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भाजपा को बिनमांगी सलाह

 
Source: चेतन भगत   |   Last Updated 00:03(28/07/11)
 
 
 
 
एकतरफा मुकाबले उबाऊ होते हैं, फिर चाहे वे कुश्ती के हों या क्रिकेट के। भारतीय राजनीति भी इन दिनों ऐसे ही दौर से गुजर रही है। भाजपा एक बहुत कमजोर विपक्ष साबित हो रही है। यह देश के लिए भी बुरा है कि उसके पास अच्छे विकल्प नहीं हैं।

यह स्थिति तब है, जब कांग्रेस ने पिछले दो सालों में कई ‘आत्मघाती गोल’ किए हैं। घोटाले, महंगाई, सीमा पर असैनिक उथलपुथल, आत्मतुष्ट नेतृत्व और एक सियासी राजघराना, जो या तो इन तमाम विफलताओं में भागीदार है या उसे कतई अंदाजा नहीं कि आखिर हो क्या रहा है.. कांग्रेस ने विपक्ष को बहुत मौके दिए हैं। यदि भाजपा ने कांग्रेस में अपने घुसपैठिये भेज दिए होते तो भी वे कांग्रेस का इतना नुकसान नहीं कर पाते, जितना उसने खुद अपने हाथों कर लिया है।

लेकिन इसके बावजूद भाजपा इन परिस्थितियों का फायदा उठाने में नाकाम रही। भाजपा के प्रवक्तागण बार-बार टीवी पर आकर यह दोहराते रहते हैं कि सोनिया गांधी इतालवी हैं, कांग्रेस में सभी फैसले मैडम द्वारा लिए जाते हैं और हर कांग्रेसी के स्विट्जरलैंड में बैंक खाते हैं, लेकिन इसके बावजूद लोगों में भाजपा को लेकर उत्साह नहीं जाग रहा है। हां, उनमें सरकार के प्रति जरूर नाराजगी है, लेकिन बहुत कम लोग यह मानते हैं कि भाजपा एक बेहतर विकल्प साबित होगी।

हाल ही में सरकार से जो गलतियां हुईं, यदि उन्हें भाजपा भुना पाती तो यह उसके लिए सत्ता में वापसी करने का एक बेहतरीन मौका होता। लेकिन लोगों ने पाया कि भाजपा भले ही जोर-शोर से कांग्रेस विरोधी बयानबाजी करे, लेकिन उसके पास कोई वास्तविक समाधान नहीं हैं। उसके पास कोई नेतृत्व नहीं है। और सबसे अफसोस की बात यह कि उसे जनता की नब्ज पर हाथ रखना भी नहीं आता।

इसका सबसे बड़ा सबूत येदियुरप्पा के मामले में देखने को मिला। कई विश्लेषकों ने भाजपा को महीनों पहले ही यह मशविरा दे दिया था कि वह येदियुरप्पा से मुक्त हो जाए, लेकिन भाजपा ने उन्हें बनाए रखा। वह पेचीदा दलीलें देती रही कि ‘येदियुरप्पा अनैतिक हो सकते हैं, लेकिन भ्रष्ट नहीं’ और ‘हम कांग्रेस की तुलना में कम भ्रष्ट हैं।’

यदि तब भाजपा उन्हें हटा देती तो वह नायकों की तरह उभरकर सामने आती। इससे भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष में उसकी स्थिति भी स्पष्ट हो जाती। लेकिन अब जब येदियुरप्पा को बनाए रखना तकरीबन नामुमकिन हो गया है, भाजपा एक ‘लूजर’ की मुद्रा में है।

भाजपा की नाकामी इसलिए भी दुखद है, क्योंकि एक मायने में वह गैरवंशवादी राजनीति का प्रतिनिधित्व करती है। उसकी विफलता का अर्थ है कि हम अब भी एक ऐसे राजनीतिक परिवेश के लिए तैयार नहीं हैं, जिसमें नेहरू-गांधी परिवार का दबदबा न हो। हालांकि भाजपा की खामियों का जरूरत से ज्यादा विश्लेषण करने का कोई फायदा नहीं है। मैं यहां कुछ सुझाव देना चाहूंगा, जिन पर भाजपा विचार कर सकती है।

