विज्ञापन
 
 
 
 

पड़ोसियों से भी ज्यादा करीब

 
Source: रामचंद्र गुहा   |   Last Updated 00:08(29/09/11)
 
 
 
 
जब मुझे काबुल यात्रा का न्योता मिला तो स्वाभाविक रूप से मेरे परिजन बहुत उत्साहित नहीं थे। लेकिन मैं दो कारणों से काबुल जाना चाहता था। पहला यह कि मेरे मेजबान एक विलक्षण और साहसी राजनयिक थे और मैं उन्हें निराश नहीं करना चाहता था और दूसरा यह कि मुझे अभिनेता नसीरुद्दीन शाह का एक एसएमएस मिला था, जिसमें उन्होंने अफगानिस्तान को ‘खूबसूरत लोगों का खूबसूरत मुल्क’ बताया था।

मैं काबुल के लिए उड़ान भरता, उससे दो दिन पहले ही कुछ आतंकवादी काबुल की एक निर्माणाधीन इमारत में घुस गए और बमों और रॉकेटों की बौछार शुरू कर दी। मेरे शुभचिंतकों ने मुझे फोन और मेल करते हुए वहां नहीं जाने की हिदायत दी। लेकिन काबुल में मौजूद मेरे मेजबान ने मुझे आश्वस्त करते हुए कहा कि इस तरह की घटनाएं यहां होती रहती हैं और ताजा हादसे के बाद अफगानिस्तान को पहले की तुलना में कम सुरक्षित मानना मुनासिब नहीं होगा।

मैं अफगानिस्तान गया और इस यात्रा का प्रतिफल मुझे इस ‘खूबसूरत देश के खूबसूरत लोगों’ के साथ कुछ अविस्मरणीय मुलाकातों के रूप में मिला। अफगानिस्तान में युद्ध के जख्म हर जगह मौजूद थे, लेकिन वहां के पहाड़ों का वैभव अद्भुत था। दरख्तों से लदे पहाड़ों वाले हिमालय के साथ बिताए गए मेरे बचपन के दिनों और नीलगिरी के पहाड़ों के साथ बिताए गए मेरी युवावस्था के दिनों की स्मृतियों से अफगानिस्तान के ये पहाड़ पूरी तरह भिन्न थे। और इतने ही प्रभावी थे वहां के लोग, जो लगभग हमेशा अपने परंपरागत पहनावों में नजर आते थे।

कुछ महिलाएं बुर्को में थीं, लेकिन कई अन्य ऐसी भी थीं, खास तौर पर युवा महिलाएं, जिन्होंने ट्राउजर और टॉप पहन रखे थे और अपनी परंपरा की इकलौती निशानी के तौर पर सिर पर रंगीन स्कार्फ बांध रखा था। एक शाम को मैं काबुल यूनिवर्सिटी के कैम्पस में था और वहां आपस में बतियातीं और चुहल करती लड़कियों के झुंड देखकर मैं अचंभित रह गया। तालिबान के दिनों में यह दृश्य दुर्लभ था और यदि वे फिर काबुल पर राज करने चले आते हैं तो यह दृश्य फिर दुर्लभ हो जाएगा।

अफगानिस्तान में जिस एक व्यक्ति ने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया, वे थे अल्ताफ हुसैन साराहंग नामक गायक। उनके दिवंगत पिता मोहम्मद हुसैन साराहंग एक बेहतरीन खयाल गायक थे और उनकी बेजोड़ गायकी की झलक अब भी यूटच्यूब पर देखी-सुनी जा सकती है। वे बंबई और कलकत्ता आते-जाते रहते थे और उनके प्रशंसकों में पटियाला घराने के उस्ताद बड़े गुलाम अली खां और लता मंगेशकर जैसे कलाकार भी शामिल थे। मोहम्मद हुसैन बेइंतहा खूबसूरत शख्स थे। मैंने उन्हें तो कभी रूबरू नहीं देखा, लेकिन उनके बेटे की अद्भुत सांगीतिक प्रतिभा में मुझे उनका अंश जरूर नजर आया।

काबुल में मैं जिस ‘महफिल’ में शामिल हुआ था, उसमें अल्ताफ ने राग यमन में निबद्ध एक खूबसूरत खयाल गाया था और फिर उन्होंने कुछ ठुमरियां, गजलें और लोकगीत भी सुनाए। इन सभी गायन शैलियों पर उनकी जबर्दस्त पकड़ थी। भाषाओं पर भी उनका इतना अद्भुत अधिकार था कि एक ही शाम में उन्होंने ब्रज, संस्कृत, पश्तो, दारी, उर्दू और हिंदी की रचनाएं गाईं।

