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संघ के लिए अग्निपरीक्षा की घड़ी

चेतन भगत | Nov 15, 2012, 00:34AM IST
 
 

कुछ माह पूर्व मुझे एक विस्तृत मेल मिला, जिसमें मुझसे विनम्र शब्दों में विवेकानंद की १५क्वीं जयंती पर आयोजित समारोह में युवाओं के समक्ष देश सेवा के बारे में प्रेरक उद्बोधन देने का आग्रह किया गया था। इस समारोह में देश के तमाम वर्गो से युवा आने वाले थे। इसकी थीम थी बेहतर भारत बनाने की दिशा में युवाओं को अपना योगदान देने के प्रति जागरूक करना। यह एक आदर्श विषय था और मेरे दिल के करीब भी था। मगर मैंने इनकार कर दिया। ऐसा करने के पीछे सिर्फ एक वजह थी कि यह आमंत्रण संघ परिवार की ओर से आया था।  
 
यह पहली बार था जब मैंने किसी आयोजन में जाने से इसलिए इनकार कर दिया कि कहीं मुझे आमंत्रित करने वाले संगठन से जुड़ा हुआ न समझ लिया जाए। मुझे ऐसा करते हुए बुरा भी लगा, क्योंकि मैं जानता था कि जिस शख्स ने बुलावा भेजा है, वह एक समर्पित कार्यकर्ता है और उसकी ज्यादातर जिंदगी समाज-सेवा में गुजरी है।
 
मैं अनेक संघ कार्यकर्ताओं को जानता हूं, जिन्होंने बगैर किसी स्वार्थ के समाज की बेहतरी के लिए कई अच्छे काम किए हैं। मैं यह भी जानता था कि इस इवेंट में आने वाला युवा राजनीति की बजाय जिंदगी में प्रेरणा और मार्गदर्शन की तलाश में होगा। अलबत्ता मुझे यह भी पता था कि मेरे द्वारा संघ की किसी सभा में बोली गई बातों को सोशल नेटवर्किग साइट्स या मीडिया को उठाने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। और सिर्फ यही वजह इन दिनों आपको अपयश का भागी बनाने के लिए पर्याप्त है, खासकर अंग्रेजी मीडिया में। 
 
मैंने काफी झिझकने के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर एक कॉलम लिखने की कोशिश की है क्योंकि इस संगठन के बारे में लिखे गए संतुलित पीस को भी उनके प्रति सहानुभूति की तरह देखा जाता है। जो कोई भी उनकी या उनके कार्यो की तारीफ करे, उसे तुरंत उनका एजेंट मान लिया जाता है। कुछ पत्रकार ऐसे संगठनों के प्रति तटस्थ और निष्पक्ष होने का दावा कर सकते हैं। उनके पास इसके जायज कारण भी हैं। कुछ सर्वाधिक प्रतीपगामी, सांप्रदायिक और विभाजनकारी विचारों को ऐसे संगठनों में समर्थन मिला है। आधुनिक व वैज्ञानिक विचार नेपथ्य में पहुंच गए हैं तथा इन संगठनों के भीतर सुधारों की प्रक्रिया बेहद धीमी है। 
 
मगर संघ परिवार ने कई अच्छे काम भी किए हैं। चाहे यह प्राकृतिक आपदा से पीड़ित लोगों के लिए राहत कार्य चलाना हो, जाति सुधार या कश्मीर में सामाजिक कार्य करना; संघ इस तरह के प्रयासों से समाज में सकारात्मक बदलाव भी लेकर आया।  इसके कुछ काम तो ऐसे हैं, जिनके बारे में जानकर आप हैरत में पड़ जाएंगे। मिसाल के तौर पर संघ परिवार ने कश्मीर में आतंकवादियों द्वारा अनाथ बना दिए गए मुस्लिम बच्चों को गोद लिया है। 
 
