एक अनाम का जाना
Bhaskar News
| Dec 31, 2012, 00:47AM IST
वह अनाम रही, लेकिन असाधारण मृत्यु को वरण किया। एक ऐसी मृत्यु जिसने लोगों की सोई चेतना और समाज की आत्मा को झकझोरा है।
उसने अहसास कराया है कि हम कैसे बीमार और अपराधी सोच के साये में रहते आए हैं। दशकों से ऐसी घटनाएं आम जनमानस पर जो जख्म छोड़ती रहीं और उनको लेकर जिस लाचारी का भाव हममें बना रहा, उसके प्रति उसने विद्रोह को प्रेरित किया है।
उससे जो बर्बरता हुई, उसने आखिरकार लोगों की तंद्रा तोड़ी। उन्हें आगाह किया कि अगर वे यूं ही सब कुछ सहते रहे, तो फिर कोई सुरक्षित नहीं है। जो देश की राजधानी में सरे-शाम उसके साथ हुआ, वह किसी के भी साथ हो सकता है। तो लोग अब सड़कों पर आकर हुक्मरानों से जवाब मांग रहे हैं। जनाक्रोश ने सत्ता और प्रशासन में हरकत पैदा की है। लेकिन हजारों दूसरी अनाम महिलाएं वैसे ही जुर्म का शिकार न हों, इसके लिए यह काफी नहीं है। इसलिए कि समस्या सिर्फ पुलिस या न्याय व्यवस्था तक सीमित नहीं है।
इसकी जड़ें हमारे समाज में, वस्तुत: हमारी मानसिकता में पैठी हुई हैं। लगभग हर लड़की की तरह उस अनाम को भी लैंगिक भेदभाव और स्त्री को कमतर मानने की सोच के परिणामों को अक्सर भुगतना पड़ा होगा। उसके संदर्भ में बात वहीं तक नहीं रही, बल्कि छह निहायत क्रूर आरोपियों ने उसके जिस्म को इस तरह निशाना बनाया कि जिंदगी के आगाज में ही उसका दुखद अंजाम हो गया। इससे हमारे आहत मन का उन पाशविक लोगों को सख्त-से-सख्त सजा देने की मांग करना स्वाभाविक है।
ऐसे अपराधियों पर लगाम की जनता की मांग भी उचित है। लेकिन अगर चर्चा यहीं तक सीमित रह गई, तो उस अनाम की मृत्यु समाज में जिस आक्रोश एवं ऊर्जा के विस्फोट का कारण बनी है, वह कोई ठोस उपलब्धि प्राप्त नहीं कर सकेगी। आवश्यकता बहस को समाज की विषम एवं स्त्री विरोधी परंपराओं तक ले जाने की है। सड़कों पर उमड़े जनाक्रोश को उस सोच की तरफ मोड़ने की है, जो स्त्री को सिर्फ शरीर मानती है, जो उस पर जबर्दस्ती पुरुष का हक मानती है। अगर बात वहां तक पहुंची, तो यह उस अनाम के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।






