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नए उपभोक्तावाद से जुड़ी सकारात्मकता

प्रीतीश नंदी | Dec 06, 2012, 01:19AM IST
 
 

मेरे पिताजी बचपन में मुझे अपने बचपन के उस भारत के किस्से सुनाया करते थे, जब लोगों के बीच वर्गभेद इतना गहरा नहीं था। हर कोई हर तरह के पर्व मनाया करता था। हिंदू अपने मुस्लिम साथियों के साथ ईद के जश्न में पूरे उत्साह से शामिल होते और उनके घरों में पके लजीज पकवानों का साथ मिलकर लुत्फ उठाते थे।
 
मुसलमान भी दुर्गा पूजा इत्यादि में सक्रिय रूप से भागीदारी निभाते थे और इनमें से कई तो देवी दुर्गा की प्रतिमाएं भी बनाते थे। हिंदू व मुस्लिम समुदाय कलकत्ता (अब कोलकाता) में रहने वाली ईसाइयों की लघु आबादी (जिनमें से कई एंग्लो इंडियंस थे) के साथ क्रिसमस और नए साल का जश्न धूमधाम से मनाते थे। इसके अलावा यहां सिख व बौद्ध मतावलंबी, चीनी, बगदादी यहूदी और अमेरिकी लोग भी थे, जो सिर्फ अपने त्योहार नहीं, वरन हर तरह के त्योहार में शामिल होते थे। इस तरह कह सकते हैं कि कलकत्ता अनेक संस्कृतियों, मान्यताओं का रोमांचक संगम था। 
 
मगर मेरी पीढ़ी तक आते-आते काफी कुछ बदल गया। विभाजन के बाद हुए दंगों के बाद हिंदू व मुस्लिम अपने-अपने धर्म के प्रति ज्यादा कट्टर हो गए। हरेक दंगे के साथ उनके बीच की दूरियां और बढ़ती गईं तथा वे धीरे-धीरे दो अलग-अलग वोट बैंकों में तब्दील हो गए। हमारे राजनेता भी इसमें अपना राजनीतिक फायदा देखते हुए उनकी धार्मिक पहचानों पर जोर देने लगे।
 
वहीं एंग्लो-इंडियंस, यहूदी और आर्मेनियंस जैसे अपेक्षाकृत छोटे और ज्यादा असुरक्षित समुदाय अपनी अद्भुत विरासत को पीछे छोड़ धीरे-धीरे विदेशों की ओर पलायन कर गए। 1962 के युद्ध के बाद मेरे शहर के ज्यादातर लोग अपने चीनी पड़ोसियों की निष्ठा पर सवाल उठाने लगे। इससे इन चीनी परिवारों का दिल टूट गया और वे दूसरे शहरों में जाकर बस गए। वर्ष 1984 के सिख-विरोधी दंगों ने भी हमेशा खुशमिजाज रहने वाले सिखों को अपनी पहचान की राजनीति में डुबो दिया। धीरे-धीरे भारत की सामूहिक आत्मा बिखरने लगी। मंडल कमीशन ने चीजों को और बदतर बना दिया। अब जाति
तमाम वास्तविक-अवास्तविक ऐतिहासिक गलतियों से लड़ने का नया हथियार बन गई।
 
मैंने इस रूपांतरण को देखा और इसमें भागीदारी भी की है। इस बारे में अंतहीन बहसों का खूब दौर चला कि कौन हमें विभाजित करता है। इससे राजनेताओं का एक नया समूह निकलकर आया। लेकिन यह समूह भी बुद्धिजीवियों को विभाजित करने, मीडिया को बांटने, पाठ्यक्रमों में परिवर्तन करने और हमें अपने आसपास की ज्यादातर चीजों के बारे में अलग तरह से सोचने पर मजबूर करने में कामयाब रहा। अंतरजातीय या अंतरसामुदायिक विवाह मेरी जवानी के दिनों में आम हुआ करते थे, लेकिन बाद में इस तरह की शादियों पर बेवजह हायतौबा मचने लगी और कई बार यह आपसी दुश्मनी का भी सबब बन गईं। अब लोग ऐसी बातों पर भी गौर करने लगे, जिन्हें वे पहले तवज्जो नहीं देते थे। हम जैसे लोग चुनाव में अब उम्मीदवारों को उनके धर्म और जाति के आधार पर चुनने लगे। धर्म, जाति, अंचल और भाषा की राजनीति इतनी प्रभावी हो गई कि हमारी पहचान ‘हम कौन हैं’, की बजाय ‘हम कहां से आए हैं’, ‘कौन-सी भाषा बोलते हैं’, ‘किसकी पूजा या इबादत करते हैं’ और ’हमारे पूर्वज कौन थे’ जैसे कारकों से तय होने लगी। 
 
