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देशी रक्षा खरीद की चुनौती

Bhaskar News | Apr 24, 2013, 06:41AM IST
रक्षा  मामलों में देश आत्मनिर्भर हो, यह उचित अपेक्षा है। ऐसा हो, तो संकट के समय देश विदेशी ताकतों की धौंस से बचा रहेगा। साथ ही रक्षा खरीदारियों में भ्रष्टाचार की गुंजाइश भी सीमित होगी, इसलिए रक्षा खरीद की घोषित नई प्रक्रिया स्वागतयोग्य है।
 
इसके बावजूद हकीकत यह है कि इससे निकट भविष्य में वास्तव में शायद ही कोई फर्क पड़े। नई प्रक्रिया के तहत कहा गया है कि रक्षा खरीद में भारतीय कंपनियों को तरजीह दी जाएगी। विदेशी कंपनियों से खरीदारी आखिरी विकल्प के रूप में ही होगी। लेकिन क्या देश के अंदर खरीदारी के लिए पर्याप्त विकल्प मौजूद हैं? दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं है।
 
भारतीय सशस्त्र सेनाओं की आवश्यकताओं के मुताबिक डिजाइन विकसित करने में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) और उनका समय से गुणवत्तापूर्ण उत्पादन करने में सार्वजनिक क्षेत्र की रक्षा कंपनियां कमजोर साबित हुई हैं।
 
दो मिसालें इस बात की पुष्टि के लिए काफी हैं। हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड ने हल्के लड़ाकू विमान तेजस के निर्माण का कार्य 1980 में शुरू किया। आज तक ये विमान सेना में शामिल नहीं हुए हैं। उधर देसी अजरुन टैंकों के निर्माण की परिकल्पना 1974 में की गई और उसके लिए सेना पहला ऑर्डर 2001 में जाकर दे पाई। दुनिया में रक्षा उद्योग तेजी से आगे बढ़ने वाला क्षेत्र है।
 
सेना की आधुनिकतम आवश्यकताओं के मुताबिक डिजाइन तैयार करने और उत्पादन में देर संबंधित उत्पाद को अनुपयोगी बना देती है। सरकार ने रक्षा उद्योग को निजी क्षेत्र के लिए खोलने की कोशिश की है। लेकिन यह अत्यधिक निवेश और देर से मुनाफा देने वाला क्षेत्र है, इसलिए बड़ी भारतीय कंपनियों ने इसमें ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई है।
 
नतीजतन देश में उच्च तकनीक और सवरेत्तम गुणवत्ता के हथियार या उपकरण उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में भले ही आखिरी विकल्प के रूप में, लेकिन विदेशों से खरीद की मजबूरी बनी हुई है। निष्कर्ष यह कि अगर सचमुच भारत को रक्षा उत्पादों में आत्मनिर्भर होना है, तो इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निवेश और आधुनिक तकनीक को लाने की आवश्यकता है। इस संदर्भ में यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि क्या इस क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की इजाजत उचित रास्ता है? इस मुद्दे पर बहस और सहमति की जरूरत है। 
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