रचनात्मकता का ‘स्वर्ण द्वार’
Source: खुशवंत सिंह | Last Updated 00:13(28/01/12)
मैं यह बात कई बार दोहरा चुका हूं कि अपने जीवन में मेरी जितने भी लोगों से भेंट हुई, उनमें से केवल एक ही ऐसे हैं, जिन्हें सही मायनों में जीनियस कहा जा सकता है। वे हैं विक्रम सेठ। पहले मुझे लगता था कि उनके माता-पिता पंजाबी हैं, लेकिन मैं गलत था। उनके माता-पिता उत्तर प्रदेश से हैं। खैर, इस बात में विश्वास करने के पर्याप्त कारण हैं कि विक्रम को अपनी विलक्षण मेधा का कुछ अंश अपनी मां लीला सेठ से विरासत में मिला होगा।
जब विक्रम के पिता कामकाज के सिलसिले में इंग्लैंड गए थे, तब लीला ने अदालत के अहातों में प्रवेश किया था। फिर उनका नाम देश के सर्वश्रेष्ठ बैरिस्टरों की सूची में शामिल हो गया। अंतत: वे हिमाचल प्रदेश के चीफ जस्टिस पद तक पहुंचीं। विक्रम की कई खासियतों में से एक यह भी है कि वे चंद ही दिनों में कोई भी भाषा सीख लेते हैं। चीनी भाषा उनका पहला प्यार था। उन्होंने चीन के तीन शीर्ष कवियों को अंग्रेजी में अनूदित किया है।
इसके अलावा उन्होंने संस्कृत, पाली, हिंदी और उर्दू रचनाओं का भी अनुवाद किया है। उनके द्वारा सॉनेट फॉर्म में लिखा गया उपन्यास ‘द गोल्डन गेट’ और ‘ए सूटेबल बॉय’ फिक्शन जगत की ऐसी कृतियां हैं, जिन्हें आने वाले कई दशकों तक पढ़ा और सराहा जाता रहेगा। फिलहाल वे एक अन्य उपन्यास पर काम कर रहे हैं और साहित्य जगत को उसका बेसब्री से इंतजार है।
कैलिग्राफी की कला में भी विक्रम की गहरी दिलचस्पी है। उन्होंने चीनी, संस्कृत, अरबी, अंग्रेजी और हिंदी में कैलिग्राफी की बेजोड़ कृतियां संयोजित की हैं। साथ ही वे एक लाजवाब कवि भी हैं। उनकी नई किताब ‘द रिवर्ड अर्थ’ (पेंगुइन बुक्स से प्रकाशित) कई भाषाओं से अनूदित कविताओं का संकलन है, लेकिन इनमें से कई कविताएं स्वयं उनकी भी हैं।
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बटरफ्लाई जनरेशन :
उस किताब को देखकर मेरी पहली प्रतिक्रिया यही थी कि हे भगवान, यह क्या सत्यानाश कर डाला। किसी भी किताब की अकल्पनाशील कवर डिजाइन वास्तव में लेखक के साथ अन्याय है। ऐसी कई किताबें हैं, जिन्हें उनकी आकर्षक कवर डिजाइन के कारण खरीद लिया जाता है। वहीं कई किताबें ऐसी भी हैं, जिन्हें उनके अकल्पनाशील कवर आर्ट के कारण नजरअंदाज कर दिया जाता है, बशर्ते उसके लेखक का नाम बहुत बड़ा न हो।
मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। उस किताब का कवर आर्ट देखकर मैं उसे नजरअंदाज ही कर चुका था, लेकिन फिर लेखक का नाम देखकर मैंने उसके बारे में पुनर्विचार किया। मैंने एक बार उस किताब के पन्ने पलटाने शुरू किए तो मैं उसे छोड़ ही न पाया।
