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नेताओं का भंडाफोड़ काफी नहीं

वेदप्रताप वैदिक | Oct 17, 2012, 00:12AM IST
 
 


देश  में राजनीति का पता ही नहीं चल रहा है कि वह किस दिशा में जा रही है। लोग पापड़ को पुलाव समझकर खा रहे हैं। कभी इस नेता, कभी उस नेता और कभी किसी नेता के रिश्तेदार के विरुद्ध आरोपों का पुलिंदा उछालकर हम समझते हैं कि हम देश की राजनीति में बुनियादी परिवर्तन ला रहे हैं।


इसमें शक नहीं कि आज भ्रष्टाचार देश का सबसे ज्वलंत मुद्दा बन गया है। इस जलते हुए अलाव में अगर आप घासलेट में भीगी एक चिंदी भी उछालते हैं तो प्रचार की आग भड़क उठती है। आग भी भड़कती है और बदबू भी फैलती है। इसके बावजूद इसे गलत बिल्कुल नहीं कहा जा सकता।


यह साहस ही नहीं, दुस्साहस भी है। यह बहुत जोखिमभरा काम है। सरकार की परतें उखाडऩे के लिए ऐसे दो-चार भंडाफोड़ ही काफी हैं। अकेले बोफोर्स ने राजीव गांधी जैसे युवा प्रधानमंत्री का भाग्य अस्त कर दिया था तो यह नई भंडाफोड़-माला पता नहीं अगले कितने वर्षों तक कांग्रेस के भाग्य पर भारी पड़ेगी। लेकिन मूल प्रश्न यह है कि क्या कांग्रेस के डूब जाने से व्यवस्था-परिवर्तन हो जाएगा? सांपनाथ मरेंगे तो उनकी जगह नागनाथ आ जाएंगे।


यह जोखिमभरा काम इसलिए है कि इसका लक्ष्य भंडाफोड़ करके प्रचार पाना है। वह प्रचुर मात्रा में मिल भी रहा है, लेकिन इनमें से कुछ आरोप अगर गलत या निराधार सिद्ध हो गए तो ताश का सारा महल ही धराशायी हो जाएगा। मान लें कि सारे आरोप सही हैं, तो भी क्या फुलझडिय़ों से रोशनी हो जाएगी? मान लें कि कुछ मंत्री रंगे हाथों पकड़ लिए गए और उनके इस्तीफे हो गए तो भी क्या हो जाएगा? क्या सरकार गिर जाएगी? क्यों गिर जाएगी, कैसे गिर जाएगी?


सरकार न गिरे, संसद के चुनाव न हों और हर सांसद अपनी कुर्सी में पांच साल तक जमा रहे, यह सभी पार्टियां चाहती हैं। सांसद चाहे किसी भी पार्टी का हो, उसे पांच करोड़ रुपए की सांसद राशि हर साल मिलती है। यदि संसद आज भंग हो जाए, तो दो साल के दस करोड़ रुपए तो उसके हाथ के नीचे से खिसक गए। इसके अलावा जिसने भी पांच साल पूरे नहीं किए, उस सांसद की पेंशन भी खतरे में पड़ जाएगी। इतना ही नहीं, दो साल के मोटे वेतन और भत्ते का घाटा भी बर्दाश्त करना पड़ेगा। इसलिए घोटाले उछलते रहेंगे और संसद बरकरार रहेगी। आज तक किस घोटाले को लेकर सरकार या संसद बर्खास्त हुई है?


