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कोयले की दलाली में मुंह काला

वेदप्रताप वैदिक | Aug 28, 2012, 05:53AM IST
 
 

कोयले की दलाली ने भारत की राजनीति का मुंह काला कर दिया है। इसके पहले जितने धांधले हुए, वे सब मिलकर भी इसके बराबर नहीं हुए। यदि सरकारी और गैर-सरकारी सभी कंपनियों को बांटी गई कोयला खदानों का हिसाब लगाया जाए तो यह लगभग 10 लाख करोड़ का घोटाला है। इस अकेले घोटाले ने आदर्श सोसायटी, राष्ट्रमंडल खेल, 2जी स्पेक्ट्रम इत्यादि घोटालों को पीछे छोड़ दिया है। इतना ही नहीं, यह अकेला घोटाला है, जिसके लिए सीधे प्रधानमंत्री जवाबदेह हैं।





प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की व्यक्तिगत ईमानदारी आज भी संदेह के परे है, लेकिन इस घोटाले ने उनकी शासनगत या पार्टीगत ईमानदारी पर बड़ा प्रश्नचिह्न् लगा दिया है। 142 में से जिन खदानों को नीलाम किए बिना गैर-सरकारी कंपनियों को बांट दिया गया है, उनके बारे में नियंत्रक व महालेखा परीक्षक की रपट है कि सरकारी खजाने को एक लाख 86 हजार करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है। यह बंदरबांट मुख्यत: तब हुई, जबकि कोयला मंत्रालय का प्रभार खुद प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के पास था।




अब भाजपा एक तो प्रधानमंत्री से इस्तीफा मांगने पर डट गई है और दूसरा वह संसद की कार्यवाही नहीं चलने दे रही है। भाजपा को पता है कि उसके कहने से मनमोहन सिंह इस्तीफा देने से रहे। विपक्ष के मांगने पर अगर प्रधानमंत्री इस्तीफा देने लगें तो अपने पांच साल के कार्यकाल में हर प्रधानमंत्री को पांच-दस बार इस्तीफे देने पड़ जाएं। क्या आज तक किसी प्रधानमंत्री ने अपनी सरकार के किसी दुष्कर्म या लापरवाही के लिए इस्तीफा दिया है? यदि कोई व्यक्ति इतना नाजुक-मिजाज है तो वह प्रधानमंत्री ही क्यों बने? और जिन पर प्रधानमंत्री पद थोप दिया जाता है, उनकी चमड़ी तो वैसे भी मोटी हो जाती है।





उनसे इस्तीफे की आशा करना बालू में से तेल निकालने जैसा है। भाजपा के लिए यह कहीं बेहतर है कि प्रधानमंत्री इस्तीफा न दें। अगर वह इस्तीफा दे देते हैं तो उनकी छवि चमचमाने लगेगी। लोगों को सचमुच विश्वास हो जाएगा कि प्रधानमंत्री ईमानदार और आत्मसम्मानी हैं। अभी उनकी छवि यह बन रही है कि वह सरकार की सारी बेईमानियों के कवच बन गए हैं, जिन्हें इस बात की जरा भी चिंता नहीं है कि उन्हें आजाद भारत की सबसे भ्रष्ट सरकार का मुखिया माना जाएगा। यदि यही दशा अगले दो साल तक बनी रही तो अगले आम चुनाव में कांग्रेस को 100 का आंकड़ा पार करना भी मुश्किल हो जाएगा।





जहां तक संसद को ठप करने का सवाल है, तो भाजपा के मुंह खून लग चुका है। उसने दिसंबर 2010 में 2जी स्पेक्ट्रम पर संसद को ठप किया तो दूरसंचार मंत्री ए. राजा का इस्तीफा हो गया, संयुक्त संसदीय समिति बैठी, आरोपियों पर चार्जशीट लगी, 3जी स्पेक्ट्रम की नीलामी हुई और बचे हुए 2जी स्पेक्ट्रम की नीलामी से धन बरस रहा है, तो अब इन 57 चर्चित कोयला खदानों से वह सोना क्यों न उगलवाए? लेकिन भाजपा की इस ताजा रणनीति में कुछ कमियां भी हैं। जैसे अभी तक 2जी स्पेक्ट्रम की तरह कोयले की दलाली पर अदालत का स्पष्ट हस्तक्षेप नहीं हुआ है।




