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संत ने बदल दी गणिकाओं के जीवन की राह

bhaskar news | Sep 19, 2012, 08:25AM IST
 
 

संत सोलोमन अत्यंत उदार हृदय थे। उनके पास जो भी दीन-दुखी आता, वे उसकी हर संभव सहायता करते थे। उनकी सहृदयता सभी पर समान रूप से बरसती थी। संत सोलोमन एक स्थान पर नहीं टिकते थे, सदा भ्रमण करते रहते।






ऐसे ही एक बार वह घूमते हुए ऐसे स्थान पर पहुंच गए, जो गणिकाओं का निवास स्थान था। चूंकि गणिकाओं के पास व्यक्ति अपनी वासना पूर्ति के लिए ही जाता है, अत: वे समझीं कि संत का भी यही उद्देश्य है। उनमें से कुछ ने संत का उपहास किया कि वह साधु के वेश में विलासी हैं, तो किसी ने संत सोलोमन को संकेत से अपने पास बुलाया। चूंकि संत का हृदय निष्कपट था, इसलिए वह निर्विकार भाव से उसके पास चले गए।






संत ने अपना परिचय दिया और गणिका ने अपना। तब सोलोमन उसके विषय में जानकर रो पड़े और बोले- ‘हे भगवान! तेरी इतनी सुंदर सृष्टि में यह कैसा अनर्थ हो रहा है? इन्हें भी तेरा प्रेम और दया मिलनी चाहिए।’ संत का ऐसा निष्पाप भाव देख गणिका इतनी प्रभावित हुई कि वह साध्वी बन गई। उसका अनुगमन करते हुए सारी गणिकाएं साधना के मार्ग पर चल पड़ीं। संत की प्रेरणा से उन लोगों ने वेश्यावृत्ति द्वारा अर्जित धन से एक मठ और नारी निकेतन का निर्माण करवाया और परोपकार को सदा के लिए अपना लिया। वस्तुत: विवशतावश या अविवेक के कारण जिनका पतन हुआ है, उन्हें निर्विकार भाव से विकास की मुख्यधारा में लाना महान परमार्थ होता है, जिसे करने वाला सच्चा संत और समाज सुधारक होता है।
 
 
 

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