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आर्थिक बदहाली से उबरने की प्रार्थना

केविन रैफर्टी | Dec 26, 2012, 00:20AM IST
 
 

इस वक्त दुनिया के आर्थिक हालात अच्छे नहीं हैं। अमेरिका के हठधर्मी राजनेता अपने देश को वित्तीय संकट में उलझाने पर आमादा हैं और वे यह नहीं सोचते कि इसका उनके अपने देश के अलावा पश्चिमी देशों की बीमार अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा।
 
एशिया की बात करें तो जापान की नई सरकार अपने देश को मंदी से उबारने के लिए बाजार में ज्यादा धन लाना चाहती है, जबकि उसके सरकारी कर्जे पहले ही बहुत ज्यादा हैं। चीन की नई सरकार ने लगता है साढ़े सात फीसदी सालाना विकास दर से गठजोड़ कर लिया है, जबकि उसके लिए अर्थव्यवस्था को खपत और आम आदमी की दिशा में पुन: संतुलित करना कहीं ज्यादा समझदारीपूर्ण होगा। 
 
ऐसे में सर जॉन टेंप्लेटन द्वारा पेश निवेश में सफलता के 16 सुनहरे नियमों में से 12वां नियम यहां मौजूं लगता है- ‘प्रार्थना से शुरुआत करें।’ टेंप्लेटन ने इस वजह से यह नियम नहीं दिया कि ईश्वरीय सत्ता आकर कोई चमत्कार दिखाए। टेंप्लेटन स्पष्ट करते हैं- ‘यदि आप प्रार्थना से शुरुआत करते हैं तो ज्यादा स्पष्ट ढंग से सोच सकते हैं और आपसे कम गलतियां होंगी।’
 
नव-वर्ष के आसपास छुट्टियों के इस माहौल में हर जगह राजनेताओं, अर्थशास्त्रियों और निवेशकों के लिए भी यही उचित होगा कि वे पहले प्रार्थना करें और फिर ठंडे दिमाग से यह सोचें कि सामने मौजूद तमाम चुनौतियों से कैसे निपटा जाए।
 
त्वरित संचार के इस दौर ने नीतियों की समुचित प्लानिंग की बात तो छोड़िए, हमारी स्पष्ट सोच के लिए भी समय को बहुत सीमित कर दिया है। राजनेता कुछ महीने बाद होने वाले चुनावों से आगे सोच ही नहीं पाते। कॉपरेरेट सीईओ अगली तिमाही के नतीजों या इस तरह की बातों पर ज्यादा ध्यान देते हैं कि किसी नई खोज या ताजे स्कैंडल के प्रति कल बाजार की प्रतिक्रिया क्या होगी। शेयर बाजार में अरबों का खेल खेलने वाले ‘निवेशक’ और उनके कंप्यूटर प्रोग्राम्स इसी में उलझे रहते हैं कि अगले माइक्रोसेकंड में क्या होगा क्योंकि मिलीसेकंड में तो बहुत देर हो सकती है।
 
टेंप्लेटन मानते हैं कि सफल निवेश एक दिन या एक हफ्ते या एक साल में नहीं किया जा सकता। उनके पहले दो नियम इसे स्पष्ट करते हैं। उनका पहला नियम है- ‘अधिकतम कुल वास्तविक रिटर्न के लिए निवेश करें।‘ यानी निवेश की रकम पर कर काटने और मुद्रास्फीति जैसे प्रभावों को नजरअंदाज करने के बाद मिला रिटर्न। दूसरा नियम, ‘निवेश करें- व्यापार या सट्टेबाजी नहीं।’ शेयर बाजार कोई कैसिनो नहीं है, लेकिन यदि आप शेयरों को अंदर-बाहर करते रहते हैं, या सिर्फ विकल्पों में सौदेबाजी करते हैं..या वायदा कारोबार को तवज्जो देते हैं.. तो बाजार आपका कैसिनो बन जाएगा। और ज्यादातर सटोरियों की तरह आप भी आखिरकार या बार-बार हार सकते हैं।’
 
निवेशक जीतें या हारें, तकदीर चमकाएं या बर्बाद हो जाएं, यह उनके व उनके परिवार के लिए मायने रखता है। लेकिन राजनेता देश को आर्थिक बर्बादी या जंग की ओर ले जा सकते हैं। दुखद रूप से अमेरिका में फिलहाल यही स्थिति है, जहां राजनेताओं के अड़ियल रवैये के चलते आर्थिक गतिरोध को बढ़ावा मिल रहा है। आखिर कुछ ही राजनेता समस्याओं पर उनके समाधानों के माध्यम से सोचते हैं।
 
