विपुलता के बीच भूख की यह लाचारी

भारत अपने तेजी से बढ़ते उपभोक्तावादी मध्यम वर्ग के साथ आर्थिक महाशक्ति बनने के लिए बेताब है। आत्मविश्वास से लबरेज हमारे कारोबारी लीडर्स विदेशी कंपनियों का अधिग्रहण करते हुए दुनिया को अपनी धमक दिखा रहे हैं। फोब्र्स की 2011 की सूची में कुल पचास भारतीयों को जगह मिली थी और दुनिया के सौ सबसे धनी व्यक्तियों में सात भारतीय शामिल थे। इससे पता चलता है कि भारत में धनकुबरों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।
लेकिन यह भी सत्य है कि भारत में ही सबसे ज्यादा तादाद में अभावग्रस्त लोग रहते हैं। यहां सबसे ज्यादा लोग भूखे सोने पर विवश हैं और दुनिया के किसी भी देश के मुकाबले सबसे अधिक बच्चे हमारे यहां कुपोषण का शिकार हैं। योजना आयोग का हालिया आकलन भारत में गरीबों की संख्या 36 करोड़ बताता है। इसके लिए उसने गरीबी रेखा के एक पैमाने का इस्तेमाल किया, जो काफी हद तक भुखमरी रेखा जैसी है।
भारत का बढ़ता मध्यम वर्ग अक्सर इस बात को मानने से इनकार कर देता है कि उनसे कहीं ज्यादा संख्या में ऐसे लोग यहां हैं, जो आज भी नारकीय जीवन जी रहे हैं। यहां लाखों ऐसे लोग हैं, जिन्हें अपना व अपने परिवार का पेट भरने के लिए रोज संघर्ष करना पड़ता है। कुछ समय पहले तक कम से कम गरीब हमारे आस-पास तो थे। हमारी फिल्मों में, कविताओं में, साहित्य में, बजट भाषणों में किए गए वादों व चुनावी नारों में, अखबारों की रिपोट्र्स में और टेलीविजन स्क्रीन पर इनका अस्तित्व नजर तो आता था। लेकिन आज तो उन्हें अदृश्य मान लिया गया है। वे अब कोई मायने नहीं रखते।
आर्थिक विकास के दशकों में भारत ने उपभोग के लिहाज से जरूर कुछ गरीबी घटाई, लेकिन समाज को ज्यादा समावेशी बनाने अैर आर्थिक रूप से अभावग्रस्त लोगों के लिहाज से गरीबी नहीं घटी। वास्तव में आर्थिक विकास के साथ सामाजिक अलगाव और विषमता बढ़ी ही है तथा आकांक्षी मध्य वर्ग के लिए गरीब तेजी से अदृश्य होते जा रहे हैं।
भुखमरी से मौतों के बारे में समय-समय पर आने वाली रिपोट्र्स कुछ समय के लिए ही मीडिया का ध्यान आकर्षित करती हैं, जिसके बाद वह पुन: चुनावी राजनीति, क्रिकेट, फैशन, फिल्मों, शेयर बाजार और सनसनीखेज अपराधों से जुड़ी खबरों में लग जाता है। इस तरह की रिपोट्र्स के बाद अमूमन प्रशासन द्वारा आक्रोशित ढंग से भुखमरी के चलते हुई मौतों से इनकार किया जाता है, राजनीतिक विपक्ष द्वारा शातिर अंदाज में इसकी आलोचना की जाती है, अभिभावकों द्वारा अपने बच्चों को बेचने जैसी सनसनीखेज खबरें आती हैं और टेलीविजन पर फटेहाल अभिभावकों द्वारा अपने भूख से बेहाल कृशकाय बच्चों को हाथ में थामे तस्वीरें आती हैं। इसके बाद धीरे-धीरे सबके द्वारा मामला भुला दिया जाता है, सिवाय उन लोगों के, जिनके पास भूख के साथ जीने के अलावा कोई चारा नहीं होता।