विडंबना यह है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रकृति और इसके द्वारा अतीत में किए गए नकारात्मक कार्यो के चलते इसके अच्छे कामों को शायद ही कभी पहचान मिलती है। यह संगठन आज के समय में युवाओं की जरूरतों के साथ ज्यादा जुड़ा नहीं है। यह आकांक्षी नहीं है और इसके नेता आज के  युवाओं के रोल मॉडल बनने के इच्छुक नजर नहीं आते। 
 
हालांकि संघ परिवार इस वक्त गडकरी और उनकी संदिग्ध कारोबारी स्थिति को लेकर सच का सामना कर रहा है। गौरतलब है कि इस संगठन को अपनी तमाम खामियों के बावजूद कभी भी भ्रष्ट, धन का लालची या काले धन के संरक्षक के तौर पर नहीं देखा गया। लेकिन जब इसने गडकरी का समर्थन किया तो इस पर ऐसे आरोपों का भी दाग लग गया। एक ऐसे संगठन के लिए, जिस पर पहले ही सांप्रदायिक होने का ठप्पा लगा हो, ऐसे आरोप ताबूत में आखिरी कील साबित हो सकते हैं। संघ भले ही राजनीतिक जुड़ाव रखता हो, लेकिन यह राजनीतिक दल नहीं है। राजनीतिक पार्टियों की तरह संघ राजनीतिक मजबूरियों का दावा करते हुए अपनी आत्मा और चेतना को नहीं बेच सकता।  संघ गडकरी मामले में अपने ही सीए के जरिये संदिग्ध बचाव पेश करते हुए बरी नहीं हो सकता। यदि संघ को लगता है कि गडकरी पाक-साफ हैं तो वह उनके एकाउंट्स की जांच के लिए किसी बड़ी ऑडिटिंग फर्म को नियुक्त क्यों नहीं करता?
 
धार्मिक हिंसा जैसी अतीत की गलतियां अभी भी उनका पीछा नहीं छोड़ रही हैं। दशकों तक धर्मनिरपेक्ष कार्य करने से ही ऐसे सांप्रदायिक दाग धुलेंगे। इस पर भ्रष्टाचार और लोलुपता के दाग के साथ संघ के लिए बचना बहुत मुश्किल हो जाएगा। यदि संघ टूटता है तो भाजपा भी टूट जाएगी। और यदि भाजपा टूटती है तो हमारे पास देश में भरोसेमंद विपक्ष नहीं रह जाएगा। यानी आधुनिक भारत का भविष्य संभवत: इसी बात पर टिका है कि संघ गडकरी मामले को कैसे संभालता है। यह संघ परिवार के लिए अग्निपरीक्षा की घड़ी है। उसके लिए गडकरी के खिलाफ कार्रवाई करना बेहद मुश्किल हो सकता है। भले ही गडकरी का संघ में काफी योगदान रहा हो और उन्होंने कई अच्छे काम भी किए हों, मगर हम यह न भूलें कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठन विश्वास पर ही फलते-फूलते हैं। इस संगठन के सदस्य मानते हैं कि इसके कुछ साझा सकारात्मक मूल्य व नैतिक आदर्श हैं। गडकरी का बचाव इन सबका उल्लंघन है। 
 
संघ परिवार के लिए यह याद रखना श्रेयस्कर होगा- ‘तमाम तरह के समझौतों के प्रति सजग रहें। अपने सिद्धांतों पर अडिग रहें और समर्थकों को पाने के लालच में दूसरों के ‘गलत कार्यो’ के लिहाज से इनमें हेरफेर न करें।’ यही विवेकानंद के विचार हैं। हम उम्मीद करें कि संघ परिवार न सिर्फ विवेकानंद जयंती मनाए, वरन उनकी शिक्षाओं को भी आत्मसात करे।
 
 
चेतन भगत
 
अंग्रेजी के प्रसिद्ध युवा उपन्यासकार     
 

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