ब्लॉगर व निवेशक बैरी रिथोल्ट्ज ने वॉशिंगटन पोस्ट में लिखे अपने कॉलम में इस ओर ध्यान आकृष्ट किया है, ‘आखिर क्यों खराब आइडिया कभी नहीं मरते?’ वह कैंब्रिज अर्थशास्त्री जोअन रॉबिंसन का हवाला देते हैं, जिन्होंने कहा था, ‘अर्थशास्त्र का अध्ययन करने का उद्देश्य आर्थिक सवालों के रेडीमेड जवाब पाना नहीं, बल्कि यह सीखना है कि अर्थशास्त्रियों द्वारा छले जाने से कैसे बचा जाए।’
 
रिथोल्ट्स आर्थिक नीतियों को नुकसान पहुंचाने वाली त्रुटिपूर्ण सोच की ओर भी ध्यान खींचते हैं। उनके मुताबिक होमो इकोनॉमिक्स के उस सिद्धांत पर भरोसा करना खतरनाक है, जो कहता है कि इंसान  विवेकशील होते हैं और सतत रूप से वस्तुनिष्ठ, समझदारीपूर्ण निर्णय लेते हैं। इसी तरह यह दंभ भी खोखला है कि अर्थशास्त्र एक विज्ञान है, जो अर्थशास्त्रियों के मॉडल्स के मुताबिक प्रतिक्रिया देता है। यह शुद्धतावादी विचार भी काफी भ्रामक है कि संतुलित बजट बनाने के लिए करों में बढ़ोतरी और खर्चो में कटौती के रूप में लोगों को पापों का प्रायश्चित करना होगा। सप्लाई-साइड इकोनॉमिक्स और यह भरोसा कि करों में कटौती का उन्हें लाभ मिलेगा, तभी कारगर हो सकता है, जबकि कर की दरें काफी उच्च हों। लेकिन जब कर की दरें पहले ही कम हों, तो ऐसा करने से परेशानी ही बढ़ेगी। 
 
इसके अलावा दो और चीजें खतरनाक हैं। एक है प्रभावी बाजार की परिकल्पना। यह विचार कि बाजार ‘सूचनात्मक रूप से सक्षम’ हैं। दूसरा यह कि बाजार खुद को नियंत्रित कर सकते हैं और सरकार की दखलंदाजी महंगी और नुकसानदायक हो सकती है। 
 
ये खामियां अहम हैं, जबकि अमेरिका के अमीरतम क्.१ फीसदी लोग (और चीन व भारत के बेहद अमीर लोग) आर्थिक विकास के तमाम फायदों को हड़पते हुए गरीबों को अभावों में रहने के लिए मजबूर कर रहे हैं। इस वैश्वीकृत दुनिया में राजनेताओं के लिए संकीर्ण राष्ट्रवाद एक और खतरनाक सिद्धांत है, जिसे राजनेता इसलिए अपनाते हैं ताकि जनमत सर्वेक्षणों में वे लगातार शीर्ष पर बने रहें, वरना उनके अपने कैंप के गिद्ध उन्हें नोच खाएंगे। जाहिर तौर पर देशों को अपने हितों का संरक्षण करना चाहिए, लेकिन उन्हें ऐसी नीतियां भी नहीं अपनानी चाहिए, जिनसे पड़ोसियों का अहित होता हो। 
 
आगामी नव-वर्ष में हमें ऐसे तरोताजा वैश्विक संस्थानों की सख्त दरकार है, जो इस अनिश्चित दौर से उबरने के लिहाज से बेहतर आर्थिक सुझाव दे सकें। जी-7/जी-8 की मियाद खत्म हो चुकी है। जी-20 और ‘ब्रिक्स’ बोझिल हो गए हैं और विपरीत दिशाओं में जा रहे हैं। आईएमएफ और विश्व बैंक महाशक्तियों के हाथों के खिलौने हैं। संयुक्त राष्ट्र पहले से कहीं ज्यादा विलापी और असंगठित है। ऐसे में हम 2013 के लिए प्रार्थना ही कर सकते हैं। 
 
केविन रैफर्टी
 
विश्वबैंक के पूर्व मैनेजिंग एडिटर व प्लेनवर्डस मीडिया के एडिटर इन चीफ      
 

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