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किसी छलिए की तरह सामने आता है सावन

डॉ. महेश परिमल | Jul 04, 2012, 01:10AM IST
 
 

‘झूला झूल कदंब के फूल’, इस पंक्ति को हम सबने कभी न कभी, कहीं न कहीं निश्चित ही गुनगुनाया होगा। जिन्हें भूलने की आदत है, उन्हें यह बताना मुश्किल है कि उन्होंने उक्त पंक्तियां कब और कहां गुनगुनाई थीं। पर जिनके भीतर अभी भी कोई बच्च मचलता है, उन्हें शायद यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि मां की गोद के बाद उन्होंने झूले का आनंद कब और कहां लिया था।




बचपन की यादें तो कच्ची मिट्टी के घरौंदों-सी होती हैं। उनमें रेत के टीलों की उड़ती धूल होती है, सावन के झूलों की अल्हड़ पेंगें होती है, रिमझिम फुहारों में भीगता मासूम तन और मन होता है। वहां झील या नदी के गहरे पानी में नहीं, नालों या पोखरों के पानी में कागज की कश्ती तैरती है और साथ ही तैर जाती है हवाओं में कचनार की कच्ची कली-सी खिलखिलाहट, जो एक याद बनकर हर मोड़ पर साथ निभाती है।




मां के हाथों में झूलने वाले बहुत-से लोग होंगे, पर उसके बाद यदि और किसी झूले ने मन मोहा है, तो वह है सावन में पेड़ों पर बांधा जाने वाला झूला। वह झूला भले ही पुराने टायरों से बना हो, पर उस पर झूलने का जो आनंद हमें प्राप्त हुआ है, वह आज न तो किसी आधुनिक मेले में आता है और न ही घर में बने झूले पर। उस झूले की बात ही कुछ और थी। अब तो न वैसा सावन है और न ही वैसे झूले। जिस तरह झूले के रूप बदले हैं, उसी तरह हमारे सामने सावन न जाने कितने रूप बदल रहा है।





यूं तो सावन के कितने ही रूप हैं, पर वह छलिए की तरह हमारे सामने होता है कि हम उसे पहचान ही नहीं पाते। कॉलेज जाने वाली बिटिया जब सजने-संवरने पर अधिक ध्‍यान देती है, तब हमें लगता है कि उसका सावन आ गया। बेटा जब नई बाइक की मांग करने लगे, समझो उसे अपने सावन की तलाश है। किसान खाद-बीज की किल्लत से जूझने लगे, साहूकार अपने गोदामों की मरम्‍मत कराने लगे, झोपड़ियों पर नई पन्‍नी लगने लगे, प्‍लास्टिक की चप्‍पलें और छाते ठीक कराने की जरूरत महसूस होने लगे और गांव-शहर में जब नए-नए खूबसूरत चेहरे दिखने लगें, तो समझो सावन आ गया।




इसी माह भक्ति की रसधारा भी सबसे अधिक बहती है। चाहे वे सावन सोमवार हों या फिर रक्षाबंधन, जन्माष्टमी, कजली तीज आदि व्रत-त्योहारों का यही मौसम है। उम्र के साथ-साथ सावन के रूप में भी परिवर्तन आता रहता है। छोटी उम्र का सावन तो बिल्कुल निश्छल होता है, किंतु जैसे-जैसे मानव अपने कद से और बड़ा और स्वार्थी होता है, वैसे-वैसे उस मासूम सावन का रूप बदलता रहता है। अब तो वह बड़ी-बड़ी बातें सोचता है। किस तरह से किसके कांधे पर पांव रखकर आगे बढ़ा जा सकता है।



व्यापारी यह अच्छे से जानता है कि अधिक बारिश के बाद भी अपने अनाज को गोदामों में किस तरह से सुरक्षित रखा जाए, ताकि भविष्य में उसे और महंगे दामों में बेचा जा सके। अब भले ही व्यापारी और साहूकार के रूप बदल गए हों, पर उनकी शोषक प्रवृत्ति में कोई बदलाव नहीं आया है। विद्यार्थियों के लिए तो सावन नई किताब-कापियों और नए-नए मित्रों के रूप में होता है। इन्हें तो रोज भीगने से मतलब है, भले ही सर्दी हो जाए। पूरा सावन एक-दूसरे को परखने में ही निकल जाता है।



हरियाला सावन, मासूम सावन, मदमाता सावन, इठलाता सावन, इतराता सावन, क्रूर सावन, शातिर सावन, पाजी सावन। इन सारे सावनों के बीच कहां है असली सावन, जो उल्लास का दूसरा नाम है, जो मस्ती का पर्याय है, जिसमें उमंग है, उत्साह है, स्फूर्ति है, आनंद है, ऐसा सावन आपको कहीं दिख जाए, तो क्या आप मुझे बताएंगे?
 
 
 

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