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चरित्र के वृक्ष को लगातार सींचते रहें

पं. विजयशंकर मेहता | Oct 27, 2012, 03:43AM IST

भौतिक संसार में जो वस्तु दिखे नहीं, लोग उसे मानते नहीं। सारा खेल दृश्य का है। अदृश्य को अस्वीकार किया जाता है। विज्ञान लगातार अदृश्य को खोजता है। विज्ञान की सफलता ही अरूप को रूप बनाने में है, इसीलिए इसमें खोज और शोध एक साथ चलता है। अध्यात्म थोड़ा भिन्न है। यहां अनुभूति को प्राथमिकता है। अरूप को रूप बनाने का आग्रह है, परंतु रूप को अनुभूति से जोड़ना यहां शोध से अधिक खोज है। अध्यात्म के क्षेत्र में एक शब्द है चरित्र। आज के भौतिक और वैज्ञानिक युग में खासतौर पर नई पीढ़ी चरित्र को कम प्राथमिकता देती है। उनके लिए लक्ष्य और परिणाम ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।



इस समय जो दिखता है, वही सत्य माना जाता है। इसलिए कई बार युवा वर्ग पूछता है कि चरित्र होता क्या है? जीवन में जब सद्विचार और सद्कर्म में एकरूपता आ जाए, यानी मनुष्य अपने ही कृत्य में मन, वचन और कर्म की एकरूपता ले आए, उसे ही चरित्र कहते हैं। इच्छाओं को, कामनाओं को नियंत्रित करके काम किया जाता है, तब चरित्र सामने आता है। जीवन में कमाई गई संपत्ति में से चरित्र महत्वपूर्ण दौलत है। चरित्र दो स्तर पर काम करता है। भीतरी स्तर है योग, चिंतन, उपवास; और बाहरी स्तर है सेवा, करुणा, शिष्टाचार और त्याग। चरित्र के वृक्ष को लगातार सत्संग, साहित्य और संस्कारों के जल से सींचना पड़ता है। अगर इस रूप में चरित्र को समझा जाए तो यह भीतर और बाहर का संतुलन बना देता है। जीवन में सुख और शांति संतुलन से मिलती है। चरित्र कर्म को कुकर्म बनने से रोकने का इशारा होता है।
-पं. विजयशंकर मेहता. panditji@hamarehanuman.com

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