हिंदी में जो गाना उन्होंने गाया, वह था हेमंत कुमार का वही सदाबहार सिने गीत : ना तुम हमें जानो। अपने पिता की तुलना में अल्ताफ पारंपरिक रूप से खूबसूरत नहीं हैं, लेकिन उनकी शख्सियत अनूठी है। वे रंग-बिरंगी टोपियां पहनते हैं, बाएं हाथ से हार्मोनियम बजाते हैं, हाथ में व्हिस्की का जाम थामकर राजनयिकों से बतियाते हैं और अपनी वाकपटुता से उन्हें लाजवाब भी कर देते हैं। अल्ताफ हुसैन साहरंग को हिंदुस्तान और हिंदुस्तानियों से प्यार है और इसकी वजह केवल यही नहीं है कि उनके पिता का इस मुल्क से गहरा ताल्लुक रहा था।

मेरी भेंट अनेक अफगानों से हुई और मैंने पाया कि उनके मन में इस मुल्क के प्रति लगाव और सम्मोहन है, जो सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रूप से तो उनसे जुड़ा है, लेकिन जिसकी सरहदें उनके मुल्क की सरहदों से नहीं जुड़तीं। यकीनन अफगान भारतीय फिल्मों को पसंद करते हैं, लेकिन वे भारतीय डॉक्टरों और नर्सो की सेवाभावना को भी सराहते हैं। साथ ही वे उन भारतीय कॉलेजों की सराहना करते हैं, जहां अपने बच्चों को पढ़ने भेजना चाहेंगे।

नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका को भारत एक आधिपत्यवादी देश लग सकता है और कुछ अर्थो में यह सच भी है, लेकिन अफगानिस्तान का बिग ब्रदर है पाकिस्तान, जिसके प्रति अफगानों के मन में मिली-जुली भावनाएं हैं। अफगानिस्तान पाकिस्तान से सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रूप से तो संबद्ध है ही, उनकी जातीयता और धार्मिक आस्थाएं भी लगभग समान हैं। लेकिन पाकिस्तान की हुकूमत और फौज के प्रश्रय पर ही अफगानिस्तान में आतंकवादी फल-फूल रहे हैं।

मैंने काबुल में बैठकों में भाग लिया, महफिलों में संगीत सुना और दो पर्यटन स्थलों की सैर भी की। पहली जगह थी बाग-ए-बाबर, जहां मुगल बादशाह की मजार है। दूसरी जगह थी पागमान। यह एक हरा-भरा पहाड़ी कस्बा है, जो कभी अफगान शाहों की ग्रीष्मकालीन राजधानी हुआ करता था और बाद में मुजाहिदीन का गढ़ बना।

मैंने अफगानिस्तान के गांवों में बच्चों को क्रिकेट खेलते और जुम्मे के दिन छुट्टी के मौके पर लोगों को पिकनिक मनाते देखा। पागमान में मैंने शाह अमानुल्ला द्वारा १९२क् के दशक में बनवाया गया मेमोरियल देखा। मेरे इर्द-गिर्द मौजूद बच्चे व युवा बेहद खूबसूरत और मैत्रीपूर्ण थे। उनकी उत्फुल्लता एक अद्भुत गरिमा का परिचय दे रही थी, लेकिन वह इस तथ्य को छुपा भी रही थी कि उनका मुल्क तीन दशकों से गृहयुद्ध की आग में झुलस रहा है। मेरे द्वारा काबुल छोड़ने के महज दो दिन बाद शांति प्रक्रियाओं के लिए अग्रणी भूमिका निभाने वाले पूर्व राष्ट्रपति बुरहानुद्दीन रब्बानी की एक सुसाइड बॉम्बर द्वारा हत्या कर दी गइर्।

जब मैंने यह खबर सुनी तो मुझे पागमान के बच्चों और बाग-ए-बाबर के बागवान और खयाल गायक अल्ताफ हुसैन का ख्याल आया। निश्चित ही इतने ‘खूबसूरत लोगों का यह खूबसूरत मुल्क’ एक बेहतर भविष्य का हकदार है और अधिक मैत्रीपूर्ण पड़ोसियों का भी।
- लेखक जाने-माने इतिहासकार हैं।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
आपके विचार

 
 
कोड :
6 + 6

 
 
विज्ञापन
 

बड़ी खबरें

 
 
 
 
 
 
 
 
 

रोचक खबरें

 
 
 
 
 
 
 
 
 

बॉलीवुड

 
 
 
 
 
 
 
 
 

जीवन मंत्र

 
 
 
 
 
 
 
 
 

क्रिकेट

 
 
 
 
 
 
 
 
 

बिज़नेस

 
 
 
 
 
 
 
 
 

जोक्स

 
 
 
 
 
 
 
 
 

पसंदीदा खबरें

 
 
 
 
 
 
 
 
 

फोटोगैलरी

Most Viewed

Controversies that rocked B-town
Amazing Body Paintings
Just Added

करियर कॉलेज में फेयरवेल पार्टी के दौरान स्टूडेंट्स ने बिखेरे रंग
Bollywood Stars at Cannes
 
 
 
विज्ञापन
 
 
| Email  Print Comment
| Email  Print Comment
(1)
Latest | Popular