घोटालों के फूटने के कारण सरकार का गिरना तो दूर का सपना है, इनके कारण उसकी खाल पहले से भी मोटी होती चली जाती है। एक टीवी चैनल ने सरकार के इस रवैये को नाम दिया- 'ऑपरेशन धृतराष्ट्र'। मैंने उसी चैनल पर कहा कि इसे आप 'ऑपरेशन महाधृतराष्ट्र' कहिए, क्योंकि महाभारत का धृतराष्ट्र केवल देखता नहीं था, दृष्टिहीन था। हमारा धृतराष्ट्र तो न देखता है, न सुनता है, न बोलता है। उसने गांधीजी के तीनों बंदरों को भी मात कर दिया है। वह अंधा भी है, बहरा भी है और गूंगा भी है। जो लोग भंडाफोड़ को व्यवस्था-परिवर्तन की शुरुआत समझ रहे हैं, उन्हें पता होना चाहिए कि भ्रष्टाचार की असली जड़ कहां है। जब तक जड़ पर प्रहार नहीं होगा, यह वृक्ष लहलहाता ही रहेगा।


आप नेताओं का भंडाफोड़ कर रहे हैं, यह तो बहुत अच्छा है। इससे देश में जागृति फैल रही है, लेकिन क्या देश में एक भी नेता ऐसा है या एक भी पार्टी ऐसी है, जो हाथ उठाकर कह सके कि वह भ्रष्टाचार से मुक्त है? हमारी राजनीति काजल की कोठरी बन गई है। उसमें जाने वाला एक भी आदमी ऐसा नहीं मिल सकता, जिसके दामन पर दाग न हो। इस कोठरी में जिस दिन आप भी पहला कदम रखेंगे, आपका दामन भी उजला नहीं रह पाएगा। इसीलिए मैं कहता हूं कि भंडाफोड़ का यह सारा द्रविड़ प्राणायाम अगर सिर्फ पार्टी बनाने के लिए हो रहा है तो आगे जाकर भारत की जनता निराशा के गर्त में गिरे बिना नहीं रहेगी।


जरूरी यह है कि भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए उसकी जड़ों पर प्रहार किया जाए। यह जड़ कहां है? यह जनता में है। जनता से सरककर ही यह नेताओं में चली आती है। एक बार नेता भ्रष्ट हुए नहीं कि भ्रष्टाचार का विषाक्त चक्र घूमने लगता है। लोकतंत्र का मालिक कौन है? जनता या नेता? जब मालिक ही भ्रष्ट हों तो नौकरों का क्या पूछना? चाबी तो नौकरों के हाथ में होती है। वे खुली लूट करते हैं। यदि जनता संकल्प कर ले कि वह कोई भी गैरकानूनी या अनैतिक काम करवाने के लिए नेताओं पर दबाव नहीं डालेगी और उन्हें रिश्वत नहीं देगी तो किसकी हिम्मत है कि वह भ्रष्टाचार करेगा?


हर नेता और नौकरशाह को पता होगा कि अगर उसने भ्रष्टाचार किया तो अदालत उसको जब सजा देगी तब देगी, लेकिन भारत की जागरूक जनता तत्काल सीधी कार्रवाई करेगी। हमारे नेताओं और नौकरशाहों को पता है कि देश के मुखर मध्यमवर्ग के 20-30 करोड़ लोग खुद भी भ्रष्टाचार का सहारा लेने से नहीं चूकते, तो वे भ्रष्टाचार के विरुद्ध खड्गहस्त क्यों होंगे? इस मुखर मध्यमवर्ग को कौन फटकारेगा? क्या वे लोग फटकार सकते हैं, जो पार्टी बनाकर इन्हीं के वोटों के दम पर सत्ता में आना चाहते हैं?


नेताओं के भ्रष्टाचार को उजागर करके प्रचार पाना आसान है, लेकिन भ्रष्टाचार को दूर करना कठिन। पग-पग पर फैले हुए असंख्य छोटे-मोटे भ्रष्टाचारों से जनता त्रस्त है। यदि आंदोलनकारी आम आदमी के इस दर्द को समझें और उसके निवारण के लिए सीधी कार्रवाई करें तो भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना संभव है।



वेदप्रताप वैदिक


प्रसिद्ध राजनीतिक चिंतक  


 

 
 
 

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