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बचपन का एक पसंदीदा ठौर

रस्किन बॉन्ड, पद्मश्री से सम्मानित ब्रिटिश मूल के साहित्यकार | Oct 26, 2012, 01:15AM IST
 
 


मेरी नानी को खाना पकाने और दूसरों को लजीज व्यंजन खिलाने का बेहद शौक था। हालांकि उनका किचन बहुत बड़ा तो नहीं था, लेकिन जो बात इसे स्पेशल बनाती थी, वह थी वहां से निकलकर आने वाले लजीज व्यंजन। नानी के हाथ से बने कबाब, अंडे की भुर्जी, गुलाब जामुन, एपल-पाई इत्यादि का जायका लेने के बाद लोग उनकी तारीफ किए बगैर नहीं रह पाते थे। मेरे हिसाब से वह दुनिया की सर्वश्रेष्ठ कुक थीं।



हमारी नानी का घर देहरादून में था। उनके बंगले के बाहर एक सुंदर बगीचा था, जिसमें आम, लीची, अमरूद, केला, पपीता और नींबू जैसे अनेक फलदार वृक्ष लगे थे। इसके साथ-साथ वहां एक कटहल का विशाल वृक्ष भी था, जिसकी छाया बंगले की दीवारों पर पड़ती थी। हमारी नानी अक्सर कहती थीं- वही घर रहने के लिहाज से उत्तम है, जिस पर किसी घने वृक्ष का साया हो। उनका कहना बिल्कुल सही था। यह बेहतरीन आशियाना था।



बहरहाल, मैं आपको एक बात और बता दूं कि मैं बचपन से ही पेटू किस्म का इंसान रहा हूं। यदि मेरी नानी दुनिया की सर्वश्रेष्ठ कुक थीं, तो मैं ऐसा बालक था, जिसे भूख बहुत लगती थी। मैं इस मायने में खुद को भाग्यशाली कहूंगा कि मुझे ऐसी नानी मिलीं, जिनका लजीज व्यंजन पकाने में कोई सानी नहीं था। हर साल बोर्डिंग स्कूल में छुट्टियां होने के बाद मैं अपने माता-पिता के पास असम जाने से पहले एकाध महीना नानी के यहां गुजारता था। मेरे पिता उस वक्त एक टी-एस्टेट में मैनेजर थे। हालांकि चाय-बागान में धमाचौकड़ी मचाने का अपना आनंद था, लेकिन एक दिक्कत यह थी कि वहां मेरी नानी के हाथ का बना खाना नहीं मिलता था। लिहाजा मुझे अपनी आधी छुट्टियां नानी के यहां गुजारना हमेशा अच्छा लगता था।



नानी भी मुझे अपने यहां पाकर बहुत खुश होतीं, क्योंकि ज्यादातर वक्त वह अकेली ही रहती थीं। हालांकि वह पूरी तरह अकेली भी नहीं थीं। उनके यहां कांता नामक एक माली था, जो आउटहाउस में रहता था। कांता का बेटा मोहन मेरी ही उम्र का था। हम दोनों साथ मिलकर खूब मस्ती करते। नानी ने एक कुत्ता भी पाल रखा था। उन्होंने उसे क्रेजी नाम दिया था, क्योंकि वह दिनभर इधर-उधर भागता रहता था। और हां, नानी के दुलारे अंकल केन भी तो थे। जब भी अंकल केन की कोई नौकरी छूट जाती (जैसा अक्सर उनके साथ होता था) या उन्हें नानी के हाथ से बने लजीज व्यंजन खाने की इच्छा होती तो वह फौरन वहां चले आते।