पहला सुझाव। भाजपा कांग्रेस की निंदा करना बंद कर दे। हम कांग्रेस की खामियां सुन-सुनकर तंग आ गए हैं। भाजपा हमें जो बता रही है, वह हम भी जानते हैं, बार-बार याद दिलाने की जरूरत नहीं है। इससे बेहतर यह होगा कि भाजपा हमें बताए वह क्या कर सकती है। उसे एक नीति के तौर पर एक बिंदु के बाद अन्य पार्टियों की लानत-मलामत बंद कर देनी चाहिए। अगर अब किसी ने मुझे बताया कि सोनिया गांधी इतालवी हैं तो मैं उस पर पित्जा फेंक दूंगा। बहुत हुआ।

दूसरा सुझाव। भाजपा अपना प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार चुने और हमें बताए। वह इस तरह के बयान न दे कि ‘हमारे पास प्रधानमंत्री पद के कई सक्षम दावेदार हैं।’ माफ कीजिए, लेकिन ऐसा कोई उम्मीदवार नहीं है। भाजपा के कुछ वरिष्ठ नेताओं के पास न तो आत्मविश्वास और धर्य है और न ही वे हमें प्रेरित करते हैं। भारतीय युवा चाहते हैं कि उनके नेताओं का व्यक्तित्व वैश्वीकृत हो। हमारे मौजूदा प्रधानमंत्री में चाहे जितनी खामियां हों, लेकिन वे सुशिक्षित और शालीन तो हैं। भाजपा के कई नेताओं के पास आधुनिक चिंतन नहीं है। भाजपा को अन्य अच्छे नेताओं को सामने लाना होगा।

तीसरा सुझाव। यदि भाजपा हिंदुत्व का प्रतिनिधित्व करने का दावा करती है तो उसे यह शालीनता के साथ करना चाहिए। यह सच है कि धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हिंदुओं की आवाज अक्सर दबा दी जाती है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि हम इसके लिए दूसरे समुदायों को दोषी ठहराएं। हिंदुओं के कई प्रतिष्ठित मंदिरों का रखरखाव बहुत खराब तरीके से किया जाता है। युवा पीढ़ी वहां जाने से कतराती है। इन देवस्थलों की सफाई क्यों नहीं कराई जाती? भाजपा को कुछ सकारात्मक कदम उठाकर हिंदुत्व के प्रति अपना प्रेम प्रदर्शित करना चाहिए।

चौथा सुझाव। भ्रष्टाचार से निजात पाएं। आज हर पार्टी में भ्रष्ट नेता हैं और भाजपा भी अपवाद नहीं है। भाजपा एक ऑपरेशन क्लीनअप चलाए। हर वर्ष टॉप टेन भ्रष्ट नेताओं को बाहर का रास्ता दिखाया जाए और नए ईमानदार व्यक्तियों को सामने लाया जाए। एक दशक के भीतर भाजपा एक नई पार्टी के रूप में हमारे सामने होगी। भाजपा यह प्रतीक्षा न करे कि पुलिस, अदालत, सीबीआई, लोकायुक्त या मीडिया उसे बताएंगे कि भ्रष्टों के साथ कैसा सलूक करना चाहिए।

पांचवां सुझाव। भाजपा नए भारत का प्रतिनिधित्व करे। वह एक ऐसे समाज का प्रतिनिधित्व करे, जहां सच्चाई, समानता और न्याय की अहमियत सत्ता से अधिक है, क्योंकि इन मूल्यों के बिना कोई लोकतांत्रिक व्यवस्था संचालित नहीं हो सकती। यदि सत्ता से पैसा कमाया जा सकता है और पैसे से वोट खरीदे जा सकते हैं तो चुनावों का औचित्य ही क्या रह जाएगा? हमें भारत के लिए नए मूल्य गढ़ने होंगे। इन मूल्यों का प्रतिनिधित्व कौन करेगा?

यदि भाजपा ऐसा करती है तो वह जोरदार वापसी कर सकती है। वरना वह मौजूदा समय में हमारे लिए अपनी प्रासंगिकता गंवा देगी। ऐसी नौबत न आए, इससे बचने के लिए भाजपा को गंभीर रूप से विचार करना चाहिए। यदि वह ऐसा नहीं करती है तो हमारे पास महारानी और युवराज तो खैर हैं ही।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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