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अदालती कार्यवाही बनाम जनमत की अदालत
एम. जे. अकबर | Jun 10, 2012, 03:25AM IST

राजनीतिज्ञ कानून से डरते हैं, जैसा कि उन्हें सचमुच डरना भी चाहिए। लेकिन उन्हें जो चीज वाकई भयभीत करती है, वह है जनमत की अदालत। हो सकता है कि न्यायालयीन कार्यवाही कामकाज के योग-संयोग से ज्यादा कुछ न हो। इसके अलावा, कानून तो अपना काम करने के लिए जाना जाता है, खासतौर पर तब, जब एक घामड़ की तरह यह विलंब करके अपने ही उद्देश्य पर पानी फेर देता है। लेकिन जनमत पक्का होता है, भले ही यह फैसले तक पहुंचने के लिए कुछ वक्त ले। इसके साथ ही यह निर्मम भी होता है और हर पांच साल या इससे भी कम अवधि में तयशुदा लोकतांत्रिक ढांचे के तहत भावुकता से रहित निर्णय सुनाता है।
मद्रास उच्च न्यायालय ने आदेश दिया है कि केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम को चुनावी दुराचार और धोखाधड़ी के लिए मुकदमे का सामना करना ही पड़ेगा, जो आरोप है कि उन्होंने 2009 के आम चुनावों में मतगणना की प्रक्रिया के दौरान किए। लेकिन जनमत की ज्यूरी न्यायतंत्र से आगे रही है। चिदंबरम अपने निर्वाचन क्षेत्र शिवगंगा से अगला चुनाव नहीं जीत सकते। लिहाजा, जिस विडंबना को उनकी पार्टी ने कुछ कारणों से पहचानने से ही इनकार कर दिया है, वह अनुमानों के क्षेत्र में बनी ही रहेगी। जब भी मौके का इशारा होता है, विपक्षी पार्टियां मंत्रिमंडल से चिदंबरम के इस्तीफे की मांग कर डालती हैं। लेकिन वास्तव में उनकी ऐसी मंशा कभी भी नहीं होती।
चिदंबरम पिछली बेंचों पर बैठने वाले सांसद बन जाएं और वकालत के अपने पेशे में लौट जाएं, इन पार्टियों के लिए इससे ज्यादा उपयोगी है उनका गृहमंत्री बना रहना। यदि विपक्षी पार्टियों को 2009 की खतरनाक हताशा से उबरने में किसी वरिष्ठ मंत्री ने मदद की है, तो वे चिदंबरम ही हैं। तेलंगाना तो उनके अटपटे कामों के सूचीपत्र में बस सबसे जाना-पहचाना मुद्दा है। इसलिए जब कांग्रेस नेतृत्व चिदंबरम का बचाव करता है और उन्हें कुर्सी पर बनाए रखता है, तो विपक्ष सार्वजनिक तौर पर रंज करता है, लेकिन निजी तौर पर खुशी जताता है। वह अपने हमले को एक हद से आगे नहीं ले जाता। आखिर उसे कांग्रेस की नाक से टपकते खून को ठीक करने में मदद क्यों करनी चाहिए? चिदंबरम के निर्वाचन से जुड़ी न्यायलयीन कार्यवाही का हर घुमाव और मोड़ भूखे मीडिया को ताजा खुराक ही उपलब्ध कराएगा। रिपोर्टर यह सबूत जुटाने के लिए रिसते प्रशासन से होकर बड़ी सावधानी से गुजरेंगे कि चिदंबरम अपने खिलाफ प्रकरण को कमजोर करने या अपना काम निकालने के लिए अपने असर का इस्तेमाल कर रहे हैं।
यह नौटंकी पहले पन्नों और सांध्यकालीन टेलीविजन बुलेटिनों में लगातार आती रहेगी। यदि चिदंबरम को मंत्रिमंडल से हटा दिया गया होता, तो यह दिलचस्पी कम पड़ जाती और संभव है यह एहसास भी उभरता कि उन्होंने कीमत तो चुका दी है। खबरों की टोह में रहने वालों की ज्यादा खोजबीन यह कहकर खारिज कर दी जाती कि अतिसक्रिय मीडिया ने यह नहीं सीखा है कि कहां रुकना है।