नानी के घर पहुंचने पर हर बार मुझे कोई नया व्यंजन जरूर खाने को मिलता। मेरी थाली में कोई भी नया व्यंजन परोसने के बाद वह इस पर मेरी प्रतिक्रिया जानने को काफी उत्सुक रहतीं और जो कुछ भी मैं कहता, उसे अपनी डायरी में दर्ज कर लेतीं। शायद इसी तरह वह अपनी पाककला को लगातार निखारती रहती थीं। वह गाजर का हलवा बहुत अच्छा बनाती थीं। पहली बार जब मुझे उनके हाथ का बना गाजर का हलवा चखने का मौका मिला, उस वक्त अंकल केन भी डायनिंग टेबल पर हमारे साथ थे। उनकी नौकरी छूट गई थी और वह कुछ समय नानी के यहां ही रहने वाले थे। हालांकि मेरी तरह अंकल केन भी खाने-पीने के बेहद शौकीन थे, लेकिन वह कभी नानी द्वारा बनाए गए किसी व्यंजन की तारीफ नहीं करते। मुझे उनकी यह आदत बुरी लगती। संभवत: इसी वजह से कई बार मुझे उन्हें खिझाने में बहुत मजा आता।
अंकल केन ने जैसे ही प्लेट में गाजर का हलवा देखा, वह बोले- 'फिर वही गाजर का हलवा आंटी!' यह सुनकर नानी थोड़ा गुस्से-से बोलीं- 'फिर वही से तुम्हारा क्या मतलब? आखिर पिछले महीने यहां आने के बाद से तुमने दोबारा यह कब खाया है?' इस पर अंकल केन बोले, 'यही तो मैं कहना चाहता हूं आंटी। मेरा आशय है, मुझे हर बार कुछ नया खाने को मिले।' हालांकि यह कहते हुए वह आधे से ज्यादा हलवा गटक चुके थे। डायनिंग टेबल पर बातचीत के दौरान उन्होंने मुझे छेडऩे के अंदाज में पूछा- 'तुम अपने मम्मी-पापा के यहां कब जा रहे हो रस्किन?' इस पर मैंने भी उन्हें उन्हीं के अंदाज में जवाब देते हुए कहा- 'हो सकता है इस बार मैं वहां न जाऊं। लेकिन अंकल आप अपनी अगली नौकरी पर कब जा रहे हैं?'


यह सुनकर अंकल केन बोले, 'वैल, मैं कुछ महीने आराम के मूड में हूं।' यह जवाब उनकी आदत के मुताबिक ही था।
मैं भोजन के उपरांत किचन की साफ-सफाई में नानी का हाथ बंटा दिया करता था। जब हम यह कर रहे होते, उस वक्त अंकल केन बरामदे में आरामकुर्सी पर पसरकर झपकियां लेते रहते या रेडियो पर गाने सुनते। एक बार नानी ने मुझसे पूछा, 'तुम्हें अपने अंकल केन कैसे लगते हैं?' मैंने कहा, 'काश वह किसी और के अंकल होते।' यह सुनकर नानी बोलीं, 'वह इतने बुरे भी नहीं हैं। बस थोड़ा सनकी या कहें कि क्रेजी हैं।' तब मैंने कहा, 'कम से कम क्रेजी (कुत्ता) घर में दौड़-भाग तो करता है। मैंने अंकल केन को तो कभी यह भी करते हुए नहीं देखा।'



खैर, मेरी यह हसरत भी जल्द ही पूरी हो गई। एक दिन मैं मोहन के साथ बरामदे में कंचे खेल रहा था, तभी हमने अंकल केन को बगीचे में तेजी से भागते हुए देखा। उनके पीछे मधुमक्खियों का झुंड लगा था। दरअसल अंकल केन एक पेड़ के नीचे खड़े होकर सिगार पी रहे थे। उस पेड़ की शाख पर मधुमक्खियों का छत्ता लगा था, जो सिगार के धुएं से बिदककर अंकल केन के पीछे पड़ गईं। अंकल तेजी से अंदर भागे और सीधे ठंडे पानी के टब में जाकर डुबकी मार दी। उनके शरीर में कई जगह मधुमक्खियों ने डंक मारा था, जिससे उनकी हालत काफी खराब हो चुकी थी। उन्हें तीन दिन तक बिस्तर पर रहना पड़ा। बाद में मैंने नानी से कहा, 'मुझे नहीं पता था कि अंकल केन इतना तेज भाग सकते हैं।' इस पर नानी ने जवाब दिया, 'यह व्यक्ति को कुछ सिखाने का प्रकृति का अपना तरीका है।'

 
 
 

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