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'आम आदमी' बनाम 'खास आदमी'

राजदीप सरदेसाई | Oct 19, 2012, 00:06AM IST
 
 


कुछ  साल पहले दिल्ली में हुई एक सेमिनार में सादा लिबास में एक छरहरी, मृदुभाषी महिला भी पेनल में शामिल थी। डिबेट खत्म होने के बाद वह चुपचाप अपनी मारुति कार को ड्राइव करते हुए वहां से निकल गई। उस महिला के सहयोगियों के अलावा वहां मौजूद कुछ ही लोगों को पता था कि वे दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास की प्रोफेसर और प्रधानमंत्री की बेटी उपिंदर सिंह के साथ थे।


 


हालिया दौर में प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह पर कई तरह के आरोप लगे। लेकिन कोई भी उन पर यह आरोप नहीं लगा सकता कि उन्होंने कभी भी अपने परिवार के फायदे के लिए अपने पद का इस्तेमाल किया हो। देश में पिछले कुछ समय से जो कुछ होता आ रहा है, उस संदर्भ में यह उल्लेखनीय उपलब्धि है। यह इस बात का सबूत है कि देश के प्रधानमंत्री जैसे शीर्ष पद पर रहते हुए भी आप राजधानी की वीवीआईपी संस्कृति से अछूते रह सकते हैं।


डॉ. सिंह खुशकिस्मत हैं कि उनका परिवार मुख्यत: शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय है, लिहाजा उसके पावर सर्किल के आकर्षण से प्रभावित होने की ज्यादा संभावना नहीं है। जबकि रॉबर्ट वाड्रा कारोबारी हैं और इस लिहाज से उन पर मौद्रिक लाभ के लिए अपनी पोजीशन का दुरुपयोग करने के आरोपों के लिए हमेशा गुंजाइश बनी रही है। कारोबारी से नेता बने जगन मोहन रेड्डी (आंध्र के पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय वाईएसआर रेड्डी के सुपुत्र) के साथ भी ऐसा ही है। वाड्रा व रेड्डी को कारोबारी होने का पूरा हक है, लेकिन उन्हें यह भी बताना होगा कि उनके परिवार के सत्ता में रहने के दौरान उनकी संपत्तियां कई गुना कैसे बढ़ गईं।


हालांकि यह सिर्फ मिस्टर वाड्रा या जगन मोहन रेड्डी की बात नहीं है। यह 'आम आदमी' (हां, मैंगो पीपुल!) के व्यापक लोकप्रिय आक्रोश की बात है, उस 'खास आदमी' 'लाल बत्ती' संस्कृति के खिलाफ जहां पर कुछ खास लोगों को विशेष तरह के फायदे व रियायतें मिलती हैं और आम नागरिकों को ये उपलब्ध नहीं होतीं।


एक आम आदमी को मामूली निवेश करने पर भी आयकर जांच का सामना करना पड़ेगा, जबकि खास आदमी को ऐसी दिक्कत नहीं होगी। अपने लिए एक घर खरीदने वाले आम आदमी को इस संदर्भ में स्वच्छ लेन-देन करना काफी मुश्किल होता है, जबकि खास आदमी इस तरह की ऊंची कीमत वाली सौदेबाजी में आसानी से बचकर निकल सकता है।


एक आम आदमी को हर जगह लाइन में लगना पड़ता है, जबकि खास आदमी आसानी से लाइन तोड़ सकता है। और  हां, आम आदमी की एयरपोर्ट पर जामा-तलाशी ली जाती है, जबकि खास आदमी को ऐसी किसी असुविधा का सामना नहीं करना पड़ता।


अरविंद केजरीवाल जैसे लोगों ने इस असमान व्यवस्था के खिलाफ लोगों के बढ़ते गुस्से का समझदारीपूर्वक इस्तेमाल करते हुए कुछ ऐसे खास 'लक्ष्य' खोजे, जिन्हें विशेषाधिकार प्राप्त रसूखदारों के प्रतीक के तौर पर देखा जाता है। भले ही सबूत पुख्ता न हों, आपराधिकता भी साबित न कर पाएं, मगर ऐसे माहौल में जहां यह आम 'धारणा' हो कि नेताओं और रसूखदार लोगों के सगे-संबंधियों को स्पेशल ट्रीटमेंट दिया जाता है, यह भ्रष्टाचार विरोधी अभियान आम आदमी की खास आदमी के 'बराबर' पाने की चाह का पर्याय बन गया।