दूसरे कार्यकाल की तीसरी गर्मी सामान्य तौर पर धीमा मौसम होती है। तब या तो सरकार लगातार अप्रासंगिकता की ओर बढ़ रही होती है या फिर बिल्कुल ऐसे ही धीमे-धीमे अपने विकल्प को अप्रासंगिक बना रही होती है। ग्रीष्मकाल जल्दबाजी का मौसम नहीं होता। बहरहाल, इस साल की गर्मियां उग्र और अशांत रही हैं। ज्योतिषों, जिनमें किसी राजनीतिज्ञ से भुगतान न लेने वाले कुछ गिने-चुने लोग भी शामिल हैं, ने बेहिचक यह बताया है कि ग्रहों में हलचल हो रही है और उनके नतीजे में धरती पर चक्करदार घटनाएं चल रही हैं। लेकिन यहां सीधी-सादी व्याख्याएं भी हैं। कांग्रेस हाईकमान द्वारा की गई गलत परख इनमें से एक है।
लेकिन चूंकि हम भारतीय हैं, सितारों के योग-संयोग को कुछ दोष तो लेना ही होगा। कांग्रेस की बदकिस्मती के एक असाधारण मामले में, उसकी सबसे कुशल और मुस्तैद संपत्ति, प्रणब मुखर्जी जून महीना खत्म होने से पहले ही राजनीतिक बिसात पर ऊंची जगह के लिए बढ़ सकते हैं और उसकी सबसे बड़ी जवाबदेही, चिदंबरम गतिशीलता खो चुके किले की तरह एक कोने में अटके रह सकते हैं। निजी कारण श्रीमती सोनिया गांधी को उस मौके पर भारत से बाहर जाने को मजबूर कर सकते हैं, जब कांग्रेस को राष्ट्रपति पद के लिए अपने प्रत्याशी की घोषणा करनी हो। तकनीकी तौर पर जून के तीसरे सप्ताह से पहले ऐसा करने की कोई जरूरत नहीं होगी, लेकिन राजनीतिक चातुर्य कहता है कि धुंध में तैरना खतरनाक है, भले ही यह धुंध कृत्रिम तौर पर निर्मित की गई हो। आप कभी नहीं जान सकते कि कब मुलायम सिंह यादव नामक दीवार से टकरा जाएंगे। यादव की ओर से रास्ता साफ करवाए बगैर कांग्रेस प्रत्याशी टक्कर रूपी दुर्घटना का शिकार होकर सरकार को अस्तपाल भेज सकता है।
निश्चित तौर पर कांग्रेस के लिए सबसे सुरक्षित विकल्प प्रणब मुखर्जी ही हैं। सीधी सी बात है कि श्रीमती सोनिया गांधी राजनीतिक तौर पर इतनी मजबूत नहीं हैं कि बहुत ज्यादा जोखिम ले सकें। यानी, इसका मतलब होगा उस व्यक्ति को अन्यत्र भेजना जो सरकार चलाता है और फिर घायल मोहरों के साथ खेलना। मुखर्जी को खेल में बनाए रखने का एकमात्र रास्ता यही है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को राष्ट्रपति भवन भेज दिया जाए और उनकी जगह प्रणब मुखर्जी को दे दी जाए। बहरहाल, इससे रणनीति में आमूलचूल बदलाव अपरिहार्य हो जाएगा। ऐसे में, मुखर्जी कम से कम यह तो चाहेंगे कि उनकी नजर में जो सामंत, अगुआ और घोड़े मंद पड़ गए हैं या बौद्धिक रूप से अशक्त होने लगे हैं, उन्हें बदला जाए। मुखर्जी जानते हैं कि वे उन्ही थके चेहरों के बल पर जनमत के ज्वार का रुख नहीं मोड़ सकते। और वे पराजित के तौर पर याद किया जाना पसंद नहीं करते।
हम नहीं जानते कि जून के इस खतरनाक महीने के अतीत में फिसल जाने तक क्या होने वाला है। लेकिन हम जानते हैं कि अनिर्णय अब कोई विकल्प नहीं रहा है। चिदंबरम कानूनी कार्यवाही का सामना कर सकते हैं, परंतु कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार भी रोजाना सबूत और दलील के ह्रास और सैलाब के बीच जनअदालत की कार्यवाही से गुजर रही है। यह दूसरा फैसला होगा, जो इतिहास की किताबों में एक अध्याय बनाएगा, जबकि पहला फैसला किसी फुटनोट में एकाध वाक्य की जगह ही पाएगा।
लेखक द संडे गार्जियन के संपादक और इंडिया टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं।




