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बर्नार्ड शॉ ने राजा को दिखाया आईना

bhaskar news | Oct 03, 2012, 05:04AM IST
 
 

इंग्लैंड के राजा चार्ल्स द्वितीय में औसत काव्य-प्रतिभा थी, किंतु वे स्वयं को बहुत महान कवि समझते थे। अत्यंत साधारण कविताएं लिखकर वे अपने दरबारीजनों को सुनाते और स्वयं ही अपनी प्रशंसा करते। दरबारीजन बेचारे उनकी हां में हां मिलाते हुए उनकी कविताओं की खूब सराहना करते, क्योंकि राजा का गुस्सा वे मोल लेना नहीं चाहते थे। जब भी चाल्र्स द्वितीय का राजकार्य समाप्त होता, वे कविताएं सुनाना शुरू कर देते और सारी अनिच्छा व ऊब के बावजूद दरबारीजन उन्हें झेलते।






एक बार राजा ने जॉर्ज बर्नार्ड शॉ, जो सुविख्यात साहित्यकार थे, को अपने दरबार में निमंत्रित किया। जब शॉ आए, तो राजा ने उनका यथोचित सत्कार करने के पश्चात अपनी कुछ कविताएं उन्हें दिखाकर उनसे राय मांगी। शॉ बहुत स्पष्टवादी थे, किंतु वे यह भी जानते थे कि राजा की कविताओं को बुरा कहने से वे उनके कोपभाजन बन जाएंगे।






इसलिए शॉ बहुत देर तक उन कविताओं को पढ़ते रहे और फिर प्रशंसा के शब्दों में सत्य को कुछ यूं राजा के सामने रखा - ‘मैं यही कहूंगा कि आपके लिए कोई भी कार्य असंभव नहीं है। यदि आप एक बुरी-सी कविता लिखना चाहते हैं, तो उसमें भी सफल हो जाते हैं।’ शॉ की बात राजा की समझ में भी आ गई और अप्रिय भी नहीं लगी। सार यह है कि अनेक प्रतिकूल अवसरों पर स्वयं की रक्षार्थ सत्य को सीधे न कहते हुए आवरण में प्रस्तुत करना पड़ता है, जिसे शास्त्र ‘आपद्धर्म’ कहते हैं और इसे नीति-सम्मत ही मानते हैं।
 
 
 

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