रचनात्मक स्तरहीन सपाट रचना पर साधुवाद
अनुज खरे
| Aug 27, 2012, 00:42AM IST

इतनी मेहनत से आपने इतना निकृष्ट लिखा है कि साधुवाद देने को जी चाहता है। आपकी रचना को पढ़कर साफ समझ में आता है कि एक बार शुरुआत करने के बाद आपने निश्चित ही कलम तोड़कर फेंक दी होगी, अन्यथा अशुद्धियों के अलावा शब्दों के रिपीटेशन में जितनी सजहता है, वह पलटकर पढ़ने पर संभव नहीं हो पाती। प्रूफ की इन गलतियों के चलते कई नए शब्द हिन्दी भाषा को आपकी ओर से निजी तौर पर भी मिले हैं।
भाषा के साथ भी आपने इस कदर खुलकर खेला है कि उई मां..! हाय दइया.! चोट्टा.! के अलावा किसी भांति दूसरे पक्ष के इमोशन व्यक्त नहीं किए जा सकते हैं। यह हुनर आजकल के लेखकों में कम ही देखने में आता है। रचना को पढ़कर साफ समझ में आता है कि यह पूरी तरह से मौलिक है, क्योंकि इस शैली में सरकारी किताबें लिखने वालों को छोड़कर कोई माई का लाल लिख ही नहीं सकता है। आपकी किताब में कई स्थानों पर हास्य के इतने मार्मिक प्रसंग हैं कि तय करना मुश्किल हो जाता है कि रोएं या बाल नोचें। बाद में किताब को सिर पर मारने से ही तसल्ली मिलती है।
इसी तरह आपकी किताब में फुटनोट्स को वास्तव में फुट से ही कुचला गया है। भयंकर बारीक छपाई और सस्ती प्रिंटिंग के चलते न पढ़ने में कुछ आता है और हाथ लगाने से स्याही अलग मिट जाती है। जहां फुटनोट्स पढ़ने में आ भी जाते हैं, वहां ऐसा लगता है कि तकनीकी शब्दावली आयोग की किसी किताब से सीधे तमाचे मारते हुए यहां लाए गए हों। यानी रोमांटिक शब्द का अर्थ वैज्ञानिक अंदाज में समझाया गया है। कई जगह फुटनोट्स पेज को पार कर दूसरे में पैदल ही चले गए हैं। यह आक्रमण इतना बर्बर है कि दूसरे पेज के फुटनोट्स के फुट उखड़ गए हैं।
आपके लेखन में तार्किकता इतनी है कि दूसरे अध्याय में विधवा के बच्चों का विस्तार से जिक्र है, जबकि आठवें में उसके विधवा हो जाने की जानकारी दी गई है। बारहवें अध्याय में इस चूक की तरफ ध्यान देकर दोनों तथ्यों के बीच कनेक्शन स्थापित किया गया है। हालांकि यहां तक पहुंचते-पहुंचते कई पाठकों का दम ही फूल जाता है और बाकियों के दिमाग का दही हो जाता है। वैज्ञानिकता यहां भारी जोर मारती है। फुटनोट्स में दमा के बायोकैमिक इलाज और दही बिलोकर छाछ या लस्सी बनाने की देसी विधि भी समझाई गई है। इस स्थान पर प्रूफ की कोई गलती नहीं है।
क्लाइमैक्स में जब राज खुलता है तो चमत्कार हो जाता है। यानी पाठक जिस बात की कल्पना कर रहा था, ठीक वही बात निकलती है। पाठकों को इस तरह से चौंकाना आपकी अनूठी कल्पनाशीलता को दिखाता है। आपकी प्रतिभा देखकर हिंदी साहित्य इस कदर भौचक्का है कि उसे मुंह छिपाने तक की जगह नहीं मिल रही है।.. सो यदि आप आलोचना के क्षेत्र में उतरने वाले हैं, तो फटाफट लेख की कॉपी करवा लें। लेखक का नाम भर बदलते रहें।






