मां ‘मॉम’ बन गईं और पापा जीते-जी ‘डैड’
प्रिया आर्य | Jul 17, 2012, 00:34AM IST

पूरे दृश्य से इतना तो समझ आ गया कि एक मां अपने बच्चे को दो सबक सिखा रही थी। एक, गाय को अंग्रेजी में काउ कहते हैं और दूसरा, गाय को रोटी देते हैं। वह जानती हैं कि आजकल लोगों की पहचान अंग्रेजी में गिटर-पिटर करने से ही बनती है। फिर वह और उसका बच्चा क्यों पीछे रह जाएं। बेटा अभी से काउ बोलेगा, तभी तो वाउ, हाउ, नाउ तक पहुंचेगा।
अब तो स्कूलों में हिंदी बोलने पर सजा तक मिलने लगी है। कल ही पड़ोसी बच्चे यश ने हिंदी बोलकर 50 रुपए का फाइन भरा है। लोकोक्तियां, कहावतें तो शर्म से कहीं दफन ही हो गई हैं। मैंने एक बार अपनी कक्षा में पूछा था कि ये अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो,’ नीति क्या थी। आज उत्तर का व्यवहारीकरण देख रही हूं। सायमन ‘गो बैक’ होकर भी हमें अपने ही देश में पराया कर गए। आपस में ही एक-दूसरे को नीचा दिखाने का बेहतरीन तरीका सिखा गए। पश्चिमी संस्कृति को हमने इस कदर अपना लिया है कि पूछिए मत। अंग्रेजी म्यूजिक सुनना फैशन बना लिया और हिंदी में बोलना डिप्रेशन। ये अंग्रेजियत का ही तो प्रभाव है कि आधुनिकता के बहाव में छोटे अब बड़ों के पैर पड़ना ‘आउट ऑफ फैशन’ समझने लगे हैं। अभी तो फिर भी चहारदीवारी के अंदर घुटनों तक झुक जाते हैं, आने वाले समय में तो ‘पायलागू’ संस्कृति चलन से ही बाहर हो जाएगी। सोचने वाली बात ये है कि उन लोगों ने आज तक हमारी संस्कृति को नहीं अपनाया।
बात जरूरत की आती है मजबूरी की नहीं। अगर पांचवीं तक पढ़ीं नानीमां अपनी भाषा ही समझती हैं, तो उनके सामने अंग्रेजी में गिटर-पिटर करना न जरूरत है, न मजबूरी। ये ठीक बीबीसी और दूरदर्शन जैसा है। एक की सुबह गुड मॉर्निग के साथ होती है, तो दूसरा नमस्कार में सहज है। आशय साफ है, अंतर स्थान और लोगों की समझ के दायरे का है। वर्तमान में एक हिंदीभाषी अंग्रेजी जबान वाले के सामने ऐसा महसूस करता है, जैसे विज्ञापनों में सांवली चमड़ी वाला गोरे-चिट्टों के सामने हीनभावना से ग्रस्त दिखता है। पर इसका हल फेयरनेस क्रीम ही नहीं है। नौकरी के साक्षात्कार से लेकर जीवनसाथी के चयन तक में विदेशी भाषा को पहला दर्जा प्राप्त है।
विदेशी जबान को अपनाते लोग अपनी ही जबान भूलते जा रहे हैं। बच्चा भले ही पहला शब्द मां बोले, लेकिन दुनिया में चलने के लिए उसे मम्मा कहना ही सीखना होगा। पर जहां मां, ‘मम्मा या मॉम’ बन जाती हैं, वहीं बेचारे पिता जीते-जी ‘डैड’ हो जाते हैं। कल ही एक सहकर्मी अपनी व्यथा सुना रहे थे कि ये पिछलग्गू अंग्रेजी योग्य होते हुए भी आगे बढ़ने नहीं दे रही कमबख्त। अफसोस कि हम हर साल हिंदी दिवस तो मनाते हैं, लेकिन उसे जीवन का हिस्सा नहीं बना सकते। मुझे लगता है कि इससे बेहतर हिंदी दिवस की जगह इंग्लिश डे को ही सेलिब्रेट कर लेना चाहिए।
सॉरी के बजाय माफी शब्द दिल से जुड़ा है। हिंदुस्तान में ही रहकर हिंदी से परहेज करते लोगों की भी मानसिकता समझ नहीं आती। मुझे खुद भी नहीं पता कि वह शुभप्रभात कब होगी, जब लोग आपस में हैलो-हाय छोड़कर, जय हिंद बोलकर अपने दिन का शुभारंभ करेंगे।






