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घोटाले से उठे सवाल

भास्कर न्यूज | Sep 08, 2012, 00:25AM IST
 
 

संसद का मानसून सत्र कोयला घोटाले की भेंट चढ़ गया है। प्रधानमंत्री के इस्तीफे तक संसद न चलने देने की रणनीति पर भारतीय जनता पार्टी अड़ी रही। नतीजतन, संसद में न तो दूसरे महत्वपूर्ण विधायी कार्य निपटाए जा सके और न ही कोयला खदान आवंटन से जुड़े सवालों पर चर्चा हुई। जबकि इस मसले पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट से कई खास मुद्दे उठे हैं, जिन पर बहस से सरकार की जवाबदेही एवं भविष्य की दिशा तय करने की आवश्यकता है।

अब जो तस्वीर सामने है, उससे साफ है कि कोयला खदानों के आवंटन में गड़बड़ी हुई। सीबीआई का इस मामले में केस दर्ज करने के बाद कई कंपनियों के ठिकानों पर छापे के संकेत हैं कि आवंटन प्रक्रिया में तथ्यों को छिपाया गया और प्रक्रिया को अनुचित ढंग से प्रभावित किया गया। अब चूंकि इस मामले में कानूनी कार्रवाई शुरू हो गई है, तो उम्मीद की जानी चाहिए कि यह तार्किक परिणति तक पहुंचेगी। बहरहाल, यह हकीकत सामने आने के बावजूद यह प्रश्न अनुत्तरित है कि कोयला या अन्य प्राकृतिक संसाधनों का आवंटन हर हाल में खुली नीलामी से ही होना चाहिए या सरकारों को अर्थव्यवस्था की जरूरतों एवं अपनी नीति के मुताबिक पारदर्शी प्रक्रिया से आवंटन का हक होना चाहिए? एक पक्ष की दलील है कि नीलामी का मतलब प्राकृतिक संसाधनों पर थैलीशाहों के नियंत्रण का रास्ता खोल देना है।

उस हाल में सरकारों के पास न तो प्राथमिकता तय करने का हक होगा और न ही अर्थव्यवस्था को दिशा देने के अपने फर्ज को वे निभा पाएंगी। फिर यह सवाल भी उठा है कि क्या एक विकासशील अर्थव्यवस्था में आर्थिक नीतियां तय करते वक्त राजकोष को भरना ही एकमात्र उद्देश्य हो सकता है? इस संदर्भ में एक मांग यह उठी है कि कोयला खदानों का पूर्ण निजीकरण कर दिया जाए। लेकिन प्रश्न यह भी है कि राष्ट्रीय संसाधनों पर सार्वजनिक स्वामित्व होना चाहिए या कुछ निजी घरानों का? ये तमाम ऐसे सवाल हैं, जो गंभीर एवं विस्तृत बहस की मांग करते हैं। अगर संसद चल पाती, तो इन पर कुछ रोशनी जरूर पड़ती।
 
 
 

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