चुनौतियां अभी और भी हैं
संसदीय संख्या प्रबंधन में यूपीए के कौशल को जरूर दाद दी जानी चाहिए, वरना जिस सदन (राज्यसभा) में यूपीए का साधारण बहुमत भी नहीं है, वहां खुदरा कारोबार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) से संबंधित प्रस्ताव पर बहुमत से विजय पा लेना आसान नहीं था।
खासकर उस हाल में, जब अधिकांश दल इस क्षेत्र में एफडीआई की इजाजत के खिलाफ खुलकर अपनी राय जता चुके हैं। संसद के दोनों सदनों में बहस विपक्ष के हक में झुकी रही, लेकिन संख्या बल सरकार के पक्ष में सामने आया। विपक्ष का दावा है कि सरकार की नैतिक हार हुई। लेकिन राजनीति में कौन, कब और कहां नैतिकता का कितना ख्याल करता है, यह सर्वविदित है।
इसलिए हकीकत यही है कि सरकार ने खुदरा व्यापार में एफडीआई की इजाजत देकर एक बड़ा सियासी दांव खेला था, जिसमें वह कामयाब हो गई है। देशहित के नजरिये से अब अहम सवाल यह है कि इससे अर्थव्यवस्था को संभालने में कितनी मदद मिलेगी?
सरकार के अनुमान के मुताबिक विदेशी मुद्रा देश में आती है, तो उसका सकारात्मक असर जरूर देखने को मिलेगा। लेकिन क्या सचमुच उस मात्रा में विदेशी निवेश हो पाएगा? पेच यह है कि विपक्ष भले ही संसद में हार गया हो, लेकिन वह यह संदेश देने में सफल है कि राजनीतिक दायरे का बहुत बड़ा हिस्सा इस क्षेत्र में एफडीआई के न सिर्फ खिलाफ है, बल्कि इसे रोकने पर आमादा भी है।
इस मामले में फैसला राज्य सरकारों को करना है। अगर अपने राजनीतिक रुख के मुताबिक विभिन्न राज्य सरकारों ने फैसला किया, तो देश के ज्यादातर शहरों के दरवाजे एफडीआई के लिए बंद ही रहेंगे। महानगरों में सिर्फ दिल्ली में राह आसान दिखती है, क्योंकि देश के अधिकांश राज्यों में वे पार्टियां हैं, जो एफडीआई के खिलाफ हैं।
कहने का तात्पर्य यह है कि संसद में सरकार की जीत विदेशी निवेशकों में संभवत: उतना भरोसा पैदा नहीं कर पाएगी, जिससे वे पूरे उत्साह से भारत के खुदरा व्यापार क्षेत्र का रुख कर लें। यानी विदेशी निवेश बढ़ाकर जीडीपी विकास दर में वृद्धि की सरकारी रणनीति की राह अभी भी आसान नहीं है। चुनौतियां अभी और भी हैं।






