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जब देवताओं का घमंड चूर-चूर हुआ

bhaskar news | Oct 04, 2012, 04:51AM IST
 
 

उपनिषद का एक प्रसंग है। परमेश्वर ने देवों पर कृपा की और वे शक्तिशाली असुरों पर विजयी हो गए। विजय पाने के बाद हर देवता अहंकार से भर गया। उनमें से प्रत्येक इस विजय का श्रेय स्वयं को देता और दूसरों के योगदान को तुच्छ मानता। इससे देवताओं के मध्य अनावश्यक विवाद होने लगे और उनमें परस्पर कटुता पनपने लगी। यह देखकर परमेश्वर ने सोचा कि यदि यही सब होता रहा, तो असुर फिर देवताओं पर चढ़ाई कर देंगे और इनका आपसी वैमनस्य इन्हें पराजित करवा देगा।





इस समस्या के हल के लिए ईश्वर ने एक विशालकाय यक्ष के रूप में स्वयं को प्रकट किया और देवताओं के सामने पहुंचे। देवताओं ने आश्चर्य से उन्हें देखा और उनका परिचय जानने के लिए सबसे पहले अग्नि देवता पहुंचे। यक्ष ने उनसे पूछा - ‘आप कौन हैं?’ अग्नि देवता ने साभिमान उत्तर दिया - ‘आप मुझे नहीं जानते? मैं परम तेजस्वी अग्नि हूं। मैं चाहूं तो सारी धरती को जलाकर राख कर दूं।’ यक्ष ने उन्हें एक सूखा तिनका देकर उसे जलाने को कहा, किंतु अग्नि देवता नहीं जला सके। फिर पवन देवता यक्ष का परिचय जानने पहुंचे।






तब यक्ष ने उनसे परिचय पूछा, तो वे बोले - ‘मैं पवन हूं। मैं चाहूं, तो पूरे ब्रह्मांड को उड़ा दूं।’ यक्ष ने वही सूखा तिनका इन्हें उड़ाने को कहा, किंतु पूरा जोर लगाने के बाद भी पवन देवता उसे न उड़ा सके। फिर इंद्र गए, किंतु तब तक यक्ष जा चुके थे। अब वहां पार्वतीजी प्रकट हुईं और इंद्र को यक्ष रूपी परमेश्वर का परिचय दिया। अब देवताओं को परमेश्वर की शक्ति का ज्ञान हुआ और उनका अहंकार नष्ट हो गया। सार यह है कि अहंकार और अहंकारी का पतन सुनिश्चित होता है। अपनी शक्ति को सद्कार्यो में लगाने से वह सार्थक होती है।
 
 
 

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