गृहस्थी में रहते हुए भी थोड़ा-सा तपस्वी जीवन अवश्य जिएं
Source: पं. विजयशंकर मेहता | Last Updated 00:09(02/02/12)
जीने की राह.. दुनिया में अनेक तरह के लोग होते हैं। किसे आपका कौन-सा काम पसंद या नापसंद है, इसका ठीक से आप हिसाब-किताब नहीं लगा पाते।
चूंकि हम अपने जीवन का अधिकांश हिस्सा दूसरों से प्रभावित रखते हैं, इसलिए हम भी चिंतित रहते हैं कि किसे क्या पसंद आएगा? कुछ लोग तो आपकी प्रशंसा करके अहंकार को बढ़ाएंगे और आप समझ नहीं पाएंगे कि आप अपना कितना बड़ा नुकसान कर रहे हैं। हमारे जीवन में वन का बड़ा महत्व है।
इसलिए नहीं कि जंगलों में पर्यावरण बसता है, बल्कि इसलिए कि सभी महान लोगों ने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा वन से जोड़कर रखा है। दरअसल वन और तप एक-दूसरे के पर्याय हैं। जीवन में तप जरूर होना चाहिए। हमारे यहां आज भी उपवास और तप को लोगों ने प्रशंसा का विषय बनाया है।
कई लोग तो इसीलिए साधु-महात्मा बन गए कि उन्होंने जरा शरीर पर काम किया और लोगों ने जय-जयकार कर दी। संसार में लोगों को इसी में मजा आने लगता है कि कोई अपना शरीर सुखा रहा है, कोई भूखा रह रहा है, कोई आग पर बैठा है तो कोई धरती पर उल्टा हो रहा है।
ऐसा ही जीवन में होने लगता है। विचित्र को प्रशंसा मिल ही जाती है। हमारे यहां वन में जाकर तप इसीलिए किया जाता था कि एकांत में जो आपको उपलब्ध होगा, वह आपके अहंकार को नहीं बढ़ाएगा। वन में चुप्पी, मौन और दृष्टि तीनों रहती थी। जंगल भगवान की अभिव्यक्ति होती है और परमात्मा मिले तो दूसरों की प्रशंसा, आलोचना की चिंता नहीं करनी चाहिए। इसलिए घर में रहते हुए भी थोड़ा-सा तपस्वी जीवन अवश्य जिएं।