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नौकरशाही और असम्मति का हक
हर्ष मंदर
| Sep 28, 2012, 00:00AM IST

मैंने दो दशक तक सिविल सेवा में रहते हुए देखा कि लोकतंत्र में आज्ञापालन को नौकरशाहों का परम धर्म माना जाता है। सिविल सेवा से जुड़े लोगों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे अपने राजनीतिक आकाओं के फरमान का बगैर कोई सवाल किए पालन करें। असम्मति जताने वाले अधिकारियों के बारे में यही माना जाता है कि वे संसदीय लोकतंत्र में अनिर्वाचित कार्यकारियों के लिए निर्धारित सीमारेखा को पार कर रहे हैं। लेकिन मेरे ख्याल से आज्ञापालन वहीं तक उचित है, जहां सरकार के सार्वजनिक रूप से समर्थित वैध उद्देश्य पूरे होते हों।
निर्वाचित राजनेताओं के अवैध निर्देशों को सिर झुकाकर मान लेना जरूरी नहीं है। मिसाल के तौर पर सरकारें आधिकारिक तौर पर यही कहती हैं कि अधिसूचित भूमि सुधार के नियम-कायदों को विश्वासपूर्वक लागू किया जाए। लेकिन राजनीतिक आकाओं का अघोषित आदेश अमूमन यही होता है कि ताकतवर भूस्वामियों को उनकी जमीनों से अलग न किया जाए। जब भी अतिरिक्त कृषियोग्य जमीन भूमिहीनों को देना चाहें या आदिवासियों से अवैध तरीके से छीनी गई जमीनें उन्हें वापस लौटाना चाहें तो स्थानीय निर्वाचित प्रतिनिधि से लेकर मंत्री तक हमें प्रगतिशील भूमि सुधार कानून को लागू करने से रोकने लगते हैं।
इसी तरह नीति के मुताबिक सांप्रदायिक, जातीय या लैंगिक हिंसा के खिलाफ निष्पक्ष और भेदभाव-रहित कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन अघोषित तौर पर राजनीतिक या प्रशासनिक निर्देश अमूमन असुरक्षित व उत्पीड़ित वर्गो, धार्मिक व जातीय अल्पसंख्यकों और महिलाओं के खिलाफ पक्षपाती कार्रवाई को बढ़ावा देने वाले होते हैं।
वास्तव में यदि शासकीय अधिकारी घोषित नीतियों और सरकार के नियम-कायदों के प्रति निष्ठावान हों तो वे भूमि सुधार जैसे प्रगतिशील कानूनों को लागू करने, दमित-उत्पीड़ित असहाय लोगों व महिलाओं की रक्षा करने और भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए प्रतिबद्ध होंगे। लेकिन हकीकत यह है कि इस तरह के कार्य करते हुए शासकीय अधिकारी अपने ऊपर बैठे लोगों के अवैध लक्ष्यों की बार-बार अवहेलना करेंगे। जो नौकरशाह इन अवैध निर्देशों के मुताबिक चलते हैं, वे आज्ञापालन के कर्तव्य का नैतिक बचाव नहीं कर सकते। इस तरह के अवैध आदेशों का प्रतिरोध या इन्हें मानने से इनकार करना भी उनका दायित्व है। ऐसा करते हुए ही वे वास्तव में लोकतंत्र व संविधान की रक्षा कर सकते हैं।
आजादी के बाद शासकीय सेवकों ने विभाजन के चलते विस्थापित हुए लोगों के लिए राहत शिविर लगाए और उनके पुनर्वास का प्रबंध किया। वे विभाजनकारी व सांप्रदायिक राजनीति और संगठनों को भी नियंत्रित करने में सफल रहे, जिसके नतीजतन हमारा जख्मी देश गांधीजी की हत्या के बाद सांप्रदायिक दंगों से मुक्त रहा। हालांकि इसमें जल्द ही दरारें उभरने लगीं। अयोध्या के कलेक्टर नायर द्वारा वर्ष 1949 में हिंदुओं की पूजा के लिए बाबरी मस्जिद का ताला खोलने से सांप्रदायिक विवाद की नींव पड़ी, जिसने तीन दशक बाद देश को दो खेमों में बांट दिया। लेकिन तब भी देश अपने शीर्ष नौकरशाहों पर धार्मिक व जातीय विवादों में निष्पक्ष कार्रवाई का भरोसा कर सकता था। सिविल सेवा का घनघोर उल्लंघन 1975 में आरोपित आपातकाल के दौरान देखने में आया। जस्टिस शाह की अध्यक्षता में गठित एक न्यायिक आयोग ने आजादी के निलंबन के इन दर्दनाक व शर्मनाक 18 महीनों की जांच करते हुए कहा कि जब नौकरशाही से झुकने के लिए कहा गया, तो यह रेंगने लगी।
बाद के दशकों में राष्ट्र के समक्ष पेश आई अनेक बड़ी चुनौतियों के दौरान सरकारी व्यवहार में अवैध आदेशों का प्रतिरोध करने की ऐसी ही नाकामी नजर आई। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिखों का कत्लेआम; भोपाल गैस कांड के मामले में यूनियन कार्बाइड की आपराधिक जवाबदेही तय करने; 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस और इसके बाद मुंबई में मची मार-काट; तथा 2002 में हुए गुजरात दंगे जैसे तमाम मामलों में नौकरशाही अपनी भूमिका ठीक से नहीं निभा सकी।
समय गुजरने के साथ-साथ नौकरशाही के ज्यादा से ज्यादा धड़े अवैध आदेशों के आगे नतमस्तक होने लगे। हालांकि इसके कुछ गुमनाम नायकों ने धारा के विरुद्ध तैरते हुए अन्यायपूर्ण और अवैध आदेशों को मानने से इनकार भी किया, लेकिन वे कभी भी पर्याप्त रूप से इतनी शक्ति नहीं जुटा सके जिससे नौकरशाही सांप्रदायिक राजनीति, भ्रष्टाचार तथा अन्याय के विरुद्ध निर्णायक ताकत के रूप में काम कर सके।
इस वजह से नौकरशाही को धार्मिक व जातीय अल्पसंख्यकों तथा अभावग्रस्त लोगों को समान रूप से कानूनी संरक्षण देने में नाकामी का ऐतिहासिक दोष लेना होगा। जब तक नौकरशाह अपनी अंतरात्मा की आवाज पर अपने मौलिक कर्तव्यों के निर्वहन का जिम्मा नहीं लेते, उन्हें देश में प्रशासन की बागडोर संभालने का दावा छोड़ देना चाहिए।
(लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं।)
हर्ष मंदर
राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य






