साधना के बल पर माधवाचार्य ने रचा दुर्लभ आयुर्वेद ग्रंथ
Source: भास्कर न्यूज | Last Updated 00:24(07/02/12)
स्वामी माधवाचार्यजी ने वृंदावन में रहकर गायत्री साधना करनी आरंभ की। स्वामीजी अत्यंत मनोयोग और विशुद्ध भाव से साधना करते। 13 वर्ष तक उनकी गायत्री साधना चलती रही, किंतु इतनी लंबी अवधि बीत जाने के उपरांत भी कोई चमत्कार नहीं दिखाई दिया।
स्वामीजी निराश हो गए। फिर किसी की सलाह पर वे वाराणसी गए और वहां एक अघोरी को अपनी समस्या बताई। अघोरी ने कहा कि तुम हमारी बताई हुई साधना आरंभ कर दो तो एक माह में ही प्रत्यक्ष चमत्कार हो जाएगा। माधवाचार्यजी ने उसकी बताई विधि से साधना आरंभ की। एक माह बाद साधना के दौरान स्वामीजी को आवाज आई कि हम तेरी साधना से प्रसन्न हैं, वर मांग।
स्वामीजी ने दर्शन देने की प्रार्थना की, किंतु आवाज आई कि मैं तुम्हारे समक्ष नहीं आ सकता, क्योंकि तुम्हारे मुखमंडल पर गायत्री साधना का तेज है। उसके सामने मैं ठहर नहीं सकता। माधवाचार्यजी बोले - यदि ऐसा है तो आप मुझे यह बताइए कि मैंने तेरह वर्ष गायत्री साधना की, किंतु कोई चमत्कार क्यों नहीं हुआ? आवाज आई कि अब तक की साधना प्रारब्ध को काटने में विनष्ट हो गई। अब आगे साधना करने पर अच्छे प्रतिफल प्राप्त होंगे।
यह सुनकर माधवाचार्यजी पुन: वृंदावन में गायत्री साधना करने लगे और साधना से प्राप्त शक्ति से उन्होंने ‘माधव निदानम्’ नामक आयुर्वेद के दुर्लभ ग्रंथ की रचना कर दी। कथा का निहितार्थ यह है कि एकनिष्ठ भक्तिभाव से साधना करने पर उसका प्रतिफल अवश्य मिलता है। बस, जरूरत है तो धर्य धारण करने की।