इस प्रक्रिया में हमारा देश भीतर ही भीतर बंटने लगा। हम अपनी विशिष्ट मांगों की खातिर लड़ने में इतने व्यस्त हो गए कि हमें याद ही नहीं रहा कि राष्ट्र-निर्माण हमारा प्रथम और सबसे जरूरी काम है। अंग्रेजों को देश से खदेड़ने के चालीस साल के भीतर ही हम नई क्रांतियों और बगावत की बात करने लगे। हम में से कई लोग खुद को परास्त, एकाकी तथा अपने ही देश में ‘बाहरी’ की तरह महसूस करने लगे। इसने उन्हें बेहद गुस्से से भर दिया। इस गुस्से से हिंसा उपजी। कुछ लोग तो अखंड भारत के विचार से खुद को अलग करने के लिए भी तैयार थे। 
 
लेकिन अब चीजें धीरे-धीरे सकारात्मक रूप से पुन: बदलने लगी हैं। आश्चर्यजनक ढंग से एक नई पीढ़ी जो नई महत्वाकांक्षाओं और नए उपभोक्तावाद से प्रेरित है, इस बदलाव को हवा दे रही है। इस बदलाव के मूल में भी एक बार फिर हमारी जश्न मनाने की परंपरा है। हम हर साल ज्यादा से ज्यादा चीजों का जश्न मना रहे हैं। पूजा-इबादतें बढ़ रही हैं। नए उत्सवों को खोज-खोजकर बाहर निकाला जा रहा है। हरेक समुदाय उत्सव मनाने के नए बहाने तलाश रहा है। दुर्गा पूजा अब सिर्फ कोलकाता की खासियत नहीं है।  मुंबई जैसे शहरों में भी इसका भव्य आयोजन होता है। इस तरह का हरेक मौका लोगों को नए सपने, नए उत्पाद बेचने का एक अवसर होता है। ब्रांड्स भले ही संशयवादी हो, लेकिन बाजार नहीं है। हर त्योहार अपने जश्न मनाने वाले समुदाय को बढ़ा रहा है। 
 
लोगों की छुट्टियों में इजाफा हुआ है। इसके साथ-साथ उनमें खरीदारी, उपहारों के लेन-देन व पार्टीबाजी करने की प्रवृत्ति भी बढ़ी है। एक नए तरह का उपभोक्तावाद हम सबको एक साथ ले आया है। हर साल हमारे देश में खूब इफ्तार पार्टियां होती हैं और इनमें से कई पार्टियां तो गैर-मुस्लिमों द्वारा दी जाती हैं। दीपावली और ईद के अवसर पर देश में बड़ी-बड़ी ब्लॉकबस्टर फिल्में रिलीज होती हैं। क्रिसमस और न्यू ईयर के मौके पर हर कोई गोवा जाना पसंद करता है। हर कोई धनतेरस पर सोना खरीदता है। हर कोई दशहरे की बिक्री का इंतजार करता है। और हां, हर कोई पुन: हर चीज का जश्न मना रहा है। जिसे राजनीति ने विभाजित किया, उसे मॉल्स, मल्टीप्लेक्स व ब्रांड्स संभवत: फिर साथ ले आए हैं, खुशी मनाने के एक नए कारण के साथ। 
 
प्रीतीश नंदी
 
वरिष्ठ पत्रकार और फिल्मकार      

 

 

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