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सरकारी एसएमएस की मार
प्रीतीश नंदी
| Sep 27, 2012, 07:56AM IST

इसी परिप्रेक्ष्य में पिछले पखवाड़े मुझे पहला एसएमएस ऊर्जा मंत्रालय से आया, जिसमें मुझे ऊर्जा संरक्षण की थीम पर केंद्रित एक पेंटिंग स्पर्धा के लिए आमंत्रित किया गया था, मानो मैं कोई चौथी, पांचवीं या छठी कक्षा में पढ़ने वाला बच्च हूं। चूंकि मैं कोई स्कूली बच्च नहीं था, लिहाजा मैंने इसे मामूली चूक मानते हुए नजरअंदाज कर दिया। लेकिन उसके बाद उसी दिन मेरी पत्नी और बेटी को भी यही एसएमएस मिला। मेरे ऑफिस में भी सबके पास ऐसा ही एसएमएस आया था। इन कर्मियों में मेरा चपरासी विजय भी शामिल था, जिसने कभी स्कूल का मुंह तक नहीं देखा और आज चालीस साल की उम्र में उसका ऐसा कुछ करने का इरादा भी नहीं है। एसएमएस पाने वालों में मेरे घर की कामवाली बाई, रसोइया, कपड़े धोने वाला और माली समेत सुरक्षाकर्मी भी थे। हालांकि हममें से कोई भी इस स्पर्धा के योग्य नहीं था।
बहरहाल, आपको यह जानकर और भी हैरानी होगी कि मुझे यही एसएमएस 18 बार, मेरी पत्नी को 13 बार और बाकी लोगों के पास 19 से 23 बार तक आया। यह बेतुकी मुहिम जिस किसी के भी दिमाग की उपज हो, लेकिन पूरी रफ्तार पर थी। आर्थिक तंगी का रोना रोने वाली सरकार द्वारा इस तरह की चीजों का समर्थन ठीक नहीं लगता। इस तरह से संबंधित मंत्रालय ने न सिर्फ करदाताओं के पैसे को बर्बाद किया, बल्कि उसने जुड़ने के लिए लक्षित समूह की पहचान करने के लिहाज से भी होमवर्क नहीं किया। इसके अलावा उसने कानून भी तोड़ा, क्योंकि हममें से कई लोगों ने अपने फोन में ‘डू नॉट डिस्टर्ब’ की सुविधा ले रखी है।
अगले दिन मेरे पास एक और एसएमएस आया। इस बार वित्त मंत्रालय मुझे आयकर विभाग के लिए एक शुभंकर डिजाइन करने का आमंत्रण दे रहा था। सौभाग्य से इस बार कोई योग्यता संबंधी क्लॉज नहीं था। इस वजह से यह एसएमएस पाने वाले हम सभी लोग इस स्पर्धा में शामिल हो सकते थे। हालांकि मुझे नहीं लगता कि मेरा रसोइया या ड्राइवर जानता होगा कि शुभंकर किस चिड़िया का नाम है और इसे डिजाइन कैसे किया जाता है। लेकिन हर कोई यह जरूर जानता है कि आयकर क्या होता है।
चूंकि इसमें 1 लाख रुपए की लुभावनी पुरस्कार राशि (हालांकि तमाम तरह के कर काटने के बाद यह उतनी लुभावनी नहीं भी लग सकती है) का प्रावधान था, लिहाजा हर कोई ऑफिस में काम छोड़कर स्कैचिंग करने लगा। कोई खून पीने वाला वैंपायर बना रहा था, कोई गुर्राने वाला वनमानुष, तो कोई उन्मादी भयंकर राक्षस बना रहा था। यानी हर कोई अपने हिसाब से इसके लिए उपयुक्त शुभंकर बनाने में लगा था। कुछ लोगों ने तो मेरे पास आकर मुझसे यह भी पूछा कि क्या इसके लिए कंस सही शुभंकर रहेगा, क्योंकि आयकर विभाग जन्म से ही आप पर नजरें गड़ा देता है।
बहरहाल, सात-आठ दिन पहले मुझे एक और एसएमएस मिला। डीजल की कीमतों में 5 रुपए प्रति लीटर की बढ़ोतरी के बाद अचानक स्वास्थ्य मंत्रालय मुझे एसएमएस के जरिए समझाने लगा कि मैं आत्महत्या न करूं। शायद उन्हें मालूम होगा कि मैं डीजल से चलने वाली एसयूवी चलाता हूं। मगर चूंकि इसमें आत्महत्या की तैयारी करने वाले लोगों के लिए किसी हेल्पलाइन का जिक्र नहीं था, लिहाजा यह एसएमएस भी एक बर्बादी ही था। वैसे भी यूपीए सरकार ने पिछले तीन-चार सालों में हमें लगातार कमरतोड़ महंगाई की जो सौगात दी है और एक के बाद एक कर लगाते हुए जिस तरह हर चीज (यहां तक कि आत्महत्या के साधनों को भी) हमारी पहुंच से दूर कर दिया है, ऐसे में कोई भी हेल्पलाइन अब तक धराशायी हो जाती।
आज मैं आत्महत्या में मदद के लिए जिस किसी के भी पास जाऊं तो वह इस सेवा के बदले मुझ पर सेवाकर और वैट लाद देगा, वहीं कुछ ऐसे भी लोग होंगे, जो यह कहते हुए लक्जरी व एंटरटेनमेंट टैक्स की भी मांग कर सकते हैं कि आत्महत्या अब एक दर्शनीय खेल होने के नाते करयुक्त हो गया है। मजे की बात तो यह है कि सरकार हमें आत्महत्या करने की हर वजह देती है, लेकिन इसे अवैध मानती है।
इस वजह से मैं हमेशा की तरह दुविधा की स्थिति में फंस गया हूं। संभवत: कपिल सिब्बल की सलाह मानकर तमाम संचार साधनों का बहिष्कार करना ही बेहतर होगा। कोई ई-मेल नहीं। कोई फेसबुक नहीं। कोई ट्विटर नहीं। कोई बीबीएम (ब्लैकबेरी मैसेंजर) नहीं। कोई एसएमएस नहीं। इस सब पर रोक लगा दें, इससे पहले कि सरकार आगामी चुनाव से पूर्व हर जगह घुसपैठ करते हुए हमसे इस तरह जुड़ने की कोशिश करे।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व फिल्मकार है।)






