वक्त कितना बीत गया पर बदला कितना कम
अनिल कर्मा | Jul 20, 2012, 00:03AM IST

गरीब इस बात पर बल्ले-बल्ले कि उसका बेटा राजा के बेटे के साथ पढ़ने जाता है। कुछ दिन बाद लोगों को पता चला कि गरीब का बेटा राजा के बेटे के साथ स्कूल तो जाता है, पर क्लास में नहीं बैठता। बाहर बैठा रहता है। अब लोगों की उत्सुकता और बढ़ गई। सब सोचते यह क्या चक्कर है। कुछ लोगों का मन नहीं माना। किसी तरह से मास्टरजी तक पहुंच बनाई गई। पूछा। मास्टरजी ने कहा - हां, वह आता तो है।
राजाजी ने यह कहलवाकर उसे भिजवाया था कि राजकुमार रानीजी के बहुत दुलारे हैं। आप ठहरे मास्टर, राजकुमार ठहरे बच्चे। हो सकता है राजकुमार कुछ गलती कर बैठें या कोई सबक ठीक से न सीख सकें। आपको गुस्सा आ सकता है। तो आप अपना गुस्सा इस गरीब बच्चे पर उतार लें। डांट लें, डंडा मार लें, चपत लगा लें। जब पूरा गुस्सा उतर जाए तो राजकुमार को प्यार से फिर सबक पढ़ा दें।
राजे-रजवाड़े नहीं रहे। किस्सा पुराना पड़ गया है, लेकिन किस्से की जो मूल सोच है, वह आज भी कहीं मौजूद है। कई बार खुले तौर पर देखने को भी मिलती है। राजनीति में ही देख लीजिए। कांग्रेस में कौआ भी कहीं गलती से कमाल दिखा दे तो क्रेडिट युवराज राहुल को ही जाता है। दलित के घर वे खाना खा लें तो जय-जयकार। पीड़ित की पीड़ा सुन भर लें तो वाह-वाह। मीडिया के सवाल का सही-सटीक जवाब दे दें तो विजन, इनोवेटिव सोच सब नजर आ जाए।
लेकिन जब पूरी ताकत झोंकने के बाद भी उत्तरप्रदेश में राहुल का करिश्मा नहीं चल पाता तो पार्टी मौन धारण कर लेती है। हर कोई वह माथा तलाशने में जुट जाता है, जिस पर हार का ठीकरा फोड़ा जा सके। कभी-कभी सलमान खुर्शीद जैसे नेता भूल से सच बोल जाते हैं, मगर हल्ला इतना मचता है कि उन्हें भी जबान पीछे खींच लेनी पड़ती है। याद कीजिए, खुर्शीद ने सिर्फ इतना ही तो कहा था कि छोटी-छोटी उपलब्धियों से बात नहीं बनेगी, राहुल को बड़े फलक पर काम करना होगा। राजकुमार के बारे में यह राय भी कबूल नहीं है पार्टी को।
समाज में भी ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाएंगे। समर्थ को सब माफ, बाकी को सब पाप। अभी पिछले दिनों की बात है। कोर्ट ने कहा - शहर में गुंडागर्दी बहुत बढ़ गई है, पुलिस कुछ कर नहीं रही। पुलिस को गुस्सा आया। गुंडे तो पकड़ में आए नहीं, तो वह ऑफिस जाने-आने वाले उन दोपहिया वाहन चालकों के चालान बनाने में जुट गई, जिनके वाहन में मड गार्ड नहीं हैं या जिनके साइलेंसर से अधिक धुआं निकल रहा है। पिछली दफा जब कोर्ट नाराज हुआ था खराब रोड और बिगड़े ट्रैफिक पर, तो प्रशासन ने हेलमेट अनिवार्य करने का बीड़ा उठा लिया था। है ना गजब?
एक और दृश्य देखिए - शहर में एक शॉपिंग मॉल के सामने कुछ अफसरों की गाड़ियां नियमों को धता बताते हुए सड़क पर खड़ी थीं। गाड़ियां तो अमूमन रोज ही खड़ी रहती हैं, पर उस दिन हल्ला इसलिए मच गया कि यह सब अखबार की सुर्खियों में आ गया था। सवाल उठने लगे। नियमों का पालन कराने वाले ही नियमों को कैसे तोड़ रहे हैं? ऊपर वालों ने नीचे वालों को डांटा, नीचे वाले और नीचे वालों पर भड़के। अंतत: जिन अफसरों की गाड़ियां वहां खड़ी पाई गई थीं, उन्होंने अपने-अपने ड्राइवर को नोटिस थमा दिए - बताओ गाड़ी गलत पार्किग में क्यों खड़ी की थी? गोयाकि साहब को तो कुछ पता ही नहीं। अब आप ही बताइए, क्या इन ड्राइवरों में आपको क्लास के बाहर बैठे उस गरीब बच्चे की सूरत नजर नहीं आती। बेशक वक्त काफी बीत गया है, पर शायद उतना बदला नहीं।






