबसे बड़ी समस्या यह है कि आर्थिक मसलों पर उसकी और कांग्रेस की सोच में कोई बड़ा फर्क नहीं है। एनडीए की सरकार में कई ऐसे फैसले लिए गए, जिसे प्रो मार्केट कहा जा सकता है। बीजेपी एफडीआई का विरोध कर रही है। मूलत: इस बात पर कि इस क्षेत्र यानी कि मल्टी ब्रांड रिटेल, खुदरा बाजार में एफडीआई लाने की क्या जरूरत है? इससे इस देश का बहुत बड़ा असंगठित क्षेत्र जो छोटे दुकानदारों का है, वह बाजार से बाहर हो जाएगा।
 
भाजपा का विरोध उसकी सोच से बिल्कुल सही है, लेकिन भाजपा जिसमें निवेश के प्रति उदारवाद है, नरेंद्र मोदी जैसे नेता हैं, वह विदेशी पैसे को हमेशा के लिए कहीं आने से नकार तो नहीं सकती। वह क्षेत्र का मसला उठा रही है, निवेश का नहीं। कांग्रेस को यह बात बहुत अच्छी तरह से पता है, इसलिए वह लोकसभा चुनावों से पहले अपने घोषणा-पत्र में किए गए आर्थिक वादों को आक्रामक तरीके से पूरा करने में लग गई है।
 
कांग्रेस को यह भी अच्छी तरह से पता है कि उसकी सरकार के खिलाफ लोगों में सबसे बड़ा गुस्सा महंगाई और भ्रष्टाचार को लेकर था, क्योंकि आप उन लोगों पर महंगाई के फैसलों का बोझ लाद रहे थे, जिनकी जेबें ढीली हो चुकी थीं और बेरोजगारी नौजवानों की बड़ी समस्या थी। चुनावी साल में कांग्रेस इसे अपनाना चाहती है और उम्मीद कर रही है कि वह इसमें सफल हो जाएगी। 
 
मैं यह बात यहां जरूर लिखना चाहूंगा कि इस सिलसिले में अगला बजट बहुत महत्वपूर्ण होगा, जिससे कांग्रेस बड़े लोक-लुभावने रास्ते अख्तियार कर सकती है और भाजपा को एक सशक्त रणनीति चाहिए कांग्रेस की इन चालों को सियासत की बिसात पर शह-मात के लिए।
 
आखिर में वह बड़ी बात जो मेरे हिसाब से इस आड़ी राजनीति का आधार बनती जा रही है..80 के दशक खासतौर पर आखिरी हिस्से में थी मंडल की राजनीति और उसके बाद ९क् के दशक में आई कमंडल की राजनीति यानी कि जज्बात से जुड़े मुद्दों का दौर था, लेकिन 2000 में आर्थिक मुद्दों ने धीरे-धीरे जोर पकड़ना शुरू कर दिया। राज्यों के सफल मुख्यमंत्रियों को भी इस बात का अहसास होने लगा कि लोगों की जरूरत नारेबाजी से ज्यादा रोजगार की है और अर्थशास्त्र व सियासत को अलग-अलग रखने का युग धूमिल होने लगा है।
 
इस लिहाज से एफडीआई जैसे फैसले दूरगामी असर रखते हैं और इन पर बहस चलना और जरूरी है। किराने के दुकानदारों से लेकर किसान का हक और बेरोजगार नौजवानों से लेकर उस गृहिणी का एलपीजी का हक ये नए मुद्दे बन गए, लेकिन कांग्रेस को एनडीए से एक सबक लेना चाहिए कि कहीं भारत और इंडिया की समझ में वह गलती न कर दे, क्योंकि एनडीए ने इंडिया शाइनिंग का नारा दिया और भारत ने उसे चुनाव हरा दिया था।
 

अभिज्ञान प्रकाश
 
टीवी एंकर और वरिष्ठ पत्रकार    

 

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