दूसरा, खदानों की नीलामी का विरोध भाजपा और लेफ्ट की प्रादेशिक सरकारों ने भी किया था। यानी उन्होंने केंद्र का समर्थन किया, हालांकि उनके उद्देश्य और तर्क दूसरे भी थे। लेकिन इतनी बारीकी में कौन जाता है? अभी तो यही माना जाएगा कि कोयले की दलाली में सभी पार्टियों का मुंह काला हुआ है। शायद इसीलिए संसद के बहिष्कार पर भाजपा अकेली पड़ गई है। तीसरा, सभी पार्टियां इस मुद्दे पर बहस मांगें और भाजपा सिर्फ बहिष्कार, तो इसका नतीजा क्या होगा? या तो भाजपा के सारे सदस्य संसद से इस्तीफा दे दें या भाजपा के बिना ही संसद चलती रहे। दोनों स्थितियां भाजपा के लिए क्या लाभप्रद हो सकती हैं? भाजपा को यह भी सोचना होगा कि यदि अगली सरकार उसकी ही बन गई और प्रतिपक्ष ने किसी मामले पर उसे इसी तरह घेरा तो लोकतांत्रिक संस्थाओं का हश्र क्या होगा?





बेहतर तो यह होगा कि कोयला घोटाले के मामले में प्रधानमंत्री के वक्तव्य पर जमकर बहस चले। प्रधानमंत्री यह बताएं कि उनकी ऐसी क्या मजबूरी थी कि उन्होंने खदानें मिट्टी के मोल बांट दीं। जिन लोगों को ये खदानें दी गई हैं, क्या वे इसके योग्य हैं? आरोप तो यह भी है कि ऐसे लोगों को खदानों के लाइसेंस पकड़ा दिए गए हैं, जिन्हें उत्खनन का कोई अनुभव नहीं है। जिनकी लॉटरी खुली, उनके साथ बाद में कुछ सहमालिक भी जुड़वाए गए, जो कि राजनीतिक लोग थे। यानी खदान बांटने में पार्टी के हितों को प्रधानता दी गई। कई अफसरों ने स्वीकारोक्ति की है कि उनकी जानकारी के बिना ऊपर ही ऊपर कुछ फैसले किए गए। इन फैसलों के लिए कौन जिम्मेदार है? आरोप है कि कोयला राज्यमंत्रियों ने कमेटी को बताए बिना ही दर्जनों लाइसेंस बांट दिए। यदि ये लाइसेंस यह सोचकर बांटे गए कि निजी कंपनियां जल्दी और अच्छा उत्खनन करेंगी तो मूल प्रश्न यह है कि आठ साल बीत रहे हैं और अभी तक सिर्फ एक खदान ही चालू क्यों हुई है?




क्या शेष सभी खदान मालिक इन खदानों को तब तक पड़ी रखना चाहते हैं, जब तक कि इनके भाव कई गुना न चढ़ जाएं? दूसरे शब्दों में भारत की खनिज संपदा का भी सट्टा होने लगेगा? वित्त मंत्री पी. चिदंबरम का यह कहना हास्यास्पद है कि ये खदानें अभी तक नहीं खुदीं, इसलिए इनका माल सुरक्षित है। वह सुरक्षित तो तब होगा, जब यह सारी बंदरबांट रद्द होगी। उसका इतने वर्षो जस का तस पड़े रहना क्या राष्ट्र की हानि नहीं है? इस बंदरबांट की अनुमानित हानि के लिए महालेखा परीक्षक की टांग खिंचाई भी अशोभनीय है। सभी सरकारी लूट को ‘शून्य हानि’ का मामला बताने का दुस्साहस कपिल सिब्बल और चिदंबरम जैसे लोग ही कर सकते हैं। देश में कुछ ही संस्थाएं स्वायत्त व संवैधानिक हैं। उनकी प्रतिष्ठा घटाने की बजाय सरकार को अपनी प्रामाणिकता सिद्ध करनी चाहिए। विपक्ष को भी संसद में बताना होगा कि उनकी प्रादेशिक सरकारें नीलामी का विरोध क्यों कर रही थीं। क्या उनके विरोध का लक्ष्य भी अपनों-अपनों को रेवड़ियां बांटना था? संसद में चली सांगोपांग बहस न सिर्फ जनता को जागरूक करेगी, बल्कि भावी सरकारों को भी दिशा दिखाएगी कि वे देश की प्राकृतिक संपदा के दोहन में लापरवाही


न बरतें। फिलहाल, सिर्फ कुछ कोयला खदानों के वितरण से सरकार को इतना पैसा मिल सकता था कि सालभर भी उसे किसी भी नागरिक से कर उगाहने की जरूरत नहीं रहती। यदि देश की संपूर्ण प्राकृतिक संपदा का दोहन उचित रूप से हो तो भारत को दुनिया के सबसे संपन्न राष्ट्रों की पंक्ति में बैठने से कोई रोक नहीं सकता।
 
 
 

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