आपको अमीरों व रसूखदारों के सौदों में फायदे के बदले फायदा मिलने की बात स्थापित करने की जरूरत नहीं है। यह व्यापक 'धारणा' कि इस तरह के सुविधाजनक नेटवर्क मौजूद हैं, लोगों को समझाने के लिए काफी है कि अनुचित लाभ लिए गए।



काफी हद तक ये धारणाएं देशभर में 'राजनीतिक उद्यमियों' के जबर्दस्त विकास की उभरती हकीकत को प्रतिबिंबित करती हैं। ये ऐसे लोग हैं, जिन्होंने अपना कारोबारी साम्राज्य मुख्यत: राजनीतिक सत्ता तक पहुंच के जरिए कायम किया। कुछ निर्धारित इंडस्ट्रीज जो ज्यादा नियंत्रित नहीं हैं और सरकार की विवेकाधीन शक्तियों पर अत्यधिक निर्भर रहती आई हैं, उनमें इस तरह के राजनीतिक उद्यमियों के दखल की संभावना ज्यादा होती है।


माइनिंग, रीयल एस्टेट और निजी शिक्षा कुछ ऐसे ही क्षेत्र हैं, जहां राजनीतिक हितों को कारोबारी हितों के साथ जोड़ते हुए बड़े पैमाने पर लाभ कमाया जाता है।



मसलन क्या यह कोई आश्चर्य की बात है कि मुंबई और पुणे के महंगे रीयल एस्टेट बेल्ट के आधे से ज्यादा विधायक कंस्ट्रक्शन लॉबी से जुड़े हैं? या आंध्र प्रदेश में रियल्टी कंपनियों का राज्य विधानसभा में तगड़ा प्रतिनिधित्व है? या कर्नाटक की माइनिंग लॉबी यह तय कर सकती है कि राज्य का अगला मुख्यमंत्री कौन होगा? या हरियाणा का हरेक मुख्यमंत्री राज्य की दिल्ली से निकटता का इस्तेमाल भू-अधिग्रहण के जरिए अनाप-शनाप लाभ कमाने में करता है?
महाराष्ट्र का बहुत कुछ दांव पर लगा है, जिसने संभवत: इसकी राह दिखाई। मुंबई में मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि यह कैसे काम करता है।


30 साल पहले तक शहरी विकास मंत्रालय से जुड़े मंत्री जमीन के इस्तेमाल संबंधी नियम बदलने और आवासीय परियोजनाओं को मंजूरी देने के बदले एक-दो बेनामी फ्लैट्स ले लेते थे। एक समय के बाद इन सौदों ने 'औपचारिक' रूप ले लिया और मंत्रियों को फ्लैट्स के साथ लाभ में निर्धारित हिस्सा भी मिलने लगा। अब कुछ मंत्रियों और उनके परिजनों ने निवेश कंपनियां स्थापित कर ली हैं, जो सीधे ऐसी परियोजनाओं को हासिल करते हुए खुद ही सारा मुनाफा ले लेते हैं। अब 'बेनामी' सौदे नहीं होते, वरन पारिवारिक फर्म के नाम पर सीधे किए जाते हैं।



लंबे समय तक इन सबके बारे में सिर्फ सत्ता के गलियारों में फुसफुसाहट होती थी। अब चौबीसों घंटे चलने वाले मीडिया, आरटीआई एक्टिविज्म और जनहित याचिकाओं के इस दौर में सुशुप्त ज्वालामुखी का लावा बाहर निकलने लगा है। अब आम आदमी बदला लेने पर उतारू है और वीवीआईपी लोगों को नोटिस थमा रहा है। संदेश साफ है- या तो प्रोफेसर उपिंदर सिंह की तरह हम जैसे 'एक' बनकर रहें या फिर हंगामाखेज, सशक्त सिविल सोसायटी के गुस्से को झेलने के लिए तैयार हो जाएं।



राजदीप सरदेसाई


आईबीएन 18 नेटवर्क के एडिटर-इन-चीफ   

 
 
 

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