सरकारी नियोजन के उच्च स्तरों पर आधिकारिक आंकड़ों का इस्तेमाल व हेरफेर किया जाता है, दुनिया को यह समझाने के लिए कि भारत में गरीबी खत्म हो रही है। बजट के संतुलनकार सब्सिडी कम करने तथा खाद्य, सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, कृषि और आवास इत्यादि में सार्वजनिक निवेश घटाने की वकालत करते हैं। वहीं वैश्विक वित्तीय संस्थानों द्वारा सरकार को भुखमरी खत्म करने के लिए अमूमन अंतरराष्ट्रीय बाजार व व्यापार की पहुंच बढ़ाने से लेकर सामाजिक संरक्षण के लिए सार्वजनिक निवेश में कटौती करने जैसे सुझाव ही दिए जाते हैं।
भारत की सबसे बड़ी संपदा इसके एक अरब से ज्यादा लोग हैं। बेशक भारत इन सबका पेट भरने के लिहाज से पर्याप्त अनाज पैदा करता है। फिर भी विपुलता के बीच भूख का विरोधाभास यहां बना हुआ है। एनसी सक्सेना बताते हैं कि १९९० के दशक तक खाद्य उत्पादन आबादी की बढ़ोतरी के मुकाबले कहीं ज्यादा था। हाल के वर्षों में आर्थिक विकास में तेजी आने के बावजूद खाद्यान्न उत्पादन में जबर्दस्त सुस्ती रही है, जिसके नतीजतन लाखों भारतीयों को भूखे रहना पड़ रहा है। आखिर में, भारत अपने लोगों का पेट इसलिए नहीं भर पा रहा है क्योंकि यहां लोग बहुत ज्यादा हैं या खाद्यान्न बहुत कम। यह नाकामी तो हमारी बेहद विषम सामाजिक व आर्थिक व्यवस्थाओं और उन सार्वजनिक नीतियों की वजह से है, जो श्रमिकों, छोटे उत्पादकों और अभावग्रस्त लोगों के विरुद्ध शुरू से प्रभावी रही हैं।
कुछ साल पहले भूख पर आयोजित एक मीटिंग (जिसमें मैं भी शामिल था) में उत्तर प्रदेश हाई कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने कहा था- 'एक ऐसे देश में जहां पर प्रचुर खाद्यान्न मौजूद है, वहां पर हरेक बच्चे, महिला व पुरुष की भूख की वजह से होने वाली मौत वास्तव में हत्या है।Ó यह एक साहसिक और बेबाक टिप्पणी थी, जो ऐसे देश में असामान्य थी जहां सांस्कृतिक तौर पर इस व्यापक विषमता के खिलाफ कदाचित ही प्रतिरोध या गुस्सा है।
मैंने देश के अनेक हिस्सों में भूख से हुई मौत के मामलों का जायजा लिया है। आंध्र प्रदेश के तेलंगाना में स्थित गांव में भी भूख के कारण ऐसे ही एक व्यक्ति की मौत हुई थी। उस शख्स ने गांव में कवरेज के लिए पहुंचे टीवी क्रू के समक्ष गुहार लगाते हुए कहा था कि वह भूख से बेहाल है और यही स्थिति रही तो जल्द ही मर जाएगा। उसका मामला राज्य में टेलीविजन पर प्रसारित भी हुआ, लेकिन किसी ने उसकी सुध नहीं ली। तीन महीने बाद वह वाकई भूख से मर गया। मेरी राय में यह निर्विवाद रूप से एक लाचार, गरीब नागरिक की हत्या थी, उदासीनता नामक एक ऐसे हथियार द्वारा जो किसी भी आग्नेयास्त्र से ज्यादा घातक है। हमारे प्रबुद्ध मुख्य न्यायाधीश ने सही कहा था। लेकिन कोई हैरत की बात नहीं कि उस शख्स की मौत के लिए किसी भी अधिकारी को दंडित नहीं किया गया।
(लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं।)
हर्ष मंदर
राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य