इस किताब का शीर्षक है : ‘द बटरफ्लाई जनरेशन : अ पर्सनल जर्नी इनटू द पैशंस एंड फॉलीज ऑफ इंडियाज टेक्निकलर यूथ’। यह उन भारतीय शहरी युवाओं के बारे में है, जिनकी उम्र 25 से 35 वर्ष के बीच है और जो कॉल सेंटरों में देर रात तक काम करते हैं, ड्रग्स का सेवन करने के आदी हैं और यौन संबंधों के प्रति अनौपचारिक रवैया रखते हैं।
वे विवाह को एक पुरातनपंथी संस्था मानते हैं और स्वतंत्र संबंधों को प्राथमिकता देते हैं। मैं इस तरह के विचारों का समर्थन तो नहीं कर सकता, क्योंकि मेरी आज तक किसी ऐसे व्यक्ति से भेंट नहीं हुई, जो ड्रग्स का सेवन करता हो, लेकिन ऐसा वह अपनी विवेकशीलता के चलते कर रहा हो।
बहरहाल, इस किताब की गद्य शैली बड़ी रोचक और आकर्षक है। बटरफ्लाई जनरेशन के ये युवा एक-दूसरे से बड़ी विचित्र भाषा में बात करते हैं। यह भाषा मोबाइल और इंटरनेट के अत्यधिक इस्तेमाल से जन्मी है और इसका लक्ष्य संक्षेपण है यानी किसी भी बात को कम से कम शब्दों में कहने का प्रयास करना। एसएमएस और चैटिंग की भाषा ऐसी ही होती है।
किताब में कई संवेदनशील विषयों को भी बड़ी तीक्ष्णता के साथ छुआ गया है। जाहिर है, ऐसा लेखक की समकालीन और सटीक भाषा के कारण ही संभव हो पाया है। मिसाल के तौर पर किताब का एक चैप्टर समलैंगिकता पर आधारित है, जिसका शीर्षक ‘जय हो’ की तर्ज पर ‘गे हो’ है।
इसमें कहा गया है कि समलैंगिक संबंधों के संबंध में कई तरह की प्रतिक्रियाएं व्यक्त की जाती हैं, लेकिन वास्तव में यह प्रकृति की एक उबाऊ पहेली से बढ़कर कुछ नहीं है। उबाऊ इसलिए, क्योंकि यौन संबंध अंतत: एक यांत्रिक प्रक्रिया होते हैं और पहेली इसलिए कि आखिर कोई निजी अनुभव समाज की जानकारी के दायरे में आते ही हंगामाखेज कैसे बन जाता है।
इस किताब के लेखक हैं पलाश कृष्ण मेहरोत्रा। वे १९७५ में जन्मे थे और उन्होंने दिल्ली के सेंट स्टीफेंस कॉलेज से अर्थशास्त्र की पढ़ाई की है। उन्होंने ऑक्सफोर्ड के बैलिओल कॉलेज में भी अध्ययन किया है। इससे पहले उनकी कहानियों की एक किताब प्रकाशित हो चुकी है, जिसका शीर्षक था : ‘यूनक्स पार्क’। वे एक पत्रिका का संपादन करते हैं और एक अन्य अंग्रेजी अखबार के लिए कॉलम भी लिखते हैं। लेखन उन्हें विरासत में मिला है। वे ख्यात कवि अरविंद मेहरोत्रा के पुत्र हैं।
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हाई आईक्यू :
जमशेदपुर में एक स्टील प्लांट के बिलबोर्ड पर ये रोचक पंक्तियां लिखी हुई थीं :
जो व्यक्ति नहीं जानता है, लेकिन वह अपने नहीं जानने को भी नहीं जानता है, वह मूर्ख है। उससे बचो।
जो व्यक्ति नहीं जानता है, लेकिन वह जानता है कि वह नहीं जानता, वह सीधा-सरल है। उसे शिक्षित करने का प्रयास करो।
जो व्यक्ति जानता है, लेकिन यह नहीं जानता कि वह जानता है, वह नींद में डूबा हुआ है। उसे जगाओ।
जो व्यक्ति जानता है और यह भी जानता है कि वह जानता है, वह समझदार और बुद्धिमान है। उसका अनुसरण करो।
(सौजन्य : ए. तारकनाथ, जमशेदपुर) -लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं।