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भ्रष्टाचार और भारत की उम्मीद
प्रीतीश नंदी | Aug 18, 2012, 00:08AM IST

आप ज्यादा आडंबरपूर्ण या दिखावे के कामों को उन युवाओं के लिए छोड़ सकते हैं, जो अपनी युवा तरंग को साबित करने के लिए कुछ अलग करना चाहते हैं। आप उन असल कामों या चीजों पर फोकस करते हैं, जो आपके साथ-साथ आस-पास के लोगों की जिंदगी में भी बदलाव ला सकते हैं। ऐसा करने में ही अक्लमंदी है। बाकी सब गौण हैं। बच्चे अक्सर गौण या तुच्छ कामों में उलझ जाते हैं। लेकिन ऐसे लोग या राष्ट्र, जिनकी उम्र ६५ साल से ऊपर हो चुकी हो, उन्हें बहुत सोच-विचार के साथ इस तरह के काम करने चाहिए, जिससे आने वाली पीढ़यां उन्हें याद रख सकें।
हाल ही में हमने अपना 66 वां स्वाधीनता दिवस मनाया। तमाम भारतीयों की तरह मुझे भी अपने स्वाधीनता दिवस या गणतंत्र दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्वो पर बहुत मान है। हालांकि जब भी इस तरह का कोई पर्व आता है, तो मैं अक्सर सोचने लगता हूं कि आखिर हम इनका जश्न क्यों मनाते हैं। हर बार मेरे लिए इसका कारण तलाशना और भी ज्यादा मुश्किल होता जाता है। हालांकि ऐसा इस वजह से नहीं होता कि भारत को लेकर हमारी कल्पना में कोई गलती है। लेकिन हमारे समक्ष इसकी तमाम मामलों में जैसी गलत छवि सामने आती है, उससे जरूर ऐसा लगता है।
भारत का हमारा विचार पिछले पैंसठ सालों से तमाम गलत लोगों द्वारा गढ़ा जा रहा है। जो लोग वास्तव में बदलाव ला सकते हैं, उन्हें हमेशा से ही राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया से अलग रखा जाता है। वे हाशिए पर झूलते रहते हैं, इस इंतजार में कि उन्हें भी कभी राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में हाथ बंटाने का मौका मिलेगा। लेकिन ऐसा कभी नहीं होता। इस काम को एक छोटे-से वर्ग के लोगों द्वारा हथिया लिया गया है, जिन्होंने यह सुनिश्चित किया है कि चाहे कुछ भी हो जाए, लेकिन वे सत्ता में बने रहें। और यहीं से लूट होती है।
आपने देखा होगा कि राजनीतिक पार्टियां सत्ता में आती हैं और चली भी जाती हैं, लेकिन सत्ता के दलालों का एक जैसा समूह (जिसकी धन को लेकर अजगरी भूख कभी खत्म नहीं होती) पिछले पैंसठ सालों से देश पर शासन कर रहा है। हम अक्सर यह शिकायत करते हैं कि संसद समेत राज्य विधानसभाओं और स्थानीय निकायों में ज्यादातर आपराधिक पृष्ठभूमि के लोग हैं। लेकिन जब भी कोई चुनाव होता है, तो अपराधी और बड़ी संख्या में लौटकर आ जाते हैं। हम सालों से यह शिकायत करते चले आ रहे हैं कि भ्रष्टाचार हमारे देश को दीमक की तरह खोखला कर रहा है। लेकिन हर साल घोटाले बढ़ जाते हैं और इसके साथ-साथ लूटी गई धनराशि भी बढ़ती जाती है। जब इनकी लूट पकड़ में आती है, तो ये कुछ समय के लिए सुस्त पड़ जाते हैं।
इसके बाद आपके कुछ समझने से पहले ही ये वापस अपनी जगह पर पहुंच जाते हैं, अपनी पुरानी अकड़ के साथ। पिछले कुछ सालों में हुए घोटालों की एक सूची बनाएं। इसके बाद घोटालेबाजों पर नजर दौड़ाएं। आप देखेंगे कि वे वापस पैसा बनाने वालों के उसी गिरोह में शामिल हैं, जहां हमेशा से थे। देश में कई राजनेताओं, नौकरशाहों, कारोबारियों और यहां तक कि पुलिस अधिकारियों को भी अनेक गंभीर अपराधों के लिए गिरफ्तार किया गया है, लेकिन कुछ समय बाद वे बाहर आ जाते हैं, क्योंकि वही तो हैं, जो हमारी व्यवस्था को चलाते हैं। वे जानते हैं कि व्यवस्था को कैसे काबू में करना है।
भारत के बाकी लोग (जो असली भारत हैं) जो इस राष्ट्र को कारगर बनाते हैं, अब तक ऐसा कोई तरीका नहीं खोज पाए हैं, जिससे वे इन गैंगस्टरों को देश चलाने से रोक सकें या फिर वे अपनी दाल-रोटी का जुगाड़ करने में इतना व्यस्त हैं कि बाकी चीजों के बारे में सोचने की फुर्सत नहीं है। एकाध बार जब इनमें से कुछ लोग चुपके से सत्ता के कुलीन वर्ग में पहुंचते भी हैं, तो वहां पहुंचते ही वे भारत के बारे में सोचना छोड़कर उन्हीं की जमात में शामिल हो जाते हैं। हम एक ऐसे स्तर तक पहुंच चुके हैं, जहां पर ज्यादातर लोगों ने यह उम्मीद छोड़ दी है कि वे अपने जीवन में कभी असल बदलाव देख सकेंगे। इसलिए वे उसी काम को करने में खुश हैं, जो वे बेहतर ढंग से करते हैं। वे अपने छोटे-छोटे सफल समुदाय बना रहे हैं और कभी-कभार राष्ट्र की स्थिति के बारे में भी सोच-विचार कर लेते हैं। वास्तव में कोई नहीं जानता कि हम कहां जा रहे हैं। किसी को इसकी परवाह भी नहीं है।
एक बचकाने बजट के साथ सारी अर्थव्यवस्था खंड-खंड हो जाती है। लेकिन सरकार क्या करती है? वह उस शख्स को और ऊंचा उठा देती है, जिसने राष्ट्र के शीर्ष कार्य के लिए बजट तैयार किया था। हमारी कैबिनेट ‘पीटर सिद्धांत’ की जीती-जागती मिसाल है, जहां पर हर व्यक्ति की उसकी अक्षमता के स्तर के हिसाब से ऊपर उठा दिया जाता है। वहां पर कोई कुछ भी करने में सक्षम नहीं है। लेकिन इसी वजह से तो वे वहां पर हैं। वे उनके लिए कोई खतरा नही हैं, जो वास्तव में हमारे इस देश को चलाते हैं। इस तरह के काम उनके जिम्मे चले जाते हैं, जो राष्ट्र के प्रति नहीं वरन इसके शासकों के प्रति वफादारी निभाने की खुलेआम कसम खाते हैं।
इस सबके बावजूद भारत बुजुर्ग मैराथन धावक फौजा सिंह की तरह लगातार आगे बढ़ रहा है। यह इसलिए आगे बढ़ रहा है क्योंकि करोड़ों गुमनाम भारतीय चेहरे हमारी उम्मीदों को जिलाए रखने के लिए जी-तोड़ मेहनत करते हैं, ग्रीक दंतकथाओं में वर्णित उस सिसीफस की तरह जो रोज एक बड़ी-सी चट्टान को धकेलकर पहाड़ी के शिखर तक ले जाता था और वह शाम को लुढ़कते हुए वापस आ जाती थी। भारत अपने पूरे वैभव के साथ इसलिए मौजूद है, क्योंकि आप और हम जैसे लोग इसे किसी भी सूरत में टूटकर बिखरने देने के लिए तैयार नहीं हैं।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार और फिल्मकार हैं।






